Samajwadi parties adopting dual strategy with Congress
नई दिल्ली (एजेंसी)। कांग्रेस (Congress) के साथ दो प्रमुख समाजवादी दलों का संबंध दोस्ती और सियासी रार के बीच उलझ गया है। राष्ट्रीय जनता दल की कांग्रेस से खूब छन रही है तो समाजवादी पार्टी की ठन गई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को लेकर एक चुप है तो दूसरा मुखर । सपा प्रमुख अखिलेश यादव कांग्रेस के ताजा रवैये के खिलाफ नजर आने लगे हैं तो राजद प्रमुख लालू प्रसाद प्रबल समर्थक । अखिलेश ने कांग्रेस को धोखेबाज बताया है तो लालू कांग्रेस नेता की जयंती मनाने सदाकत आश्रम पहुंच गए। दोनों समाजवादी विचारधारा के हिमायती हैं और संबंधी भी । अतीत के एक-दो उदाहरणों को छोड़ दिया जाए तो दोनों पार्टियों की राजनीति भी लगभग दो दशक से एक ही पटरी पर चल रही है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कांग्रेस से रिश्ते के मसले पर दोनों दो रास्ते पर क्यों हैं? प्रश्न यह भी कि लालू ने सपा एवं कांग्रेस के रिश्ते को सुधारने की वैसी पहल क्यों नहीं की, जैसा उन्होंने जदयू और कांग्रेस के मामले में किया। राजनीतिक विश्लेषकों को इसमें राजनीति नजर आती है। अभय कुमार का मानना है कि लालू कांग्रेस को नियंत्रित रखना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने सपा-कांग्रेस बिगड़े रिश्ते में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं समझी।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन को आधार बनाकर यदि कांग्रेस आइएनडीआइए के मित्र दलों पर दबाव बनाने का प्रयास करेगी तो उस वक्त अखिलेश का यही तेवर काम आएगा । इसलिए लालू ने फायदे के लिए सपा-कांग्रेस के रिश्ते को हालात पर छोड़ दिया है। दरअसल, कांग्रेस-सपा की बढ़ती खटास के बीच लालू की चुप्पी को शंका की नजरों से इसलिए देखा जाने लगा है कि वह यदि चाहते तो हस्तक्षेप कर सकते थे। तीन दिन पहले नीतीश कुमार ने पटना में भाकपा के एक कार्यक्रम में पांच राज्यों के चुनाव के चलते कांग्रेस पर विपक्षी एकता पर ध्यान नहीं देने का आरोप लगाया था। इस बयान से कांग्रेस हरकत में आई और मल्लिकार्जुन खरगे ने नीतीश से बात की। इसके बाद लालू और तेजस्वी यादव ने भी नीतीश के आवास पर जाकर लंबी मंत्रणा की। बताया जा रहा है कि नीतीश के पास लालू कांग्रेस के दूत बनकर गए थे।
कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ेंगे लालू : विपक्षी एकता के मामले में लालू का स्टैंड साफ है। वह किसी भी हाल में कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ना चाहते हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का साथ छोड़कर वह राजनीतिक नुकसान करा चुके हैं। इसलिए वह विपक्षी एकता के सबसे बड़े पैरोकार हैं। नीतीश कुमार के भाजपा का साथ छोड़कर महागठबंधन में आने के बाद लालू ने ही उनकी सोनिया गांधी से मुलाकात कराई थी।
Editorial

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