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ज्ञान हमारे आचरण में झलके
By EditorialPublished on
मंगलवार को आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने अपने प्रवचन में कहा कि हमारे बत्तीस आगमों में ग्यारह अंग कहे जाते हैं और ये ग्यारह अंग ही आचार्य की संपदा होती है। जिस प्रकार गृहस्थ के लिए धन संपदा होती है, वह इसे सुरक्षित रखने के लिए सदा चिंतित रहता है उसी प्रकार ग्यारह अंग आचार्य की संपदा होती है।

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मुंबई । मंगलवार को आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने अपने प्रवचन में कहा कि हमारे बत्तीस आगमों में ग्यारह अंग कहे जाते हैं और ये ग्यारह अंग ही आचार्य की संपदा होती है। जिस प्रकार गृहस्थ के लिए धन संपदा होती है, वह इसे सुरक्षित रखने के लिए सदा चिंतित रहता है उसी प्रकार ग्यारह अंग आचार्य की संपदा होती है।
उन्होंने आगे कहा कि ग्रंथ तो निर्जीव होते हैं पर उनसे ग्रहण किया जाने वाला ज्ञान ऐसी मंजूषा है जिसे कोई चुरा नहीं सकता। ज्ञान की मंजूषा भाव मंजूषा व पुस्तकें द्रव्य मंजूषा है। छपे हुए ग्रंथों की भी जरा भी आशातना न हो व रखने उठाने में भी जागरूकता रहे क्योंकि ये ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं। तीर्थंकरों का ज्ञान इतना विकसित होता है कि उन्हें किसी आगम पठन की अपेक्षा नहीं होती बल्कि उनकी वाणी खुद ही आगम है। ज्ञान का सार है, आचार। जो ज्ञान आचार में आये उस ज्ञान का ज्यादा महत्व होता है। ज्ञान हमारे आचरण में झलके। हमारा आचार सम्यक व निर्मल रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए।
जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लुंकड़, मुख्य न्यासी बी. रमेशचंद बोहरा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष चांदरतन दुगड़, उपाध्यक्ष जयंतीलाल सुराणा, मंत्री सलिल लोढा, परामर्शक मदनलाल तातेड़, रुपचंद दुगड़ मौजूद रहे।

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