Lok Sabha Elections
नई दिल्ली (एजेंसी)। लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) तक विपक्षी एकता का क्या हस्र होने वाला है, इसके रूझान पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले ही मिलने लगे हैं। विपक्षी गठबंधन में शामिल कई दल एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार कर 'एकता' की अब तक की उपलब्धि को ठेंगा दिखा रहे हैं। कांग्रेस के खिलाफ समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और जदयू ने तो अपने उम्मीदवार मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh), राजस्थान (Rajasthan) और छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में उतारे ही थे, तेलंगाना में अब सीपीएम ने भी अपने उम्मीदवार उतार कर विपक्षी एकता की हवा निकाल दी है। सबका एक ही आरोप है कि कांग्रेस उन्हें भाव नहीं दे रही।
नीतीश की पार्टी जदयू ने उतारे हैं कैंडिडेट
आरंभ से लेकर इंडिया अलायंस बनने तक बिहार के सीएम नीतीश कुमार की उल्लेखनीय भूमिका रही है। पटना में विपक्षी दलों की पहली बैठक में ही तय हुआ था कि भाजपा का विरोध सभी दल मिल कर करेंगे। चार महीने में ही हालात बदल गए। इस महीने होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता की पहली परीक्षा थी। परीक्षा के पहले ही एकता का परिणाम प्रतिकूल आता दिख रहा है। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने मध्य प्रदेश में 5 उम्मीदवार उतार दिए तो आम आदमी पार्टी ने भी अपने 70 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। छत्तीसगढ़ में आप ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी। हालांकि उसने 57 सीटों पर ही अपने उम्मीदवारों को उतारा है। तेलंगाना में तो आम आदमी पार्टी ने सभी 119 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है।
ममता साथ, पर बंगाल में एकला चलेंगी।
पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी तो शुरू से ही कांग्रेस और वाम दलों के खिलाफ रही हैं। कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए उन्होंने अलग होकर अपनी पार्टी टीएमसी बनाई थी तो वाम दलों को सत्ता से बेदखल करने के लिए बंगाल में अपनी पार्टी की जड़ें मजबूत कीं। उनके लिए वाम दल और कांग्रेस ठीक भाजपा की तरह ही दुश्मन पार्टियां हैं। नीतीश के कारण ममता ने विपक्षी एकता में शामिल होने का फैसला तो किया, लेकिन बंगाल में उनका आचरण एकजुटता के पैमाने पर कभी खरा नहीं उतरा। विधानसभा में एकमात्र कांग्रेस विधायक को भी टीएमसी ने अपने पाले में कर लिया। दलीय आधार पर बंगाल में होने वाले पंचायत चुनावों में भी वाम दलों और कांग्रेस के साथ टीएमसी की दुश्मनी साफ-साफ दिखी थी। अगर राज्यों को छोड़ कर सिर्फ केंद्र की सत्ता के लिए विपक्षी गठबंधन काम करेगा तो ममता से किसी तरह की मरौवत की उम्मीद कांग्रेस और वाम दलों को नहीं करनी चाहिए। ममता ने अगर दरियादिली दिखाई भी तो पांच-सात सीटों पर ही कांग्रेस और वाम दलों को समेटने का प्रयास करेंगी। जाहिर है कि यह उन्हें मंजूर नहीं होगा।
कांग्रेस समझौते के मूड में नहीं दिख रही
नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव या वाम दलों के नेताओं ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार उतारे हैं तो इसकी वजह कांग्रेस की ओर से वे अपनी पार्टियों की उपेक्षा बताते हैं। कांग्रेस इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही। वह अपने में ही मस्त और व्यस्त है। कांग्रेस को उम्मीद है कि कर्नाटक की तरह वह करिश्मा दिखाएगी। अब तक के ओपिनियन पोल भी कांग्रेस के पक्ष में ही आए हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह इस बार बड़ी कामयाबी हासिल करेगी। उसे यह भी गुमान है कि हाशिये पर खड़ी कांग्रेस ने जब कर्नाटक में जीत हासिल की तो तमाम विपक्षी दलों का झुकाव उसकी ओर हुआ । विपक्षी एकता की बुनियाद पड़ी और कांग्रेस को नापसंद करने वाले अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसे नेता भी उसकी मातहती कबूल करने को तैयार हो गए थे। अगर कांग्रेस ने पांच राज्यों के चुनाव में अपनी जमीन मजबूत करने में कामयाबी पा ली तो उसे बाकी विपक्षी दलों को काबू करने में आसानी होगी।
तेलंगाना में अब माकपा ने दिखाए तेवर
मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 'इंडिया' गठबंधन बिखरता नजर आ रहा है। अब माकपा ने भी तेलंगाना में अपने 17 उम्मीदवार उतार दिए हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस, आप, जदयू और सपा ने अलग- अलग उम्मीदवार तो उतारे ही हैं. अब तेलंगाना में भी विपक्षी गठबंधन तार-तार होता नजर आ रहा है। कांग्रेस पर असहयोग का आरोप लगाते हुए माकपा ने अपने 17 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों की ही दुश्मन बन गई है। विपक्षी एकता के सूत्रधार रहे नीतीश कुमार तो अब कांग्रेस के बारे में यह कहने लगे हैं कि उसे विपक्षी गठबंधन की नहीं, बल्कि अपनी चिंता अधिक है।
असेंबली और लोकसभा के नतीजे एक नहीं
हालांकि कांग्रेस यह भूल जाती है कि विधानसभा चुनावों के परिणाम का लोकसभा चुनाव पर असर पड़ने की कोई गारंटी नहीं। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा के बजाय कांग्रेस को तरजीह दी थी। आश्चर्य यह कि उसके कुछ ही महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में 50 फीसद से अधिक वोट भाजपा ने हासिल कर लिए। तीनों राज्यों की कुल 65 में 62 सीटें भाजपा की झोली में चली गईं।
Editorial

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