Parliamentary Disruptions
अवधेश कुमार… भारत (India) के लोकतांत्रिक (democratic) इतिहास (History) में संसद (Parliament) के किसी सत्र में इतनी बड़ी संख्या में सांसद निलंबित (MP suspended) नहीं हुए हैं जितने मौजूदा शीतकालीन सत्र में हो चुके हैं। इस निलंबन से सतही तौर पर यही ध्वनित हुआ कि सत्तापक्ष विपक्षी दलों के विरोध को सहन नहीं कर पा रहा है। क्या यही सच है? अब जब संसद का शीतकालीन सत्र एक दिन पहले ही समाप्त हो गया तब फिर इसका उत्तर तलाशते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने अपने निलंबन से कुछ मिनट पहले एक्स पर पोस्ट किया कि अपने संसदीय जीवन में वह पहली बार प्लेकार्ड लेकर वेल यानी स्पीकर के आसन के सामने गए और अब निलंबन की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने दलील दी कि निलंबित सांसदों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए उन्होंने ऐसा किया। क्या इसके बाद यह बताने की आवश्यकता है कि अधिकांश विपक्षी सांसदों ने जानबूझकर ऐसी स्थिति उत्पन्न की, जिससे उनका निलंबन हो जाए। वे कहने को भले ही दावा करें कि उनकी आवाज दबाई जा रही है, लेकिन देश के विवेकवान लोग इससे भलीभांति परिचित हैं कि विपक्षी सांसद सुनियोजित ढंग से ऐसा कर रहे हैं। उन्हें पता है कि प्लेकार्ड लेकर वेल में जाएंगे और समझाने पर नहीं मानेंगे तो उनका निलंबन होगा। प्ले कार्ड और नारेबाजी से उनका संदेश यही था कि आप हमें किसी तरह निलंबित करिए ।
वर्तमान में अपनी गतिविधियों से विपक्ष ऐसा माहौल बनाना चाहता है, जिससे यह संदेश जाए कि मोदी सरकार संसद को सुरक्षित रखने में विफल रहने के साथ ही विपक्ष के सवालों से भी बच रही थी। यानी जब संसद सदस्य चर्चा कर नहीं सकते, आवाज उठाने पर निलंबन होगा तो फिर वहां रहें क्यों? लगता है कि देश में राजनीतिक अस्थिरता के माहौल का संदेश देने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। हाल में विधानसभा चुनावों के दौरान परास्त हुए विपक्षी दलों को संसद के माध्यम से नए सिरे से एकजुटता दिखाने का अवसर मिल गया है।
संसद की सुरक्षा में जिस प्रकार सेंध लगी, वह निःसंदेह गहरी चिंता का विषय है। उसकी गहन जांच-पड़ताल के साथ ही उस पर पर्याप्त चर्चा भी होनी चाहिए । हालांकि इसमें अड़ियल रवैया कारगर नहीं, लेकिन विपक्ष इसी पर अड़ा रहा कि संसद की सुरक्षा चूक पर गृहमंत्री शाह उत्तर दें वहीं लोकसभा अध्यक्ष का कहना था कि संसद परिसर की सुरक्षा का दायित्व उनके पास है तो वही इस पर जवाब देंगे। ऐसे में गृह मंत्री का बयान आवश्यक नहीं। इस स्थिति में बीच का कोई रास्ता असंभव हो गया। विपक्ष की रणनीति ऐसी होनी चाहिए थी, जिसमें सरकार को उत्तर देने के लिए विवश किया जाए। इसके बजाय विपक्षी सांसद संसद भवन के मकर द्वार पर धरना देते हुए सदन की छद्म कार्यवाही का आयोजन करते रहे। इसी में तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की नकल उतारी। कई सांसदों ने इसका वीडियो बनाया। सरकार का विरोध एक बात है, लेकिन विरोध का तरीका और उसमें आसन को लेकर ऐसे उपहासात्मक आचरण को देश सकारात्मक और अच्छी दृष्टि से कतई नहीं देखेगा। ऐसा करके विपक्ष ने प्रकारांतर से यही संदेश दिया कि वह केवल सरकार ही नहीं, बल्कि संसद के पीठासीन अधिकारियों भी है। लोकसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति निर्वाचन के पूर्व किसी राजनीतिक दल के सदस्य हो सकते हैं, लेकिन संवैधानिक पद पर सभी दल उनकी भूमिका को निष्पक्ष मानकर ही व्यवहार करते हैं। वर्तमान समय में विपक्ष ने इस मर्यादा को भी दुखद तरीके से तोड़ा। आप अगर जानबूझकर प्लेकार्ड और तख्तियां लेकर वेल में जाते हैं, हंगामा करते हैं तो यह आसन का ही अपमान होता है।
यह भी एक तथ्य है कि अभी तक विपक्ष के किसी नेता ने संसद पर आतंकी हमले की बरसी पर सुरक्षा में सेंध लगाने वाले लोगों की आलोचना नहीं की है। इसके विपरीत उनकी भाषा में उनके प्रति समर्थन दिखता है। कुछ ने तो उनका महिमामंडन भी किया। आखिर वे इसे आक्रोशित बेरोजगारों द्वारा सरकार की विफलताओं को प्रकट करने वाला कार्य बताकर कैसा माहौल बना रहे हैं? ऐसी घटना का समर्थन देश में अराजकता को प्रोत्साहित करेगा।
अभी तक की जांच रिपोर्ट से ऐसा कतई साबित नहीं होता कि छह लोगों के समूह का इस निंदनीय घटना के पीछे कोई सकारात्मक उद्देश्य था । ये प्रधानमंत्री मोदी, केंद्र सरकार, भाजपा और संघ परिवार के विरूद्ध अतिवादी विरोधियों द्वारा पैदा किए गए नफरत और विरोध की मानसिकता भरे हुए जान पड़ते हैं। संसद को एक स्वर से इसकी निंदा करनी चाहिए थी तथा भविष्य का ध्यान रखते हुए एकमत से ऐसे सुरक्षित उपाय पर सहमत होना चाहिए था, जिससे सुरक्षा भी सुनिश्चित होती और से आम आदमी का संसद के भीतर आवागमन भी नियमों के अंतर्गत जारी रहता । ऐसा लगता है कि विपक्षी सांसद 1989 की तरह सामूहिक त्यागपत्र देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उनकी रणनीति जो भी हो, 1989 और वर्तमान दौर की कोई तुलना ही नहीं है। तब भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर राजीव गांधी सरकार के विरूद्ध व्याप आक्रोश था । रही सही कसर वीपी सिंह के विद्रोह ने पूरी कर दी। तब विपक्ष भी आज की तरह विभाजित नहीं था। आज आइएनडीआइए में शामिल दल तमाम मतभेदों के बावजूद भाजपा विरोध के नाम पर एक मंच पर तो आए, लेकिन कई दल ऐसे हैं जो सामूहिक इस्तीफे सरीखी किसी पहल का हिस्सा नहीं बनेंगे। इसमें केवल बीजू जनता दल और वाइएसआर कांग्रेस ही नहीं, बल्कि आइएनडीआइए के कई दलों के सांसद भी शामिल हैं। खास तौर से पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम के बाद कई सदस्य अपनी बची हुई संसद सदस्यता को समाप्त करने का जोखिम नहीं लेंगे । यही कारण है कि आइएनडीआइए की बैठक में इस पर चर्चा शायद नहीं हो पाई । अच्छा यही है कि आइएनडीआइए अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करे। अगर विपक्ष के मानते हैं कि उनके मौजूदा तौर-तरीकों 2024 के आम चुनाव में उन्हें लाभ मिलेगा तो उन्हें ठहरकर विचार करने की आवश्यकता है।
Editorial

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