Hindu Temple Destruction
हृदयनारायण दीक्षित…. भारतवासी मंदिरों (indian temples) और मूर्तियों (statues) में प्राण (Life) और देवतत्व (divinity) मानते हैं। अयोध्या, मथुरा, काशी और सोमनाथ आदि मंदिर भारत के मन में गहराई से रचे बसे हैं। ऐसे सैंकड़ों मंदिर मध्यकाल (temple medieval period) में ध्वस्त किए गए थे । वाराणसी (Varanasi) और मथुरा (Mathura) के ध्वस्त मंदिर प्रत्यक्ष हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। कोई अनाड़ी भी इन्हें देखकर बता सकता है कि मंदिर को गिराकर इस्लामी उपासना स्थल बनाए गए। कमोबेश ऐसी ही स्थिति अन्य प्रतिष्ठित मंदिरों के ध्वंस की है। मंदिर भारतीय संस्कृति और परंपरा में उपास्य हैं। मंदिर ध्वस्तीकरण की प्रत्येक घटना ने भारतवासियों के दिल दिमाग में गहरे घाव दिए हैं। ध्वस्तीकरण की घटनाओं के अवशेष भारत को अपमानित करते हैं। मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर का ध्वंस हुआ था। इसके निकट मंदिर से सटी ईदगाह मस्जिद बनाई गई थी। मंदिर का पुराना निर्माण और बाद में तोड़कर बनाया गया मस्जिदनुमा ढांचा प्रत्यक्ष दिखता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यहां एडवोकेट कमिश्नर की मांग स्वीकार कर ली है। कथित मस्जिद पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इसका विरोध किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग खारिज कर दी है। कुछ समय पहले न्यायालय ने वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर की जांच के लिए भी वकील कमिश्नर नियुक्त किया था ।
कोर्ट-कचहरी की बात अलग है। श्रीकृष्ण भारत के हृदय में बसे हैं। वह संपूर्ण मनुष्य हैं और पूर्ण अवतार । इन्हीं श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मंदिर का ध्वंस हुआ था । यह सत्य तथ्य है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के सामने एक शिलापट पर अंकित है, यहां कंस के कारागार में 3168 ईसापूर्व श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था । इस स्थान से अनेक ब्राह्मी शिलालेख और पुरातात्विक लेख प्राप्त हुए हैं। ईसापूर्व पहली सदी में शक शासनकाल में जन्म स्थान पर वासुदेव कृष्ण मंदिर तोरण द्वार विद्यमान था । गुप्त सम्राट ने एक भव्य मंदिर बनवाया था। यह मंदिर चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के समय भी था । इसे गजनी के मोहम्मद ने नष्ट किया था। राजा विजयपाल के द्वारा यह फिर से बनवाया गया। सिकंदर लोदी द्वारा फिर तोड़ा गया। ओरछा नरेश ने फिर बनवाया। औरंगजेब ने इसे गिराकर आधे भाग में ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया। हमलावर इस मंदिर को बार-बार ढहाते थे। श्रद्धालु इसे बार- बार बनाते थे। दिल्ली की 'कुव्वत उल इस्लाम' मस्जिद, अजमेर की 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' मस्जिद जैसे अनेक उपासना स्थल मंदिर गिराकर बनाए गए हैं। मंदिर ध्वस्तीकरण के पीछे हिंदू अपमान का एजेंडा रहा है।
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का विवाद लंबे समय तक चला। अयोध्या आंदोलन के दौरान समूचे देश में हिंदू अपमान को लेकर उत्ताप था। उन्हीं दिनों 1991 में उपासना स्थल अधिनियम बना। अधिनियम में व्यवस्था है कि देश के सारे मंदिर 1947 की यथास्थिति में रहेंगे। इस अधिनियम का अर्थ खतरनाक है कि हिंदू ध्वस्त मंदिरों की यथास्थिति स्वीकार लें। मंदिर तोड़कर बनाए गए उपासना स्थल राष्ट्रीय अपमान हैं। इसलिए उक्त अधिनियम राष्ट्र हितैषी नहीं है। जबकि विधि का उद्देश्य तो लोककल्याण होता है, लेकिन इस कानून में ऐतिहासिक राष्ट्रीय अपमान पर चुप रहने के उपदेश हैं। इस अधिनियम पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। अच्छी बात है कि सर्वोच्च न्यायपीठ में इस पर विचार हो रहा है।
उपासना स्थल तोड़े जाने का अपराध मध्यकालीन हमलावरों एवं शासकों ने किया। राष्ट्र को नीचा दिखाने वाले ऐसे सभी स्मारक मिटा देने की आवश्यकता है। यह हर भारतवासी का अधिकार है और कर्तव्य भी । अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुलामी के प्रतीकों को उखाड़ फेंकने का काम किया है। जैसे पोलैंड ने स्वतंत्रता मिलने पर रूसी शासन की स्मृतियां मिटाने के लिए रूढ़िवादी चर्च हटाए । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से 'पांच प्रण' लेने का आह्वान किया, जिनमें गुलामी के प्रतीकों को हटाने का प्रण महत्वपूर्ण है। हिंदू उपासना स्थल ढहाने, विकृत करने और उन्हीं स्थानों पर इस्लामी उपासना स्थल बनाने का लक्ष्य हिंदुओं को नीचा दिखाना था। हजारों मंदिर ध्वस्त करने का आखिर मकसद क्या था? तैमूर ने बताया था कि, हमलों का मकसद हिंदुस्तान को झूठी आस्था और बहुदेववाद से मुक्त करना है, जिसके लिए मंदिरों को नष्ट करना जरूरी है। 'कुव्वत उल इस्लाम' मस्जिद के नाम में ही इस्लाम की ताकत का उल्लेख है। मंदिर ध्वंस की ऐसी सारी घटनाएं हिंदू मन में कांटे की तरह चुभती हुई पुराने घाव ताजा करती हैं। इसके बावजूद सेक्युलर लिबरल तत्व हिंदू अपमान के इस मामले में मौन रहते हैं। लटे वे श्रीकृष्ण और श्रीराम को कल्पना बताकर आनंदित होते रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद देश को गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति दिलाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए था, लेकिन अपमानजनक अत्याचारों एवं ध्वस्त मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम नहीं हुआ। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार राष्ट्रीय पौरूष - पराक्रम का प्रतीक था । श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण अंतिम चरण में है । विदेशी हमलावरों और औरंगजेब जैसे शासकों ने जहां-जहां मंदिर ध्वंस किए थे, वहां-वहां अब सभी उपासना स्थलों के जीर्णोद्धार / पुनर्निर्माण की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा हैं। उपासना स्थल ध्वंस का कृत्य राष्ट्रीय अस्मिता का अपमान है। इसकी भरपाई उपासना स्थल अधिनियम से संभव नहीं । आक्रांताओं और मुगल शासकों द्वारा तोड़े गए प्रत्येक हिंदू उपासना स्थल की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक आयोग बनाया जा सकता है। हिंदू मन मथुरा काशी सहित सभी उपासना स्थलों के ध्वंस की दुखद स्मृतियों से छुटकारा चाहता है। सुख है कि अयोध्या से विदेशी आक्रांता बाबर का भूत भगा दिया गया है। काशी और मथुरा पर न्यायालय विचार कर रहा है। पहले से ही काफी देर हो गई है। राष्ट्रीय अस्मिता के अपमान की घटनाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती। राष्ट्रीय अपमान के तथ्य सुस्पष्ट एवं प्रत्यक्ष हैं । ध्वंस मंदिर स्वयं में साक्ष्य हैं और प्रमाण हैं। सभी सामाजिक राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाएं इस पर विचार करें और तद्नुसार निर्णय लें। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)
Editorial

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