Shri Mrityunjay Shiv Mahapuran Katha
जयपुर (प्रा.सं.) । ऐतिहासिक शहर (Historical city) जयपुर (Jaipur) जो अपने गौरवशाली इतिहास (Glorious history) के लिए संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। इसके अलावा यहां के लोग भगवान, ऋषि- मुनियों, साधु-संतों के लिए अपार श्रद्धा रखते है । उन्नत जीवनशैली एवं अपने विरासत एवं संस्कृति को समेट जयपुर भारत में खास स्थान रखता है। धार्मिकता यहां के लोगों में कूट-कूटकर भरी होती है।
श्री मृत्युंजय शिवमहापुराण कथा से पहले जिस प्रकार लोगों ने कलश यात्रा में भाग लिया। वो अद्वितीय था, चारों तरफ भक्ति की अविरल धारा बह रही थी। पूरी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ लोगों ने इस धार्मिक आयोजन में भाग लिया । ज्ञात हो क परम पूज्य गुरूदेव सद्गुरूनाथ जी महाराज द्वारा 21 से 25 दिसम्बर 2023 तक श्री मुत्युंजय शिव महापुराण कथा का भव्य आयोजन स्वामी लीलाशाह भवन एवं डॉल्फिन स्कूल के पास, राणा सांगा मार्ग, सेक्टर-28 प्रताप नगर, जयपुर में दोपहर 1 से 4 बजे तक किया जा रहा है। कथा का सीधा प्रसारण आस्था चैनल एवं यूटूयूब द्वारा संपूर्ण भारत में होगा ।
कथा के पहले दिन 22 दिसम्बर को नारद मोह एवं शिवमहापुराण कथा विधि तथा श्रृष्टि रचना की गाथा लोगों को सद्गुरूनाथ जी महाराज के श्रीमुख से सुनने को मिला। आज कथा में गायत्री भवन, सांगानेर पशुपतिनाथ मंदिर सिद्ध पीठ मोहना के महंत श्री कमलेश जी शर्मा महाराज भी पधारे कथा के दौरान परम पूज्य संत श्री सतीश सदुरूनाथ जी महाराज ने कहा कि आज हम देखते हैं कि विश्व के हर भाग में अशांति व्याप्त है। इस अशांति के विभिन्न कारण अर्थव्यवस्था, राजनीति और धर्म की गलत व्याख्या इत्यादि है और इन सब का परिणाम है कि हर मानव दूसरे को अपना शत्रु समझ रहा है और इसी से समाज मे अशांति व्याप्त होती जा रही है। गुरूदेव ने कहा कि सनातन धर्म के अनुसार इस संसार में बैर से बैर कभी वह शांत नहीं होता है अबैर से बैर शांत होता, शत्रुता से शत्रुता समाप्त नहीं होती और क्रोध से क्रोध समाप्त नहीं होता है। यह सब जितना ही हमारे अंदर बढ़ता जाता है। उतना ही हम अपने हाथों अपने चारों तरफ नर्क निर्मित करते चले जाते हैं। संत श्री ने कहा कि नर्क कहीं और नहीं है, शत्रुता में जीना ही नर्क है। हम जितनी बड़ी शत्रुता अपने चारों ओर बनाते हैं हमारा नर्क उतना ही बड़ा हो जाता है।
इसके विपरीत हम जितनी बड़ी मित्रता अपने चारों ओर बनाते हैं उतना ही बड़ा स्वर्ग हमारे आसपास निर्मित हो जाता है। दरअसल स्वर्ग और नर्क कोई भौगोलिक स्थानों का नाम नहीं है या मनोदशा है। मित्रता के भाव और मित्रों के बीच जीने का नाम ही स्वर्ग है और शत्रुता का भाव शत्रुओं के बीच जीने का नाम नर्क है। गुरूदेव ने मनुष्य को एक-दूसरे के प्रति प्रेम व सम्मान के भाव को रखने की बात कही।
Editorial

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