✕
रमा एकादशी
By EditorialPublished on
हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक मास (Kartik month) के कृष्ण पक्ष की एकादशी (Ekadashi) को रमा एकादशी (Rama Ekadashi) का व्रत रखा जाता है। वहीं इस बार यह एकादशी 9 नवंबर को रखा को है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। बता दें, इस बार यह एकादशी गुरूवार के दिन है, इसलिए इस दिन का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करता है, उसके जीवन में आने वाली सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं। दीपावली (dipawali) के चार दिन प

x
कार्तिक कृष्ण एकादशी-
हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक मास (Kartik month) के कृष्ण पक्ष की एकादशी (Ekadashi) को रमा एकादशी (Rama Ekadashi) का व्रत रखा जाता है। वहीं इस बार यह एकादशी 9 नवंबर को रखा को है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। बता दें, इस बार यह एकादशी गुरूवार के दिन है, इसलिए इस दिन का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करता है, उसके जीवन में आने वाली सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं। दीपावली (dipawali) के चार दिन पूर्व पड़ने वाली इस एकादशी को लक्ष्मीजी के नाम पर रमा एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के पूर्णावतार कृष्णजी के केशव रूप की पूजा-आराधना की जाती है। इस दिन भगवान केशव का संपूर्ण वस्तुओं से पूजन, नैवेद्य तथा आरती कर, प्रसाद वितरण करें व ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इस एकादशी का व्रत करने से जीवन में वैभव और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 8 नवंबर को प्रातः काल 8 बजकर 23 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानी 9 नवंबर को सुबह 10 बजकर 41 मिनट पर समाप्त होगी। ज्योतिषियों की मानें तो 8 नवंबर को सुबह 8 बजे तक दशमी तिथि रहने के चलते 9 नवंबर को एकादशी का व्रत रखा जाएगा।
पारण का समय
साधक 10 नवंबर को सुबह 6 बजकर 39 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 50 मिनट तक पूजा पाठ कर पारण कर सकते हैं। इस दिन द्वादशी तिथि का समापन दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर हो रहा है है ।
पूजा विधि
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठें। इस समय भगवान विष्णु को प्रणाम कर दिन की शुरूआत करें। दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के बाद सुविधा होने पर पवित्र नदी में स्नान करें। अगर सुविधा नहीं है, तो गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें। इस समय आचमन कर व्रत संकल्प लें और पीले रंग का वस्त्र धारण करें। अब सबसे पहले भगवान सूर्य को लाल रंग मिश्रित जल से अर्घ्य दें। इसके बाद पूजा गृह में एक चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की चित्र को स्थापित करें। अब कलश स्थापित कर विधिवत भगवान विष्णु की पूजा करें। भगवान विष्णु को पीला रंग अति प्रिय है। अतः पीले रंग का फल, फूल, केसर मिश्रित खीर अर्पित करें। इस समय विष्णु चालीसा का पाठ और मंत्र जाप करें। पूजा के अंत में आरती कर सुख, समृद्धि और आय में वृद्धि हेतु कामना करें। दिनभर उपवास रखें। संध्याकाल में आरती अर्चना कर फलाहार करें। अगले दिन पूजा पाठ कर व्रत खोलें। इस समय जरूरतमंद और योग्य ब्राह्मण को दान अवश्य दें।
कथा
पौराणिक युग में मुचुकुंद नामक प्रतापी राजा थे, इनकी एक सुंदर कन्या थी, जिसका नाम चन्द्रभागा था. इनका विवाह राजा चन्द्रसेन के बेटे शोभन के साथ किया गया. शोभन शारीरिक रूप से अत्यंत दुर्बल था. वह एक समय भी बिना अन्न के नहीं रह सकता था.
एक बार दोनों मुचुकुंद राजा के राज्य में गये. उसी दौरान रमा एकादशी व्रत की तिथी थी. चन्द्रभागा को यह सुन चिंता हो गई, क्यूंकि उसके पिता के राज्य में एकादशी के दिन पशु भी अन्न, घास आदि नही खा सकते, तो मनुष्य की तो बात ही अलग हैं. उसने यह बात अपने पति शोभन से कही और कहा अगर आपको कुछ खाना हैं, तो इस राज्य से दूर किसी अन्य राज्य में जाकर भोजन ग्रहण करना होगा. पूरी बात सुनकर शोभन ने निर्णय लिया कि वह रमा एकादशी का व्रत करेंगे, इसके बाद ईश्वर पर छोड़ देंगे.
एकादशी का व्रत प्रारम्भ हुआ. शोभन का व्रत बहुत कठिनाई से बीत रहा था, व्रत होते होते रात बीत ग,ई लेकिन अगले सूर्योदय तक शोभन के प्राण नही बचे. विधि विधान के साथ उनकी अंतेष्टि की गई और उनके बाद उनकी पत्नी चन्द्रभागा अपने पिता के घर ही रहने लगी.उसने अपना पूरा मन पूजा पाठ में लगाया और विधि के साथ एकादशी का व्रत किया.
दूसरी तरफ शोभन को एकादशी व्रत करने का पूण्य मिलता हैं और वो मरने के बाद एक बहुत भव्य देवपुर का राजा बनता हैं, जिसमे असीमित धन और एश्वर्य हैं. एक दिन सोम शर्मा नामक ब्रह्माण्ड उस देवपुर के पास से गुजरता हैं और शोभन को देख पहचान लेता हैं और उससे पूछता हैं कि कैसे यह सब एश्वर्य प्राप्त हुआ. तब शोभन उसे बताता हैं कि यह सब रमा एकादशी का प्रताप हैं, लेकिन यह सब अस्थिर हैं कृपा कर मुझे इसे स्थिर करने का उपाय बताये. शोभन की पूरी बात सुन सोम शर्मा उससे विदा लेकर शोभन की पत्नी से मिलने जाते हैं और शोभन के देवपुर का सत्य बताते हैं. चन्द्रभागा यह सुन बहुत खुश होती हैं और सोम शर्मा से कहती हैं कि आप मुझे अपने पति से मिलादो. इससे आपको भी पुण्य मिलेगा. तब सोम शर्मा उसे बताते हैं कि यह सब एश्वर्य अस्थिर हैं. तब चन्द्रभागा कहती हैं कि वो अपने पुण्यो से इस सब को स्थिर कर देगी.
सोम शर्मा अपने मन्त्रो एवम ज्ञान के द्वारा चन्द्रभागा को दिव्य बनाते हैं और शोभन के पास भेजते हैं. शोभन पत्नी को देख बहुत खुश होता हैं. तब चन्द्रभागा उससे कहती हैं मैंने पिछले आठ वर्षो से नियमित ग्यारस का व्रत किया हैं. मेरे उन सब जीवन भर के पुण्यो का फल मैं आपको अर्पित करती हूँ. उसके ऐसा करते ही देव नगरी का एश्वर्य स्थिर हो जाता हैं.और सभी आनंद से रहने लगते हैं.
इस प्रकार रमा एकादशी का महत्व पुराणों में बताया गया हैं. इसके पालन से जीवन की दुर्बलता कम होती हैं, जीवन पापमुक्त होता हैं.

Editorial
Next Story
Related News
X
