Oda Railway Bridge Explosion Case
उदयपुर, नगर संवाददाता | रेलवे ट्रेक ओड़ा ब्रिज (Railway Track Oda Bridge) पर विस्फोट कर आतंकी वारदात को अंजाम देने के मामले में विस्फोटक सामग्री | उपलब्ध कराने वाले आरोपी की ओर से पेश जमानत प्रार्थना पत्र को अदालत ने शुक्रवार को दूसरी बार नामंजूर कर दिया।
प्रकरण के अनुसार उदयपुर- अहमदाबाद रेलवे ट्रेक (Udaipur - Ahmedabad Railway Track) के जावर चांदा से जावर खण्ड के मध्य स्थित ओड़ा ब्रिज पर अज्ञात लोगों ने पटरियों पर विस्फोटक लगाकर 12 नवम्बर को क्षतिग्रस्त की । इससे ब्रिज के गडर टूट गये एवं कई हिस्से बिखर गये। यहां तक की चैनल, स्लीपर पर मुख्य ब्रिज के अन्य गडर भी क्षतिग्रस्त हो गये और लाईन भी क्षतिग्रस्त हुई थी ।
मौके से फ्यूज वायर, डिटोनेटर, जिलेटीन की छड़े आदि मिली थी । जावरमाइंस पुलिस ने मामला दर्ज किया। मामला आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा होने के कारण इसकी जांच एटीएस को सौंप दी गई।
इस मामले में एटीएस ने कार्यवाही करते हुए विस्फोट करने वाले धूलचंद मीणा, प्रकाश मीणा को गिरफ्तार किया और एक विधि से संघर्षरत बालक को डिटेन किया गया। इस मामले में एटीएस के एएसपी अनंत कुमार के नेतृत्व में टीम ने आरोपियों से पूछताछ कर विस्फोटक सामगी उपलब्ध कराने वाले बिहारीलाल पुत्र लक्ष्मीलाल सुहालका निवासी अम्बामाता घाटी तितरड़ी सवीना और इसके बेटे अंकित सुहालका तथा अन्य आरोपियों ने उन्हें यह विस्फोटक सामग्री उपलब्ध कराई गई। बिहारीलाल और उसके बेटे के मकान पर दबिश देकर भारी मात्रा में घर में छिपा कर रखी विस्फककी सामग्री बरामद की।
इस मामले में न्यायिक अभिरक्षा में चल रहे आरोपी बिहारीलाल सुहालका की ओर से जिला एवं सत्र न्यायालय में जमानत का दूसरा प्रार्थना पत्र पेश किया। प्रार्थना पत्र पर सुनवाई के दौरान लोक अभियोक कपिल टोडावत ने तर्क दिया कि आरोपी बिहारीलाल पर रेलवे अधिनियम सार्वजनिक सम्पत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम एवं विधि से विरूद्ध क्रिया कलाप निवारण अधिनियम और भादसं की धारा 120 बी व 285 के तहत अपराध कारित किया है। ऐसे में आरोपी को जमानत का लाभ दिया जाना न्यायोचित नहीं है।
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद पीठासीन अधिकारी चंचल मिश्रा ने अपने फैसले में लिखा कि मामले में चालान पेश किया जा चुका है। प्रकरण में अन्य कोई ऐसा सारवान परिवर्तन नहीं हुआ है जिससे आरोपी को अब जमानत का लाभ दिया जा सके । तथ्यों एवं परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अररोपी के दूसर जमानत प्रार्थना पत्र को नामंजूर कर दिया ।
Editorial

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