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महिला सुरक्षा से भी देश की समृद्धि
By EditorialPublished on
अर्चना शर्मा….. पिछले साल भारत में महिलाओं के 2021 की खिलाफ आपराधिक मामले में चार फीसदी बढ़ गए। तुलना इनमें से ज्यादातर मामले (31.4 प्रतिशत) पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता के हैं। यही नहीं, दिल्ली अब भी महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर है, जहां प्रतिदिन बलात्कार के औसतन तीन मामले दर्ज होते हैं।

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अर्चना शर्मा….. पिछले साल भारत में महिलाओं के 2021 की खिलाफ आपराधिक मामले में चार फीसदी बढ़ गए। तुलना इनमें से ज्यादातर मामले (31.4 प्रतिशत) पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता के हैं। यही नहीं, दिल्ली अब भी महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर है, जहां प्रतिदिन बलात्कार के औसतन तीन मामले दर्ज होते हैं। गौर कीजिए, यह देश के 19 प्रमुख शहरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध का 29 फीसदी है। ये तमाम आंकड़े हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट से उजागर हुए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में महिलाएं आज भी हिंसा की शिकार हो रही हैं। एक अन्य हालिया अध्ययन में, जिसमें हरियाणा में 2015 से 2018 के बीच दर्ज की गई करीब चार लाख उन एफआईआर का विश्लेषण किया गया है, जिनमें महिलाओं ने विभिन्न अपराधों की शिकायत की थी, यह भी स्पष्ट हुआ है कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में विभिन्न स्तरों पर भेदभाव किया जाता है। इस पर टिप्पणी करते हुए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, जांच और सुनवाई के दौरान महिला फरियादियों के खिलाफ अमूमन अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता, पुलिस उनको गंभीरता से नहीं लेती और कभी-कभी तो अदालती कार्यवाही में भी लापरवाही बरती जाती है।
साल 2010 के एक मामले में देश की शीर्ष अदालत ने कहा भी था कि अपने खिलाफ हमले और हिंसा के ज्यादातर मामले महिलाएं आवेश में मामूली शिकायतों पर दर्ज कराती हैं। गौर कीजिए, एनसीआरबी की रिपोर्ट में दर्ज मामलों का ही जिक्र किया जाता है, वास्तविक संख्या का नहीं, जिसके कारण उन मामलों की आशंका बनी रहती है, जो किसी न किसी कारणवश दर्ज नहीं हो पाते। भारत में अंतरंग-साथी के साथ हिंसा काफी आम बात है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2019-21 के अनुसार, करीब 31.5 फीसदी महिलाएं 15 साल की उम्र के बाद कम से कम एक बार शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती हैं। कई महिलाओं के लिए रिपोर्ट दर्ज कराना मुश्किल होता है या फिर सामाजिक प्रतिशोध, कलंक, पुलिस स्टेशनों में अनुचित व्यवहार और यातनापूर्ण न्यायिक प्रणाली के डर से रिपोर्ट न कराने का दबाव उन पर डाला जाता है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, महज 5.2 प्रतिशत पीड़िता शारीरिक या यौन हिंसा के मामलों में पुलिस से मदद मांगती हैं। यहां तक कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे उच्च साक्षरता दर वाले सूबों में भी महिला अपराधों का दर्ज करने की दर कम है, जिससे पता चलता है कि इसका साक्षरता से कोई रिश्ता नहीं है विश्व स्तर पर भी हिंसा के खिलाफ पुलिस से मदद मांगने वाली महिलाओं का प्रतिशत 10 से कम है। 'निर्भया' मामले के बाद कानूनी स्तर पर कई तरह के बदलाव किए गए, पर समाधान के रूप में उनका प्रभाव बहुत सीमित रहा है। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि क्रियान्वयन प्रक्रिया में सुधार आवश्यक है, और उन्होंने इसे पारदर्शी बनाने की वीडियोग्राफी कराने, समय पर आरोप-पत्र दाखिल करने और पीड़िताओं में विश्वास बढ़ाने के उपाय करने का सुझाव दिया है। जैसा कि एक हालिया शोध अध्ययन में कहा गया है, पीड़िता को अधिक सहानुभूति और संवेदनशीलता की जरूरत है, क्योंकि लंबे समय तक चलने वाले अदालती मामलों में वे रोजाना अपमानित होती हैं... इससे उनमें यह बात पैठ जाती है कि तंत्र आरोपी के अनुकूल है।
साल 2022 के अंत में, देश की विभिन्न अदालतों में करीब पांच करोड़ मामले लंबित थे। एक कानूनी विशेषज्ञ ने यह भी अफसोस जताया कि कई मामलों में जांच और मुकदमे के दौरान गवाह मुकर जाते हैं... और पीड़िता को अदालत के बाहर समझौता करने के लिए मजबूर किया जाता है। इस कारण अपने देश में अपराधी की सजा की दर काफी कम है। 2021 में दोष साबित होने की दर सिर्फ 26.5 फीसदी थी, जबकि साल 2020 की यह 29.8 फीसदी थी। वर्ष 1993 में, संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा को खत्म करने के अपने घोषणापत्र में बताया था कि ऐसे अपराध उन समाजों में होते हैं, जो जेंडर के लिहाज से पारंपरिक रूप से असंतुलित हैं। ड्रग्स और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से पुरूषों द्वारा लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का करने, जांच प्रक्रिया पुरूषों के लिए तैयार की गई आपराधिक न्याय प्रणाली में महिलाओं को प्रतिनिधित्व तो बहुत कम दिया जाता है, पर बतौर पीड़ित उनकी सहभागिता काफी ज्यादा होती है।
विश्व स्तर पर करीब 30 फीसदी महिलाओं ने माना है कि वे जीवन में अंतरंग साथी या गैर- साथी द्वारा कम से कम एक बार शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार हुई हैं। पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत से कम है, जबकि न्यायपालिका में उनकी सहभागिता 70.9 प्रतिशत (फ्रांस) से लेकर 3.8 फीसदी (नेपाल) तक है। भारत में पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 12 फीसदी है, जबकि 28 फीसदी निचली अदालतों में, 12 फीसदी उच्च न्यायालयों में व 9.6 प्रतिशत जेल प्रशासन में (सभी स्तरों पर ) है । विश्व के 162 देशों में घरेलू हिंसा व 147 मुल्कों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून पारित होने के बावजूद महिलाओं व लड़कियों से जुड़े अपराध खुद उन पर और समाज व अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। इसके कारण हर वर्ष विश्व को 1.5 ट्रिलियन डॉलर (2022 में विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार) और कई देशों को अपनी जीडीपी का 1.2 से 3.7 फीसदी तक आर्थिक नुकसान होता है ।
अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में अंतरंग- साथी की एक हिंसक घटना से औरत औसतन पांच दिन काम पर नहीं जा पाती है। चूंकि भारत तेजी से आर्थिक विस्तार कर रहा है, इसलिए श्रम बाजार में स्त्रियों की भागीदारी और उनमें कौशल विकास को बढ़ावा देना काफी महत्वपूर्ण है। जाहिर है, महज कानून बनाना काफी नहीं, ईमानदारी से उनका पालन भी जरूरी है। बचपन से ही लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देने से लैंगिक असमानता, रूढ़िवादिता और जेंडर आधारित हिंसा खत्म करने में मदद मिल सकती है, जिससे कार्यस्थल, सार्वजनिक जगह और घर कहीं अधिक सुरक्षित बन सकेंगे।

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