modi
नई दिल्ली (एजेंसी)। तू डाल-डाल मैं पात-पात । यही है मोदी काल की पहचान । विश्वसनीयता के आधार पर पहले हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में अभूतपूर्व जीत और फिर सरकार गठन में सधी हुई राजनीति । ऐसी राजनीतिक जातिगत जनगणना को धार देकर आधार बनाने वालों के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह संकेत है कि विपक्षी दल 2024 से पहले लड़ाई के लिए नई पिच तैयार करें, वरना आगे केवल बाउंसर ही झेलने पड़ सकते हैं। भाजपा (bjp) ने तीन संदेश मुख्यतौर पर दिए हैं- भाजपा विकास और शुद्ध राजनीति दोनों में फिलहाल आगे है। भाजपा में हर किसी के लिए ऊपर तक जाने का रास्ता खुला है और पार्टी में नेतृत्व इतना मजबूत है कि मोदी की गारंटी से मुकाबला नहीं हो सकता ।
3 दिसंबर को चुनावी राज्यों का नतीजा आ गया था और तब से मुख्यमंत्रियों के नामों को लेकर चर्चा छिड़ी थी। कांग्रेस (congress) की ओर से चुटकी भी ली जाने लगी थी कि भाजपा की अंदरूनी लड़ाई के कारण फैसला नहीं लिया जा पा रहा है। वस्तुतः विपक्ष अभी तक यह नहीं समझ पाया है कि 2014 के बाद से केंद्रीय राजनीति की धुरी और दायरा दोनों बदलता जा रहा है । जो इसे नहीं समझ पा रहे हैं, वह दायरे से भी बाहर होते जा रहे हैं। देरी का मुख्य कारण यह था कि भाजपा नेतृत्व यहां से राजनीतिक विमर्श का नया दांव रखना चाहता था। पांच राज्यों के चुनाव में राहुल गांधी (rahul gandhi) समेत पूरी कांग्रेस का मुख्य नारा जातिगत जनगणना था । वही जातिगत जनगणना जिसका कि कांग्रेस पारंपरिक रूप से विरोध करती रही है। भाजपा ने छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी विष्णुदेव साय
(Vishnudev sai)
को मुख्यमंत्री बनाया, मध्य प्रदेश में मोहन यादव (Mohan Yadav) के रूप में ओबीसी को चुनकर चौंकाया तो राजस्थान में भजनलाल शर्मा (Bhajanlal Sharma) के रूप में ब्राह्मण के हाथ कमान दी ।
ध्यान रहे कि मोदी काल में ही पहली बार एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति भी बनी हैं। गुजरात के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय का प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) के लिए समर्थन भी बढ़ा था । मोहन यादव के रूप में फिलहाल केवल भाजपा के पास एक यादव मुख्यमंत्री है। इस दांव के बाद जहां बिहार, उत्तर प्रदेश समेत पूरे उत्तर भारत के यादव वोटरों को संदेश दिया गया है वहीं भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट रूप से बताया गया है कि केवल भाजपा में ही हर किसी के लिए ऊपर तक जाने की संभावना है। दूसरी पार्टी में जहां केवल धन, बल, चेहरा और परिवार के बल पर पद हासिल किए जाते हैं तो भाजपा में अनजान चेहरा मुख्य चेहरा बन सकता है। खासतौर से युवाओं को पार्टी के साथ सीधे तौर पर जोड़ने में यह पहल अहम होगी । वस्तुतः पार्टी विस्तार में यह बड़ा फैक्टर रहा है।
राजस्थान सबसे ज्यादा कठिन राज्य माना जा रहा था क्योंकि वहां पूर्व सीएम वसुंधरा के तेवर कुछ अलग थे। लेकिन पार्टी ने यह तय कर लिया था कि तीनों राज्यों की दिशा बदलने का समय आ गया है। राजस्थान में राजपूत, मीणा, गुर्जर जैसी कई जातियां प्रबल हैं। लेकिन भाजपा ने भजनलाल शर्मा जैसे चेहरे को चुना जो न्यूट्रल माने जा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह विधानसभा अध्यक्ष बनाए गए हैं और पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर ( Narendra Tomar) मध्य प्रदेश में । शिवराज और वसुंधरा के लिए केंद्र की राजनीति का रास्ता खुला माना जा रहा है । कई सांसद व केंद्रीय मंत्री अब राज्यों की राजनीति में भेजे गए हैं। यानी 2024 के लिए जब मैदान सजेगा तो 10 साल के बाद फिर से मोदी खेमे का चेहरा नया नजर आएगा। विपक्ष को तय करना है कि वह चुके मुद्दों और चेहरों के साथ ही उतरना चाहता है। या बदलाव के साथ ।
Editorial

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