Pratahkal-Marathi Nameplate Issue: 80 percent shops changed their nameplates, Municipal Corporation will take action against 28

मुंबई । मंगलवार से मराठी नामफलक (Marathi Nameplate) के नियम का पालन नहीं करनेवाले दुकानों और आस्थापनों के विरुद्ध महानगरपालिका की कार्यवाही शुरु हो जायेगी। हालांकि इस बार ज्यादातर दुकानों ने अपने नामफलक बदल लिये हैं। साथ ही, दुकानदारों के संगठन भी अब इस मसले पर आगे और कानूनी लड़ाई लडने और मनपा (Municipal Corporation) की इस कार्यवाही को चुनौती देने के मूड में नहीं नजर आ रहे।
28 नवंबर से उन दुकानों के विरुद्ध मनपा कार्यवाही शुरु हो जायेगी जिनके नामफलक मराठी भाषा में नहीं होंगे। मनपा इससे पहले भी कार्यवाही कर रही थी लेकिन नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। अब 25 सितंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने ही दुकानों के नामफलक बदलने के लिये दुकानदारों को दो महीनों की मोहलत दी थी। यह मोहलत 28 नवंबर को समाप्त हो रही है।
फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन (एफआरटीडब्ल्यूए) के अध्यक्ष विरेन शाह के मुताबिक, 80 फीसदी से ज्यादा दुकानों ने पहले ही या तो अपने नामफलक बदल दिये हैं या फिर बदलने की प्रक्रिया में हैं। हालांकि साइनबोर्ड मेकर्स की कमी के चलते नामफलक बदलने में थोड़ा ज्यादा वक्त लग रहा है। इसमें दुकानदारों को काफी खर्च भी करना पड़ रहा है जो एक मसला तो है। इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की अगली तारीख दिसंबर के पहले सप्ताह में होगी। लेकिन एसोसिएशन अब मुद्दे पर और ज्यादा कानूनी लड़ाई के पक्ष में नहीं है। शाह के मुताबिक, अब जब दुकानदारों ने नामफलक बदलने की प्रक्रिया शुरु कर दी है तो सरकार और मनपा को इस लिहाज से इस मामले में आगे कार्यवाही का रूख तय करना चाहिये।
उधर मनपा अधिकारियों की मानें तो इस मामले में अब और अधिक मोहलत नहीं दी जायेगी। नियम पालन नहीं किया तो प्रति कर्मचारी दो हजार रुपये का जुर्माना वसूलना तय है। मनपा आकलन के मुताबिक, अभी 20 फीसदी दुकानों ने अपने बोर्ड नियमानुसार नहीं बदले हैं।
इसी तरह, नवी मुंबई महानगरपालिका ने भी मराठी नामफलक के नियम को लेकर अपनी कमर कस ली है। सभी दुकानों को इस बाबत निर्देश जारी किये गये हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब नवी मुंबई महानगरपालिका भी नियम का पालन नहीं करनेवाले दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई के लिये पूरी तरह तैयार है।
Editorial

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