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जयपुर ( कार्यालय संवाददाता)। राजस्थान (rajasthan) विधानसभा चुनाव (vidhansabha election) में 25% से कम वोट हासिल करने वाले भी विधायक बन जाते हैं। लगातार 5 बार से जीत रहे दिग्गज नेता भी अब तक कुल पंजीकृत मतदाताओं के 50 फीसदी वोट हासिल नहीं कर सके। इनमें मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी शामिल हैं। इस बार प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान हुआ। लेकिन अशोक गहलोत (Ashok gehlot), वसुंधरा राजे (vasundhara raje), सचिन पायलट (sachin pilot) जैसे बड़े नेताओं के विधानसभा क्षेत्र में 2018 के मुकाबले मतदान का प्रतिशत कम रहा । चुनावी मैदान में उतरे नेताओं में केवल वसुंधरा राजे ही 2013 में कुल पंजीकृत मतदाताओं के 50 फीसदी आकड़े के करीब पहुंच सकीं। उन्हें झालरापाटन में 49.95 फीसदी वोट मिले। सचिन पायलट को टोंक में 2018 में 48.65 फीसदी वोट मिले। वहीं तीन बार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी अपनी सीट पर 45ल से भी कम वोटर्स का मत हासिल कर जीतते आए हैं।
अशोक गहलोत : लगातार 5 बार जीते, छठी जीत का इंतजार
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरदारपुरा (Sardarpura) सीट से लगातार 5 बार जीते हैं। वे 1998 से इस सीट से लगातार यहां विधायक हैं। तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इससे पहले वे पांच बार सांसद भी रहे। इसके बावजूद उन्हें पिछले तीन चुनावों से कभी कुल पंजीकृत मतदाताओं के 50 फीसदी वोट नहीं मिले। 2008 के चुनाव में उन्हें 31 फीसदी वोट मिले थे। तब उनके सामने कुल 13 प्रत्याशी मैदान में थे। उन्होंने भाजपा के राजेंद्र गहलोत को हराया था। 2013 के चुनाव में गहलोत को कुल वोटर्स संख्या के महज 38.5 फीसदी वोट मिले। चुनाव में 11 प्रत्याशी थे। भाजपा (BJP)
के शंभूसिंह खेतासर को छोड़कर शेष प्रत्याशी नोटा को मिले एक हजार 179 वोट के आधे वोट भी हासिल नहीं कर पाए। 2018 में अशोक गहलोत को मिले वोटों में इजाफा जरूर हुआ लेकिन यह आंकड़ा 42.38 फीसदी ही रहा। गहलोत ने शंभूसिंह खेतासर को 30 फीसदी के बड़े अंतर से हराया। इस बार अशोक गहलोत का मुकाबला भाजपा के प्रो. महेंद्र राठौड़ से है। महेंद्र पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में चर्चा राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले प्रदेश के सीएम गहलोत की जीत के अंतर को लेकर चल रही है।
वसुंधरा राजे : 2 बार मुख्यमंत्री, 5 बार सांसद और 5 बार विधायक
वसुंधरा राजे दो बार प्रदेश की सीएम रह चुकी हैं। वे 5 बार सांसद और 5 बार विधायक रहीं हैं। इसके बावजूद वे केवल एक बार 2013 में कुल पंजीकृत मतदाताओं के 50 फीसदी वोट के आकड़े के करीब पहुंच सकीं। उन्होंने झालरापाटन में 49.95 फीसदी वोट हासिल कर कांग्रेस की मीनाक्षी चन्द्रावत को हराया था उनके सामने कुल 7 प्रत्याशी थे । वसुंधरा और मीनाक्षी को छोड़ दें तो अन्य प्रत्याशियों को नोटा के 3 हजार 729 वोट से भी कम वोट मिले थे। 2018 में वसुंधरा राजे इस मार्जिन को बरकरार नहीं रख सकीं। उन्हें केवल 42 फीसदी वोट ही मिले। उनके खिलाफ कांग्रेस ने कर्नल मानवेंद्र सिंह को मैदान में उतारा था। विरोधी प्रत्याशी के रूप में उन्होंने सबसे अधिक 81 हजार 504 वोट हासिल किए। वहीं 2008 में वसुंधरा राजे को झालरापाटन से केवल 39 फीसदी वोट मिले थे । उनके सामने 12 प्रत्याशी मैदान में थे। इस वसुंधरा राजे का मुकाबला कांग्रेस
(congress)
के रामलाल चौहान से है। रामलाल पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। इस हॉट सीट पर भी जीत-हार को लेकर कोई संशय नहीं है। नजर केवल जीत के मार्जिन पर टिकी है। यहां 2018 की तुलना में इस बार मतदान का प्रतिशत कम हुआ है।
सचिन पायलट : बड़े मार्जिन से जीते
सचिन पायलट पहली बार 2018 में विधायक बने उन्होंने भाजपा की वसुंधरा सरकार में मंत्री रहे यूनुस खान को बड़े अंतर से हराया था। पायलट ने 48.65 फीसदी वोट हासिल किए थे। जबकि यूनुस खान को 54 हजार 861 वोट मिले थे। जबकि सचिन पायलट को दोगुने वोट मिले थे। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री रहे सचिन पायलट टोंक से दूसरी बार चुनावी मैदान में हैं। उनका मुकाबला भाजपा के पूर्व विधायक अजीत सिंह मेहता से है। लेकिन यहां मुकाबले से ज्यादा मार्जिन को लेकर चर्चा है। सचिन इस बार जीतते हैं तो जीत का मार्जिन कितना होगा।
लोकसभा चुनाव 2024 से पहले हो रहे इन विधानसभा चुनावों को केंद्र की सत्ता का सेमीफाइनल कहा जा रहा है। विधानसभा चुनावों में वोटों की 3 दिसबंर को होनी है। इस इंतजार के बीच जानिए राजस्थान के उन नेताओं के बारे में जिन्होंने सबसे बड़ी जीत हासिल की। लेकिन वे कुल पंजीकृत मतदाताओं का 50 फीसदी वोट हासिल नहीं कर सके।
रिकॉर्ड मतों से जीत, लेकिन 50 फीसदी वोटों से रहे दूर
कैलाश मेघवाल (Kailash Meghwal): भाजपा से निष्कासित किए जाने के बाद 89 वर्षीय कैलाश मेघवाल निर्दलीय प्रत्याशी (भीलवाड़ा की शाहपुरा सीट) के रूप में चुनाव मैदान में हैं। 2018 में इन्होंने कांग्रेस के महावीर प्रसाद को 74 हजार 542 के रिकॉर्ड मतों से हराया था। इनकी जीत का मार्जिन 45.1त्न वोट था। बावजूद इसके उन्हें कुल पंजीकृत मतदाताओं के 43 फीसदी वोट ही मिले। इससे पहले 2013 में कैलाश मेघवाल को 45.64 फीसदी वोट मिले। 2008 में शाहपुरा सीट से कांग्रेस के महावीर प्रसाद चुने गए। उन्हें 30 फीसदी वोट ही मिले। कैलाश मेघवाल के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरने से इस बार यह सीट त्रिकोणीय मुकाबले में फंस गई है।
25 फीसदी से कम वोट हासिल कर बने विधायक
2018 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने वाले कई विधायकों को कुल पंजीकृत मतदाताओं के महज 20 से 25 फीसदी वोट ही मिले। इसके बावजूद भी वे चुनाव जीतने में सफल रहे । अधिकांश सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला रहा । नदबई से बीएसपी के एमएलए जोगिंदर सिंह अवाना को 19 फीसदी वोट मिले। गंगानगर सीट से निर्दलीय प्रत्याशी राजकुमार गौड़ महज 20 फीसदी वोट हासिल कर एमएलए चुने गए। बहरोड़ से बलजीत यादव को 25त्र, उदयपुरवाटी विधायक राजेंद्र गुढ़ा को 26त्र, खेतड़ी से जितेंद्र सिंह को 27.5त्ल, भरतपुर से आरएलडी विधायक सुभाष गर्ग 20.68ल, मेड़ता से आरएलटीपी की एमएलए इंद्रा देवी 22.84 फीसदी और सिवाना से भाजपा के हमीर सिंह 20.87 फीसदी वोटों से विधायक बने। इस बार भी ज्यादातर सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है। जहां भाजपा, कांग्रेस के बागी मैदान में है। इस कारण ऐसी सीटों के प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
Editorial

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