Gangsters Abroad
विभूति नारायण राय…. दूरियों के मामले में तेजी से सिकुड़ती दुनिया (shrinking world) में यह तो बहुत स्वाभाविक (Natural) ही है कि अपराध भी ग्लोबल हो गया है, पर कोई भी समाज वैश्वीकरण (society globalization) की इस प्रक्रिया का अंग बनने पर गौरवान्वित नहीं महसूस करेगा और निश्चित रूप से भारतीय समाज भी इस मामले में अपवाद नहीं हो सकता। पिछले कुछ वर्षों में थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा और अमेरिका के कुछ शहर उन केंद्रों के रूप में उभरे हैं, जिनमें बैठकर भारत के बड़े गैंगस्टर देश के अंदर संगठित अपराध की गतिविधियां संचालित कर रहे हैं।
राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक समृद्ध इलाके में 7 दिसंबर को दिन के एक ऐसे समय में, जब उस इलाके में चहल- पहल थी, सुरक्षा के घेरे में रहने वाले राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के मुखिया सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की हत्या एक ऐसी ही घटना है, जिसके तार विदेशी जमीन पर बैठे बड़े गैंगस्टर से जुड़े हैं। अपुष्ट सूचनाओं के अनुसार, उत्तरी अमेरिका के किसी शहर में बैठे इस गैंगस्टर ने भारत में भाड़े के दो हत्यारों से सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की हत्या कराई। हत्यारे कितने हृदयहीन और पेशेवर थे, इसका पता उनके इस व्यवहार से चलता है कि उन्होंने मौके से जाते-भागते हुए उस व्यक्ति को भी मार दिया, जिसके जरिये वे अपने शिकार तक पहुंचे थे। इन दो हत्यारों में से एक तो भारतीय सेना का सेवारत सदस्य था। गनीमत है, हत्यारे पकड़ में आ गए हैं। अब उम्मीद की जा सकती है कि उनके विदेशी आकाओं तथा भारतीय जमीन पर उनकी गतिविधियों के बारे में पर्याप्त जानकारी पुलिस और दूसरी एजेंसियों को हो चुकी होगी। इससे विदेशी धरती पर बैठे साजिश रचने वाले की शिनाख्त तो हो जाएगी, पर ऐसे नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी ही होगी कि अब उसे या उन्हें यहां लाकर दंडित कराया जा सकेगा। प्रत्यर्पण एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है और जिसमें अभी तक तो भारतीय एजेंसियों की सफलता का प्रतिशत इतना कम है कि उसे नगण्य ही कहा जा सकता है। हालिया घटनाओं में एक चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें लिप्त गैंगस्टरों में से कई पंजाब से जुड़े हैं और उनके जाने-अनजाने उनका इस्तेमाल पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी मृतप्राय खालिस्तान आंदोलन को पुनर्जीवित करने के लिए कर रही है। पंजाबी के एक रैप सिंगर सिद्ध मूसेवाला की हत्या भी एक ऐसा ही मामला था, जिसमें पैसा, शोहरत, खालिस्तान और अपराध जैसे कई मसले गड्डमड्ड थे। इस हत्या में विदेशी धरती और भारतीय जेलों में बैठे गैंगस्टर शरीक थे । इन दिनों कनाडा की धरती ऐसी सांठगांठ का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां भारत से भागे हुए बहुत सारे अपराधी शरण लिए हुए हैं। इनमें से कइयों के खिलाफ पंजाब में पृथकतावादी गतिविधियों में भाग लेने के कारण गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, पर लाख सर पटकने के बावजूद भारतीय एजेंसियां उन्हें देश वापस लाने में सफल नहीं हो पा रही हैं।
कनाडा में तो प्रधानमंत्री जस्टिन ट्र्डो अपनी आंतरिक राजनीतिक मजबूरियों के चलते कई बार खालिस्तान समर्थकों को प्रोत्साहन देते हुए से दिखते हैं। उनके वोट बैंक में एक बड़ी संख्या भारत से गए सिखों की है और इन पर अपने पंथ या अपने धर्मस्थल से जुड़ी राजनीति का बड़ा प्रभाव है। दुर्भाग्य से कई महत्वपूर्ण धर्मस्थलों पर खालिस्तान समर्थकों का कब्जा है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रत्यर्पण बड़ा संवेदनशील मुद्दा है। इस मसले में दो देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि होना ही पर्याप्त नहीं है, इसके अतिरिक्त अलग-अलग देशों की न्यायिक प्रणाली की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मसलन, यूरोपीय व अमेरिकी देशों में अदालतें मानवाधिकार के नाम पर तरह- तरह की अड़चनें डालती रहती हैं। दुर्भाग्य से इस सिलसिले में भारतीय पुलिस और जेलों की साख बहुत अच्छी नहीं है। कई बार तो बड़े दिलचस्प तर्क अभियुक्तों की तरफ से दिए जाते हैं । भगोड़े आर्थिक अपराधी नीरव मोदी को प्रत्यर्पण से बचाने के लिए उसके गवाह के तौर पर पेश हुए भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के एक अवकाशप्राप्त न्यायाधीश ने ब्रिटिश डिस्ट्रिक्ट जज के सामने बयान दिया था कि भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार भरा हुआ है, इसलिए नीरव को वहां न्याय की उम्मीद नहीं है। हालांकि, ब्रिटिश डिस्ट्रिक्ट जज से उन्हें झिड़की ही मिली कि जिस संस्था में वह सर्वोच्च पद तक पहुंचे, रिटायर होने के बाद उसमें उन्हें भ्रष्टाचार नजर आने लगा है। एक दूसरे आर्थिक अपराधी विजय माल्या के वकीलों ने महीनों लंदन की अदालतों में तर्क दिए कि भारतीय जेलें मनुष्यों के रहने लायक या सुरक्षित नहीं हैं, लिहाजा उनके मोवक्किल को प्रत्यर्पित न किया जाए। इसी तर्क पर महीनों उनके मुकदमे फैसला नहीं हो सका। एक खूंखार भगोड़े अबू सलेम को तभी प्रत्यर्पित कराया जा सका, जब भारत सरकार ने संबंधित अदालत में गारंटी दी कि उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा। पिछले दिनों केवल संयुक्त अरब अमीरात से अपेक्षाकृत कम दिक्कतों से अपराधियों को भारत लाया जा सका है, पर यह संभवत दोनों देशों के बीच शीर्ष नेतृत्व के बीच अच्छे संबंधों के कारण संभव हुआ है। जैसे-जैसे भारत आर्थिक महाशक्ति बन रहा है, उसकी राजनयिक ताकत बढ़ जरूर रही है, पर इतनी भी नहीं कि उसके लिए पश्चिमी दुनिया के देश अपने वैधानिक और सामाजिक मूल्यों को नजरअंदाज कर दें। जरूरी है कि हम अपनी पुलिस, जेलों और अदालतों को ज्यादा जिम्मेदार बनाएं। यह चूहे बिल्ली का खेल है, जिसमें बिल्ली को ज्यादा सक्रिय बनाना होगा। अभी तो चूहे तेज खेल रहे हैं। यह पूछना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जिस तरह से गैंगस्टर ग्लोबल हुए हैं, क्या उसी रफ्तार और अनुपात में उनसे मुकाबला करने वाली संस्थाएं भी ग्लोबल हुई हैं? डीपफेक या संपर्क के लिए इंटरनेट के आधुनिकतम तरीकों का इस्तेमाल करने वाले अपराधियों के बरक्स क्या उनके विरोधी एजेंसियों की दक्षता उनके मुकाबले की है? ये सारे सवाल हैं, जिनके जवाब खोजने ही होंगे। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने स्थिति और गंभीर बना दी है। इनका मुकाबला संसाधनों और बेहतर प्रशिक्षण से सुसज्जित पुलिस बल ही कर सकते हैं।
सुखदेव सिंह गोगामेड़ी जैसी हत्याएं रूकेंगी नहीं, हमें इस तरह की अधिक वारदात के लिए तैयार रहना होगा। इन्हें रोकने या इनके नुकसान को कम करने का एक ही उपाय है कि हम उनके मुकाबिल संस्थाओं को अधिक पेशेवर बनाएं और अधुनातन उपकरणों से सुसज्जित करें।
Editorial

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