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वेन्कूवर 10 : शीतकालीन खेलों के स्वर्ग हैं विसलर के पहाड़
By EditorialPublished on
वेन्कूवर Vancouver : अब पहाड़ पर चढ़ना ही बचा था। इतने ऊंचे ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढके पहाड़ों को देखकर ही जान निकल रही थी में पहले ही काफी थक गया था, सोच रहा था कि कैसे चढ़ पाउंगा, मगर इन दोनों को यह बात बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी। एक खयाल तो यह भी आ रहा था कि मैं नीचे ही रुक जाऊं मगर फिर सोचता कि मैं अकेला इतनी देर तक नीचे करूंगा क्या मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि पहाड़ों की चोटी तक केबल कारें व गण्डोला चलती हैं।

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वेन्कूवर Vancouver : अब पहाड़ पर चढ़ना ही बचा था। इतने ऊंचे ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढके पहाड़ों को देखकर ही जान निकल रही थी में पहले ही काफी थक गया था, सोच रहा था कि कैसे चढ़ पाउंगा, मगर इन दोनों को यह बात बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी। एक खयाल तो यह भी आ रहा था कि मैं नीचे ही रुक जाऊं मगर फिर सोचता कि मैं अकेला इतनी देर तक नीचे करूंगा क्या मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि पहाड़ों की चोटी तक केबल कारें व गण्डोला चलती हैं।
उपर जाने के लिये बहुत मंहगे टिकिट थे। कुलवन्त जल्दी जल्दी में अपना पर्स घर पर ही भूल आया था, राजा ने कहा कोई बात नहीं, उसके पास पैसे हैं, मेरे पास भी कार्ड था। कुलवन्त को बहुत अफसोस हो रहा था। टिकिट लेने के लिये लाइन लम्बी थी। लाइन में साइकिलें लेकर कुछ युवक भी खड़े थे। तभी एक लड़की आई और पीछे खड़े लोगों को दूसरी तरफ आने को कहा। हम उसके पीछे पीछे चल पड़े तो एक शानदार ऑफिस में आ गये। यहां भी टिकिट मिल रहे थे।
पहाड़ों पर चढाई के तीन स्तर थे। नीचे से रोप वे में जाकर एक स्टेशन पर आते थे, यहां एक बड़ी केबल कार में बैठकर उपर जाना पड़ता था। यह पहला स्तर था। पर्यटक यहीं तक का टिकिट लेकर इस स्तर पर स्थित पहाड़ का आनन्द ले सकते थे।
दूसरे स्तर में यहां से पहाड़ की चोटि तक गण्डोला जाती थी। कई पर्यटक दूसरे स्तर तक का ही टिकिट लेकर पहाड़ का आनन्द ले लेते थे। तीसरे स्तर में यहीं से एक गण्डोला समानान्तर चलते हुए दूसरे पहाड़ की चोटि तक ले जाती थी। इस तरह विसलर और ब्लेक कोम्ब दोनों पहाड़ों का आनन्द लिया जा सकता था। राजा ने तीनों ही स्तर के टिकिट ले लिये, मुझे तो पता ही बाद में चला वरना दूसरे स्तर तक जाना भी पर्याप्त था।
इसी ओफिस का एक द्वार रोप वे के स्टेशन में खुलता था। बाहर जो लोग टिकिट ले रहे थे, वे भी इसी द्वार से अन्दर आ रहे थे। स्टेशन पर रोप वे की कार उपर से आकर एक जगह रूकती, यात्रियों को उतारती और आगे बढ़कर उस जगह आकर रुक जाती जहां उपर जाने को प्रतीक्षारत यात्री खड़े रहते थे, फिर आगे बढ़ जाती और उपर चढ़ जाती। यह सिलसिला यूं ही चक्रवत जारी रहता और यात्री उपर जाते नीचे जाते रहते।
कई युवक व बच्चे साइकिल समेत इन कारों में चढ़ रहे थे। मैं चकित था कि केबल कार से ही उपर जाना है तो फिर साईकिल साथ ले जाने का क्या तो मुझे बताया गया कि ये लोग साईकिलें लेकर उपर जाते हैं और फिर वापस जब इस सटते हुए साईकिल से आते हैं। आते वक्त उतार ही उतार होता है तो उसका ये आनन्द लेते हैं। साईकिल चलाने वालों के लिये पूरे पहाड़ में अलग से मार्ग बने हुए है इनमें जगह जगह खड़े उतार के साथ खड़े चढाव भी थे, जिन पर साइकिल इतने वेग से उतरती थी कि खड़ा चढ़ाव भी उसी वेग में चढ जाती थी।
उपर तक जाने के लिये हेलीकोप्टर सेवा अलग से थी। हेलीकोप्टर दूसरे ब्लेक कोम्ब पहाड़ जो कि विसलर पहाड़ से थोड़ा ऊंचा था, वहीं तक जाते थे। यात्री वहां उतर कर गण्डोला व केबल कारों से वापस आ सकते थे। इसी तरह डोला से ऊपर जाने वाले यात्री वापसी में हेलीकोप्टर से भी आ सकते थे। कई लोग हेलीकोप्टर से ही जाते और हेलीकोप्टर से ही वापस आते। हेलीकोप्टर के रमिट और भी मंहगे थे।
पर्यटकों की संख्या इतनी अधिक थी कि हर विकल्प के लिये भीड़ उमड़ रही श्रीष्मकालीन ऋतु कुछ दिनों की ही शेष थी। दो हफ्तों बाद तो बर्फ गिरना शुरू हो जाती है, तब बर्फ पर स्किंग करने वालों की संख्या बढ़ जाती है। पर्यटकों का लता तब भी लगता है मगर इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम हो जाती है। ग्रीष्म और शरद के बीच महीने भर के लिये जरूर एक चोटि से दूसरी चोटि के बीच चलने वाली गण्डोला रख रखाव के लिये बन्द कर दी जाती है।
साइकलिंग व स्विंग करने वालों के अतिरिक्त हाईकिंग करने वालों की संख्या भी कम नहीं। ये लोग पैदल ही पहाड़ों की खाक छानने निकल पड़ते हैं। इनके लिये भी जगह जगह व्यवस्थाएं की हुई हैं। पहाड़ों और इन्हें घेरे जंगलों के बीच प्राकृतिक सौन्दर्य की अथाह निधि है। झीलें, झरने, नाले, हाईकिंग करने वाले इनका रसास्वादन करते हुए पूरा दिन इन पहाड़ों के मध्य गुजार देते हैं। ये अपनी पीठ पर आवश्यक सामग्री लादे रहते हैं। जगह जगह बारबेक्यू भट्टियां लगी होती है. जहां रूक कर ये अपने साथ लाया सामान पका कर खा भी सकते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर बारबेक्यू बफे भी उपलब्ध होता है जहां पैसे देकर आप खाद्य खरीद सकते हैं, बना सकते हैं। हिमपात शुरू होने के बाद हाईकिंग के कई रास्ते बन्द कर दिये जाते हैं। सिर्फ वही रास्ते चालू रहते हैं जिन पर स्नो शू पहन कर चलना संभव होता है।
विन्टर स्पोर्ट्स के शौकीन लोगों के लिये तो विसलर और ब्लेक कोम्ब पहाड़ स्वर्ग हैं। समूचे उत्तरी अमेरिका में यह आदर्श स्थल है। दोनों पहाड़ों पर 8 हजार एकड़ से भी अधिक क्षेत्र बर्फ से ढका ढालू मैदान बन जाता है जिसमें 16 घाटियां होती है। यहां से 3 ग्लेशियर भी निकलते हैं। स्किंग व स्नो बोर्डिंग का सीजन 7 माह तक चलता है जो नवम्बर से शुरू हो जाता है। दुनिया भर से स्की इच्छुक पर्यटकों के आने से यहां कई स्किंग प्रशिक्षण केन्द्र भी खुल गये है जहां इन खेलों की प्रारम्भिक जानकारी व प्रशिक्षण दिया जाता है।
शीघ्र ही एक केबल कार हमारे सामने आकर रूकी। कार बड़ी थी मगर हमारा सिर्फ 3 लोगों का ही ग्रुप था फिर भी पूरी कार में सिर्फ हम ही बैठे। यात्रियों को पहले ही यहां उपस्थित कर्मचारी अपने ग्रुपों में खड़ा कर देते हैं ताकि एक ग्रुप को एक साथ सैर करने का आनन्द मिले। कई सिर्फ पति-पत्नी होते हैं तो उन्हें भी एक कार दे दी जाती है। चूंकि कारें लगातार आती रहती हैं इसलिये कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। ये चक्रवत चलती रहती है और इनके रूकने, द्वार खुलने, द्वार बन्द होने और आगे बढ़ने का एक निश्चित समय होता है इस कारण अगर कोई यह समय चूक जाये तो कार खाली ही आगे बढ़ जाती है।
हमारे बैठते ही द्वार बन्द हो गये और कार आगे बढ़ गई। धीरे धीरे यह स्टेशन से बाहर निकली और रस्सीनुमा तारों पर आगे चलते हुए उपर उठ गई। कार की चारों तरफ शीशे लगे हुए थे जिससे बाहर का नजारा आसानी से दिखाई देता था। खिडकियां बड़ी बड़ी थी इसलिये देखने, फोटो लेने में और भी आसानी हो जाती थी।
ज्यू ही हम थोड़ा सा उपर उठे समूचे विसलर पहाड़ का प्रांगण हमारी आंख के सामने था। हमारी रोप वे की भांति कई अन्य रोप वे भी साथ साथ चल रही थी। एक रोप वे में तो खुली कुर्सियां लगी हुई थी। इन्हें बेघर लिफ्ट कहते हैं। ये चारों तरफ से खुली थी। इनमें बैठे लोग वातावरण का और अधिक आनन्द लेते थे। उपर चढ़ते हुए ठंडी, तीखी हवाओं के थपेड़े झेलने की जिनकी हिम्मत होती थी, ये इसका भरपूर मजा लेते थे केवल कारों के मुकाबले चेयर लिपटों के टिकिट भी सस्ते थे इसलिये कई लोग इस कारण भी इनमें बैठते थे।
नीचे साइकलिंग के लिये बने उतार-चढाव भरे रास्तों में ढेर सारे बच्चे व युवा साइकिल चलाते नजर आ रहे थे। साइकिल समेत वेग से गिरते और चढले बच्चों को देखकर ही दिल दहल जाता था। एकदम खड़े उतार से इनकी साइकिल उतरती जैसे गिर रही हो, इसे देखते ही कलेजा मुँह को आ जाता था मगर ज्यू ही इसाइकिल गिर कर चढाव चढ जाती तो जान में जान आ जाती।

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