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संतुलित कूटनीति से मजबूत हुए हम
By EditorialPublished on
विवेक काटजू : विदेश नीति की दृष्टि से साल 2023 में भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि जी-20 संगठन और उसके शिखर सम्मेलन की सफल मेजबानी रही। भारत ने 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य' द्वारा दुनिया को यह संदेश दिया कि वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी मानव जाति के हितों का ध्यान रखना आवश्यक है।

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विवेक काटजू : विदेश नीति की दृष्टि से साल 2023 में भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि जी-20 संगठन और उसके शिखर सम्मेलन की सफल मेजबानी रही। भारत ने 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य' द्वारा दुनिया को यह संदेश दिया कि वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी मानव जाति के हितों का ध्यान रखना आवश्यक है। अगर ताकतवर देश अपने संकीर्ण राष्ट्रवाद पर ध्यान देंगे, तो मानव जाति को चुनौती देने वाली जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का समाधान नामुमकिन है। इतना ही नहीं, भारतीय कूटनीतिज्ञों ने शिखर सम्मेलन के दौरान बड़ी खूबसूरती से यूक्रेन - युद्ध जैसे ज्वलंत मसले पर भी सहमति बनाने में सफलता हासिल की। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर को मुबारकबाद देना चाहिए, जिनके निर्देशन में यह सब संभव हुआ होगा ।
जी-20 की मेजबानी तो चुनौतीपूर्ण थी ही, इस साल कई अन्य मुद्दे भी हमारे सामने चुनौती | पेश करते रहे। सबसे अधिक परेशानी चीन के रवैये से पैदा हुई, जो सामरिक और आर्थिक, दोनों है। साल 2020 में चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जो कदम उठाए थे, उसका पूर्ण समाधान इस वर्ष भी नहीं हो सका। हां, भारतीय सेनाओं ने हर मुमकिन प्रयास किया है, जिसके कारण चीन को यह एहसास हो गया कि यदि उसने अब भारतीय जमीन को हड़पने की कोशिश की, तो भारत के पास उसे विफल करने की पर्याप्त क्षमता है। हालांकि, हमारी पूरी कोशिशों के बावजूद चीन के साथ हमारा आयात बढ़ रहा है। जाहिर है, सरकार ने आत्मनिर्भरता का जो आह्वान किया है, उस पर भारतीय उद्योगपतियों, व्यापारियों को ध्यान देना होगा।
मतलब साफ है, 1990 के दशक में चीन के साथ जो समझौते हुए थे, वे अब निरर्थक हो गए हैं और एक मजबूत नीति की हमें सख्त दरकार है। चीन की चुनौती का सामना भारत को खुद करना होगा, लेकिन इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी भूमिका हो सकती है, जैसे, 'क्वाड' (ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका का गुट) को मजबूत बनाने का प्रयास करना । इससे भारत की साख हिंद-प्रशांत क्षेत्र में और बढ़ेगी, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इन देशों के साथ जो स्वतंत्र नीतियां हमने अब तक अपनाई हैं, उन पर हम कायम रहें और बहुपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाएं। इस क्षेत्र के देश भी यही चाहते हैं।
इस साल चीन का प्रभाव भारत के पश्चिमी पड़ोस के देशों में खासा बढ़ा है। पाकिस्तान के साथ उसके अच्छे रिश्ते तो हैं ही, इरान, अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों में भी उसकी नीतियां आगे बढ़ती रहीं। हमारे करीबी पड़ोस में भी उसने दबाव बनाए रखा। चूंकि उसकी तिजोरी भरी हुई है, इसलिए वह अपनी धनराशि से हमारे पड़ोसी देशों को लुभाने की कोशिश करता रहता है। हालांकि, भारत ने भी कूटनीतिक कदम उठाए और अपने करीबी देशों में आर्थिक मदद जारी रखी, खासतौर से श्रीलंका में हम अपने हितों की रक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़े।
इस वर्ष मालदीव में जो सत्ता-परिवर्तन हुआ है, उस पर भारत को कड़ी नजर रखनी पड़ेगी। माले की नई सरकार रक्षा के क्षेत्र में नई दिल्ली से दूरी बनाना चाहती है। ऐसे में, भारत को सबल दिखने की जरूरत है, क्योंकि मालदीव की सरकार को यह भान होना चाहिए कि भौगोलिक वास्तविकताओं से लड़ा नहीं जा सकता।
पश्चिम एशिया में भारतीय हितों के सामने नई चुनौतियां इजरायल पर हमास के हमले (7 अक्तूबर) से भी पैदा हुई। एक तरफ, तो भारत के संबंध इजरायल से घनिष्ठ हैं और खासतौर से सामरिक दृष्टि से भारत की विदेश नीति में इजरायल का विशेष स्थान है, दूसरी तरफ, भारत के अरब दुनिया में, विशेषकर खाड़ी देशों में व्यापक हित हैं। वहां लाखों भारतीय काम करते हैं और ऊर्जा, सुरक्षा व व्यापार एवं अर्थव्यवस्था के नजरिये से यह क्षेत्र हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली ने हमास के बर्बर हमले की ठीक निंदा की है। पहले ऐसा लगा था कि भारतीय नीति इजरायल के पक्ष में ज्यादा झुकी हुई है, लेकिन गाजा में इजरायली कार्रवाई से जैसे- जैसे नागरिकों की मौत बढ़ती गई, जो बढ़कर अब 20 हजार तक पहुंच गई है, भारत ने दूसरे देशों की तरह इजरायल को यह साफ संदेश दिया है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई बेशक उचित है, मगर इसमें बेगुनाहों पर वार नहीं होना चाहिए। भारत उचित ही इजरायल- फलस्तीन समस्या का समाधान 'दो राष्ट्रों के सुरक्षित अस्तित्व' में देख रहा है, पर लगता नहीं कि इजरायल अपना हाथ रोकेगा। उसने तो हमास को खत्म करने की मानो शपथ ले रखी है।
भारत के रिश्ते यूरोपीय संघ और अमेरिका से पूरे साल बढ़े, जो भारत के हितों के अनुकूल ही हैं। इस सिलसिले का आगे बढ़ना जरूरी भी था। यहां यह ध्यान भी रखना होगा कि भारतीय विदेश नीति के बुनियादी सिद्धांतों से कतई समझौता नहीं किया जाएगा। हमारा सबसे बड़ा सिद्धांत यही है कि भारत की विदेश नीति हमेशा स्वतंत्र रूप से काम करती रहेगी।
रूस-यूक्रेन युद्ध बदस्तूर जारी रहा। भारत ने इस पर संतुलित रूख रखा है। नई दिल्ली इसी पर जोर दे रही है कि हर देश संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों को माने। हमने यह भी कोशिश की कि यूक्रेन युद्ध से विकासशील देशों में ऊर्जा, खाद व खाद्यान्न की जो समस्याएं पैदा हो रही हैं, उनको कम किया जाए। मोदी सरकार ने रूस से ऊर्जा संबंध कायम रखने का भी उचित कदम उठाया, क्योंकि यह भारत की ऊर्जा-सुरक्षा के लिए लाभदायक है। इसमें हमारी सरकार को पश्चिम के देशों का दबाव भी झेलना पड़ा, लेकिन हमने उसे नजरंदाज किया। रूस से भारत के संबंध रक्षा के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण हैं।
यह स्वाभाविक था कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 370 पर किए गए फैसले का पाकिस्तान खंडन करे, लेकिन भारत ने उचित ही उसकी अनदेखी की। पूरे वर्ष पाकिस्तान अपनी मुश्किलों में फंसा रहा। हमारी विदेश नीति में अब पाकिस्तान को कम प्राथमिकता मिलनी चाहिए, क्योंकि भारत के सामने उसकी कोई साख नहीं है। हमने उसे साफ संदेश दे रखा है कि यदि उसकी तरफ से आतंकवाद को बढ़ावा दिया जाएगा, तो भारत मुंहतोड़ जवाब देगा, यह सही नीति है।
जाहिर है, निरंतरता और बदलाव के मिश्रण से ही विदेश नीति तैयार होती है। 2023 में जिस तरह से भारत के सामने कूटनीतिक चुनौतियां आई, उससे यह तथ्य फिर से स्थापित होता है।

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