रशीद किदवई. मंगलवार (Tuesday) को 'इंडिया' ('India') ब्लॉक की बैठक महत्वपूर्ण रही। लोकसभा चुनाव में अब बहुत कम समय बचा है, इसलिए इस गठबंधन के तमाम दलों के लिए 'करो या मरो' जैसी स्थिति है। यह सही है कि वैचारिक रूप से इनमें मतभेद है और राजनीतिक संस्क


Opposition Unity
रशीद किदवई …. मंगलवार (Tuesday) को 'इंडिया' ('India') ब्लॉक की बैठक महत्वपूर्ण रही। लोकसभा चुनाव में अब बहुत कम समय बचा है, इसलिए इस गठबंधन के तमाम दलों के लिए 'करो या मरो' जैसी स्थिति है। यह सही है कि वैचारिक रूप से इनमें मतभेद है और राजनीतिक संस्कृति के कई मानकों पर यह गठबंधन खरा नहीं उतरता, फिर भी एनडीए सरकार को सत्ता से हटाने के उद्देश्य से विपक्षी दल एक साथ आए हैं, और अब धड़ाधड़ फैसले ले रहे हैं। मंगलवार की बैठक में भी कई बातों पर सहमति बनी, हालांकि जल्दबाजी में ऐसे प्रस्ताव भी आए हैं, जिन पर समान राय संभव नहीं, फिर भी विकल्पहीनता की स्थिति में उनको स्वीकार किया जा रहा है।
बैठक में सबसे पहला सवाल तो यही आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसे चेहरा बनाया जाए ? पहले विपक्ष ऐसा करने से कतरा रहा था, लेकिन राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों ने उसके मत को हिला दिया है। इसी कारण, ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे किया, क्योंकि वह दलित समाज से आते हैं, और उनके पास पर्याप्त राजनीतिक अनुभव भी है। यह माना गया है कि 'इंडिया' में उनका शायद ही विरोध होगा। अरविंद केजरीवाल ने तो तत्काल इस पर अपनी सहमति भी दे दी। हालांकि, कयास यह भी है कि खड़गे मई तक इस भूमिका में रह सकते हैं, ताकि मायावती जैसी नेताओं और दलित मतदाताओं को गठबंधन की तरफ लुभाया जा सके, जिससे 30 फीसदी जनाधार को अपने पक्ष में किया जा सकता है। इसके बाद, किसी अन्य का नाम आगे किया जा सकता है, जिसके कई उदाहरण भारतीय राजनीतिक इतिहास में भी हैं। मसलन, 1989 के आम चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ नेशनल फ्रंट बना था और उसका चेहरा थे देवी लाल, लेकिन चुनाव के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने। इसी तरह, साल 2004 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी केंद्रीय भूमिका में थीं, मगर कुरसी मिली मनमोहन सिंह को । इससे काफी पहले, सन् 1977 के लोकसभा चुनाव में भी इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण खड़े थे, लेकिन मोरारजी देसाई के नाम पर सहमति बनी। वैसे भी, अभी विपक्ष के अंदर जिस तरह से शह और मात का खेल चल रहा है, उसमें कांग्रेस अध्यक्ष का नाम सामने आना चौंकाता नहीं है।
यहां नीतीश कुमार के लिए कहानी खत्म नहीं हुई है। बेशक अभी वह दबाव की राजनीति कर रहे हैं, जिसमें लालू प्रसाद यादव का साथ उन्हें मिल रहा है, लेकिन मुमकिन है कि अगली बैठक में उनको गठबंधन का संयोजक बना दिया जाए। इसके पीछे न सिर्फ जातीय समीकरण (पिछड़ा वोट) काम कर रहा है, बल्कि हिंदी पट्टी (नीतीश कुमार) और दक्षिण (मल्लिकार्जुन खड़गे) का गठजोड़ भी मददगार बन रहा है। नीतीश के आगे आने पर के चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक, जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं को लेकर भी उम्मीद बढ़ सकती है, जो फिलहाल 'इंडिया' का हिस्सा नहीं हैं, क्योंकि नीतीश कुमार के साथ इनके अच्छे ताल्लुकात हैं। इसी तरह, उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ कांग्रेस के प्रमोद तिवारी और राजीव शुक्ला के मधुर संबंध हैं, जिसका लाभ मल्लिकार्जुन खड़गे को मिल सकता है। अगर खड़गे और नीतीश की जोड़ी बनती है, तो कई तटस्थ नेता 'इंडिया' का हिस्सा बन सकते हैं।
रही बात सीटों के बंटवारे की, तो ममता बनर्जी के मुताबिक, 31 दिसंबर तक इस पर सहमति बन जाएगी। इसके लिए उन्होंने एक व्यावहारिक रास्ता भी सुझाया है। बैठक में उन्होंने कहा कि वाम दलों से उनका स्वाभाविक मतभेद है, लेकिन पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती हैं। ऐसे में, 42 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में 35 सीटों पर तृणमूल लड़े, जबकि शेष सात सीटों पर कांग्रेस और वाम दल आपसी रजामंदी से उम्मीदवार खड़ा करें। इससे तृणमूल और वाम दल, दोनों का सम्मान बच जाएगा। परोक्ष रूप से वह यही कहना चाहती थीं कि जो जहां मजबूत है, वहां उसकी दावेदारी तय की जानी चाहिए।
यह रास्ता गलत भी नहीं लगता। अगर इस गणित को डाटा साइंस जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी से सुलझाया जाए, तो कई सीटों पर सहमति बनाने में मुश्किल नहीं आएगी। जैसे, जिन सीटों पर गठबंधन का जो दल जीता है, उस पर उसे स्वाभाविक दावेदार माना जाए, और जहां जो पार्टी भाजपा के खिलाफ दूसरे स्थान पर रही और हार का अंतर काफी कम रहा हो, वहां उसे मौका दिया जाएगा। इस तरह, तकरीबन 300 सीटों का समाधान निकल सकता है। शेष सीटों के लिए 'आदान-प्रदान की रणनीति' अपनाई जा सकती है। मगर हां, यह काम ईमानदारी से होना चाहिए। पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में ही राजद ने कांग्रेस को अनावश्यक ही अधिक सीटें दे दी थीं, जिससे तेजस्वी यादव को नुकसान उठाना पड़ा था।
चुनाव प्रबंधन पर विपक्षी दलों को खासा काम करना होगा। नेताओं को क्या कहना चाहिए, यह तो स्पष्ट है, लेकिन क्या नहीं कहना चाहिए, यह उन्हें बताया जाना चाहिए। सनातन विवाद इसका ज्वलंत उदाहरण है। ईवीएम जैसे मुद्दों पर भी बेजा रोने के बजाय गठबंधन चाहे तो सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज न्यायमूर्ति मदन लोकुर की रिपोर्ट का हवाला दे सकता है कि आखिर क्यों अन्य देशों में इसका इस्तेमाल बंद किया गया? चुनाव प्रबंधन जैसे कामों में अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, जिन्होंने दिल्ली और पंजाब में अपनी कथनी और करनी में काफी हद तक समानता दिखाई है। सोनिया गांधी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को इसलिए कुशलता से चला सकीं, क्योंकि उन्होंने किसी के खिलाफ काम नहीं किया। नतीजतन, यह गठबंधन दो बार सत्तासीन हुआ । मल्लिकार्जुन खड़गे के पास भी यह इतिहास दोहराने का मौका है। उन्हें हर व्यक्ति को उसकी खासियत देखकर भूमिका देनी होगी । इसमें वह अपने राजनीतिक अनुभव का लाभ उठा सकते हैं। यह सही है कि कई राज्यों में गठबंधन में आपसी मतभेद हैं, पर समान विचारधारा न होने और राजनीतिक- सामाजिक सोच भिन्न होने बावजूद आम सहमति बनाई जा सकती है। इस गठबंधन में किसी पार्टी का नेतृत्व की भूमिका में न होना बड़ी समस्या है। कांग्रेस जरूर कागज पर सबसे ऊपर है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस भी उससे बहुत पीछे नहीं है। फिर भी, बैठक में इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया गया। उम्मीद है, अगली बार गठबंधन कहीं अधिक सार्थक रणनीति के साथ सामने आएगा।
Editorial

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