Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
वेन्कूवर Vancouver : बिसलर दोनों पहाड़ों की तलहटी में एक छोटा सा गांव है जो पूर्णतया पर्यटकों पर ही निर्भर है। दुकानों पर स्की, स्की बोर्ड, इनके उपकरण, साइकिलें, के बूट, चश्मे आदि किराये पर मिलते हैं, इनके अलावा खाने-पीने, रहने-के कई स्थान है। ज्यू ही हम इस तलहटी में पहुँचे चारों तरफ ऊंचे ऊंचे जर आ रहे थे। पहाड़ों की चोटियां किसी नवयौवना के घूंघट से ढके सिर तरह नजर आ रही थी, जिन्होंने बर्फ की चादर ओढ़ रखी थी। धारों तरफ पत्थर जड़ित व फूलों झाड़ियों से आच्छादित मार्ग के बीचो बीच प्रागण में पार्किंग व्यवस्था थी। पार्किंग का शुल्क बहुत भारी था। हम देख कर चकरा गये। हमें उपर दोनों पहाड़ों पर जाना था, इसमें पूरा दिन निकल जाने वाला था, पार्किंग की दर प्रति घंटे थी, और कोई चारा भी नहीं था, इतनी देर के ये गाड़ी यूं ही कही छोड़ भी नहीं सकते थे। पार्किंग मीटर में कार्ड डाल कर 6 इटे के पैसे भरे और आगे बढे ।
हर्दियों का मौसम था इसलिये बर्फ पहाड़ की चोटियों तक ही सीमित था फिर भी इतना अधिक था कि चारों तरफ सफेद सफेद नजर आ रहा। सर्दियों में पूरे • पहाड़ से लेकर जमीन तक बर्फ ही बर्फ हो जाती है। पहाड़ के निचले हिस्सों पर जगह जगह बड़े बड़े ढालू मार्ग या रेम्प बने हुए थे। सर्दियों में जब इन पर बर्फ चढ़ जाती है तो लोग स्कींग, स्कींग बोर्ड जम्प वगैरा करते हैं। अभी ये रेम्प बर्फ से अनावृत हो एकदम गंजे नजर आ रहे थे। इन रेम्प के अलावा ऊंचे-नीचे, उतार- चढ़ाव भरे ढेर सारे रास्ते हमें नीचे से ही नजर आ रहे थे। सर्दियों में इन पर भी लोग स्किंग का मजा लेते हुए जोखिम भरे करतब करते हैं मगर अभी इन गंजे हो गए रास्तों पर छोटे छोटे स्कूली बच्चे साइकिल चला रहे थे।
तेजी से साइकिल चलाते हुए बच्चे एकदम खड़े उतार से उतर उतने ही खड़े चढ़ाव पर चढ़ते हुए सपाट रस्ते पर चले जा रहे थे। फिर उतार, फिर चढ़ाव, फिर सपाट मार्ग यह सिलसिला मीलों तक चलता था। रंग बिरंगी वेषभूषा में, सिर पर हेलमेट लगाए, आंखों पर बड़ा चश्मा चढाए अत्यन्त सुन्दर दृश्य उपस्थित कर रहे थे। ज्यूं ही ये तेजी से नीचे उतरते कलेजा मुँह को आ जाता था। बच्चों के इस तरह के हैरत अंगेज करतबों से सब रोमांचित हो गये।
समूचा इलाका पहाड़ों की तलहटी में था इसलिये विभिन्न स्थान भी ऊंचे नीचे थे। पार्किंग का प्रांगण सबसे नीचे था। उपर चढ़ कर हम एक संरक्षित बाजार में गए। संरक्षित का अर्थ यह कि इसमें किसी तरह के वाहन का प्रवेश नहीं हो सकता था। बाजार को एक पक्के चबूतरे से बन्द कर दिया गया था। इस चबूतरे के दोनों ओर सीढीयां थी। हम लोग सीढ़ीयां चढ़े और वापस उतर कर बाजार में प्रविष्ठ हुए।
बाजार बहुत आकर्षक था, छोटा भी नहीं था, अच्छे खासे मोहल्ले जितना बड़ा था। सड़कें छोटे छोटे पत्थरों और टाईलों से जड़कर बनाई गई थीं। ये पत्थर जगह जगह अलग अलग तरह के थे। कई पत्थरों पर कलाकृतियां उकेरी हुई थी जिन पर चलते हुए भी संकोच होता था। सड़क की दोनों तरफ अत्यन्त सुन्दर दुकानें, रेस्टोरेन्ट, गिफ्ट शोप्स वगैरा थी। हर दुकान के बाहर फूलों से लक दक गमले लटके हुए थे। फूल इतने घने थे कि गमले नजर ही नहीं आ रहे थे। तमाम रेस्टोरेन्ट सड़क की तरफ खुले हुए थे जिनमें बैठे पर्यटक सड़क से नजर आ जाते थे। वहां बैठे पर्यटकों को भी सड़क पर चलते पर्यटकों की चहल पहल दिखाई देती थी। एक के बाद एक, एसे रेस्टोरेन्टों की भरमार थी और लगभग सभी पर्यटकों से अटे पड़े थे। चारों तरफ उमंग उल्लास का वातावरण था ऐसा प्रतीत होता था जैसे किसी परीलोक में आ गये हों।
था तो यह बाजार मगर लगता एसा था जैसे किसी डिजनीलेण्ड जैसे एम्यूजमेन्ट पार्क में घूम रहे हों। बाजार के बीचों बीच एक चौक भी था, यहां बेन्चें लगी हुई थी, लोग इन बेन्चों पर बैठ कर खाने पीने और आसपास का नजारा देखने का मजा ले रहे थे। राजा व कुलवन्त तो जगह जगह दुकानों में घुस जाते थे, राजा को खरीददारी का शौक कुछ ज्यादा ही था। मैं एक बेन्च पर बैठ कर अपनी थकान उतारने लगा और मोबाईल पर दुनिया भर की खबरों के लिये नेट खंगालने लगा। तभी मेरी नजर एक वाट्स एप संदेश पर गई, पढते ही मैं चौंक गया, इधर उधर देखा - कहीं आसपास राजा तो नहीं वरना वो यह संदेश देख लेगा तो मुसीबत हो जायगी।
भारत में 23 अग की अर्ध रात्रि बीत चुकी थी और 24 अग हो गई थी। तारीख के अनुसार यह मेरा जन्म दिन था। वाट्स एप पर पोते-पोतियों, बहू-बेटों के बधाई संदेश आना शुरू हो गये थे। इसी दिन मेरी पोती पलक का भी जन्म दिन है, उसका बधाई संदेश आया तो मैंने सेम टू यू का प्रति संदेश भेज दिया, उसी तरह जैसे दीपावली - नव वर्ष पर आने वाले संदेशों के प्रति संदेश में सेम टू यू लिखा जाता है।
चौक बड़ा था, समय समय पर यहां कई तरह के कार्यक्रम भी आयोजित होते थे। कई पर्यटक संगीत की धुन पर यहां नाचने भी लगते थे। पूरा बाजार तीन रास्तों का था। एक रास्ते से चलकर हम इस चौक में आये थे। यहां से आमने सामने दो रास्ते थे। तीनों रास्तों का निर्गमन चबूतरे से ही संभव था। किसी भी पर्यटन स्थल पर इस तरह के संरक्षित बाजार बनाये जा सकते हैं जिनसे पर्यटकों का आनन्द द्विगुणित हो जाता है। वैसे भी हर पर्यटन स्थल पर असंगठित और बेतरतीब दुकानें होती ही हैं।
लोग यहां एक पर्यटन स्थल को देखने आते थे मगर यह बाजार अपने आप में एक पर्यटन स्थल बन चुका था जिसमें घूमे बिना विसलर आना अधूरा रह जाता था। हमें पहाड़ों पर चढ़ना था, खाना भी खाना था मगर यहां से बाहर निकलने का मन ही नहीं कर रहा था। जब काफी धूमधाम कर थक गये और भूख भी बढ गई तो यहीं स्थित एक रेस्टोरेन्ट में खाना खाने की सोची। इतने रेस्टोरेन्ट थे मगर एक भी भारतीय रेस्टोरेन्ट नजर नहीं आ रहा था। ये दोनों तो कुछ भी खा लेते थे, मेरी ही समस्या थी। राजा मेरे लिये चिन्तित था, अब अफसोस कर रहा था कि जितेन्दर तो खाने-पीने का सामान बांध रही थी, फालतू में ही मना किया, ले आते तो काम चल जाता। मैंने कहा मैं तो कुछ भी खा लूंगा, चलो किसी भी रेस्टोरेन्ट में चढ़ जाओ।
राजा ने एकाध लोगों से पूछताछ की तो पता लगा कि इस संरक्षित बाजार के बाहर एक रेस्टोरेन्ट है जहां इंडियन खाना मिल सकता है। जिस रास्ते से हम आये थे उसके दायीं तरफ चौक से एक रास्ता बाहर जाता था। वापस चबूतरा चढकर बाहर उतरे। सामने ही एक चाइनीज रेस्टोरेन्ट था। चाइनीज तो मुझे बिल्कुल ही पसन्द नहीं मगर मैं चुप रहा। राजा ने पूछा- चाइनीज नूडल्स वगैरा तो आप खा लेते हो ना, तो मैंने हां कर दिया।
मैं मन ही मन सोच रहा था, कैसी विडम्बना है, आज मेरा जन्म दिन है, भारत में तो इस दिन खास कर के पकौड़ियां बनाई जाती है। मिठाई तो बन्द हो गई वरना पहले तो पसन्द की मिठाईयां भी बनती थी। हम सड़क पार करके रेस्टोरेन्ट में पहुँचे। यहां शौचालय भी थे। सबसे पहले समाधान किया और एक टेबल घेर कर बैठ गए। यहां एक बोर्ड लगा हुआ था जिस पर इण्डियन चाइनीज फूड लिखा था। शायद इसी कारण उस व्यक्ति ने हमें यह रेस्टोरेन्ट बताया था। पता किया तो इण्डियन के नाम पर पुलाव और चाउमीन उपलब्ध थे। मैंने यहीं मंगवा लिये सोचा था जैसे तैसे पेट भर लूंगा मगर दोनों चीजें स्वादिष्ट लगीं। चावल चाइनीज जैसे गीले गीले न होकर थोड़े खड़े थे इसलिये मा गये। चाउमीन भी भारत में पोतियों के साथ कभी खाया था उसका स्वाद बना हुआ था इसलिये काम चल गया।
Editorial

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