रक्षा बजट बढ़ाए बिना मजबूती की ओर
प्रणय कोटास्थाने : महीने एक और रक्षा बजट बिना इस किसी शोर-शराबे के जल्दी निकल गया। तब से विश्लेषकों का ध्यान इसी बात पर है कि कैसे आने वाले वर्ष के लिए रक्षा खर्च पिछले साल से अलग है? कई ने इसकी आलोचना की है, क्योंकि बीते कई वर्षों में पहली बार रक्षा खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो फीसदी भी नहीं है। वहीं दूसरी तरफ, बजट के बाद रक्षा मंत्रालय की ओर से आया बयान ऑपरेशनल खर्च में की गई 44 फीसदी की वृद्धि को अहम मान रहा है। कहा गया है कि यह युद्धक क्षमताओं की कुछ कमियों को पाट देगा और सेना को गोला-बारूद, हथियारों व सैन्य भंडार से लैस करेगा। मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि पिछले पांच वर्षों में आधुनिकीकरण व बुनियादी ढांचे के विकास के लिए पूंजीगत खर्च में 57 फीसदी की अच्छी वृद्धि की गई है। अब सवाल यह है कि इन परस्पर विरोधी तर्कों का आखिर क्या अर्थ निकाला जाए?
साल-दर-साल किए जाने वाले आवंटन का यदि तुलनात्मक अध्ययन करें, तो हमें एक उलझी तस्वीर मिलती है। कोई भी अपने तर्कों के अनुरूप बजट से आंकड़ा खोज सकता है। मगर हम एक कदम पीछे लें और आंकड़ों में न उलझें, तो पता चलेगा कि इस बजट में रक्षा संबंधी नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है, और जापान के विपरीत, जिसने अगले पांच वर्षों में अपने सैन्य खर्च को दोगुना करने की घोषणा की है, भारत का नजरिया अपने सशस्त्र बलों की कार्रवाई संबंधी दक्षता में धीरे-धीरे सुधार लाना है।
इसे समझने के लिए वित्त वर्ष 2016 को पैमाना बनाते हैं। वह वर्ष काफी महत्वपूर्ण था, क्योंकि वह दो प्रमुख घटनाओं से पूर्व का साल था- पहली घटना थी, सीमा पर चीन की आक्रामक मुद्रा और दूसरी, 'वन रैंक, वन पेंशन' की मंजूरी के बाद बजट पर पड़ने वाला भार । इस विश्लेषण से तीन निष्कर्ष निकलते हैं।
पहला, न केवल रक्षा खर्च जीडीपी के अनुपात में गिरा है, बल्कि यह सरकारी व्यय के प्रतिशत के रूप में भी कम हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें, तो गैर-रक्षा कार्यों की तुलना में रक्षा कार्य प्राथमिकता की सूची में नीचे आ गए हैं।
दूसरा, चीन की चुनौती ने रक्षा खर्च में कोई प्रभावशाली बदलाव नहीं किया है। रक्षा खर्च को मुख्यतः चार घटकों में बांटा जा सकता है- वेतन, पेंशन, पूंजीगत खर्च और अन्य। आंकड़े बताते हैं कि बीते कुछ वर्षों में पेंशन मद में खर्च बढ़ने से पूंजीगत खर्च कम हो रहा था । लगातार दो वर्षों (वित्त वर्ष 19 और 20) में पूंजीगत अधिग्रहण और आधुनिकीकरण की तुलना में पेंशन पर अधिक पैसा खर्च किया गया। गलवान संकट के बाद, वित्त वर्ष 21 से संतुलन साधने का मामूली प्रयास किया गया है। यहां महत्वपूर्ण यह भी है कि कार्रवाई संबंधी खर्च और रखरखाव संबंधी व्यय की कीमत पर पेंशन और पूंजीगत व्यय में खर्च बढ़ाए गए हैं। इसमें गोला-बारूद भंडार पर होने वाला खर्च भी शामिल है, जिस पर कम ध्यान दिया गया था । इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि हालिया बजट में लड़ाकू क्षमताओं में वृद्धि के रूप में इस कमी को पाटने का प्रयास किया गया है।
तीसरा, पूंजीगत खर्च के मामले में यह अवधि भारतीय नौसेना के लिए अपेक्षाकृत बेहतर रही। चूंकि कई वर्षों से नए प्लेटफॉर्म (आपूर्ति, प्रौद्योगिकी या सेवाओं की खरीद-बिक्री) पर ध्यान दिया जाता रहा है, इसलिए यह देखना दिलचस्प था कि आखिर किस तरह से पूंजीगत व्यय को तीनों सशस्त्र सेनाओं में बांटा गया। आंकड़े बताते हैं कि बीते चार वर्षों में बड़ा बदलाव भारतीय नौसेना के हिस्से में पूंजीगत खर्च के रूप में आया है, क्योंकि वित्त वर्ष 20 की तुलना में वित्त वर्ष 24 में उसका यह आंकड़ा दोगुना हो गया है।
पिछले पांच वर्षों में इन बिंदुओं को जोड़ने से एक स्पष्ट तस्वीर उभरती है। लगता यह है कि सरकार मानने लगी है कि रक्षा खर्च को ज्यादा बढ़ाए बिना चीन को नियंत्रित किया जा सकता है। हालिया बजट इस दावे का एक संकेतक हो सकता है। यह महामारी के बाद का पहला बजट था, वह भी ऐसे समय आया था, जब भारत के लिए आर्थिक संभावनाओं में काफी सुधार हुआ है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में आयकर और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), दोनों मोर्चों पर उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। इतना ही नहीं, उर्वरक की वैश्विक कीमतों में कमी के कारण अनुमानित सब्सिडी बिल में भी कमी आई है। नतीजतन, बीते कई वर्षों में पहली बार सरकार के पास संसाधन मुहैया कराने का विकल्प था। मगर उसने इसका इस्तेमाल कुल पूंजीगत खर्च को बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रूपये करने के लिए किया, जो 2019-20 की तुलना में करीब तीगुना था। इस वृद्धि के बावजूद, रक्षा बजट एकदिवसीय क्रिकेट मैच में मध्य ओवरों के खेल के समान दिख रहा है।
वित्तीय बचत के नजरिये से देखें, तो रक्षा क्षेत्र में इस अवधि में केवल दो महत्वपूर्ण बदलाव हुए। पहला, अग्निपथ योजना की घोषणा, जिसमें पेंशन का बोझ बेशक कम हो सकता है, लेकिन यह बचत डेढ़ दशक के बाद ही दिखाई देगी। दूसरा, थिएटर कमांड जैसे अन्य प्रस्ताव, जो अभी तक साकार नहीं हुए हैं। आधुनिकीकरण के लिए एक नॉन-लैप्सेबल फंड ( वह फंड, जिसका पैसा साल गुजर जाने के बाद वा नहीं लौटता, बल्कि अगले साल के लिए इस्तेमाल लायक बना रहता है) बनाने का प्रस्ताव भी हालिया बजट में जगह नहीं पा सका, जबकि इसे केंद्र सरकार ने फरवरी, 2021 में ही सैद्धांतिक रूप से मंजूर कर लिया था ।
चीन के खिलाफ भारत की रणनीतिक मुद्रा का अनुमान लगाने की नजर से यदि हालिया बजट को देखेंगे, तो संभवतः निराशा हाथ लगेगी। शायद सरकार इसके लिए शासन- कला के अन्य उपकरणों- राजनयिक, आर्थिक या गैर-पारंपरिक को अधिक उपयुक्त मान रही है। इस पर गहन चिंतन की दरकार है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कई संसदीय स्थायी समितियों और रक्षा संगठनों की सिफारिश है कि रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद का तीन प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन असलियत इसके विपरीत है। फिर भी, हम उम्मीद करते हैं कि चीन से मिलने वाले खतरे का मुकाबला करने के लिए सरकार अन्य उपायों में भारी निवेश कर रही होगी।
Editorial

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