Pratahkal:Maharashtra:Mumbai :try to stay away from tempting activities-Acharya Mahashraman
मुंबई । नंदनवन (Nandanvan) में आचार्य महाश्रमण ने अपने प्रवचन में कहा कि हमारे जीवन में आत्मा महत्वपूर्ण व मूल तत्व है। शरीर है तो मन व वचन भी है। आत्मा के बाद का स्थान शरीर का होता है। शरीर है तो इन्द्रियां भी है। आत्मा व शरीर के योग से जीवन निष्पन्न होता है। आत्मा का संयोग जीवन, आत्मा का वियोग मृत्यु। इन दोनों का आत्यान्तिक वियोग मोक्ष है। इस प्रकार तीन तत्व – आत्मा, शरीर व मोक्ष हो जाते है। उन्होंने आगे कहा कि जीवन में प्रवृति भी होती है। लोक में सबसे कम संख्या में मनोयोग वाले प्राणी होते है। ऊससे ज्यादा मन व वचन वाले प्राणी व सबसे अधिक शरीर वाले प्राणी होते है। सब संज्ञी मनुष्यों के साथ तीनों योग जुड़े रहते हैं। अतः मनुष्य सब जीवों के विकसित प्राणी माना जाता है। तीनों योगों की प्राप्ति हमारी शक्ति व उपलब्धि है। योग के दो प्रकार है– शुभ व अशुभ। योग अपने आप में न शुभ है न अशुभ। मोहनीय कर्म का जुड़ाव उसे अशुभ बना देता है और उसका अलगाव – शुभ। हमें मोहनीय कर्म से दूर रहने का प्रयास करना है व इसी लक्ष्य के साथ गतिमान रहना है। कार्यक्रम में साध्वीवर्या संबुद्धयशा ने भी उद्बोधन प्रदान किया।
Editorial

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