Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan

Los Angeles : पास ही प्रसिद्ध लेगूना बीच था। इसी बीच की एक तरफ पिछली बार में आर्ट एक्जीबीशन और लाईव पेन्टींग शो देखने गया था। यह बीच का दूसरा हिस्सा था। बीच के किनारे बड़े बड़े और मंहगे से मंहगे होटल थे। यहीं एक होटल के पीछे, बीच के किनारे बहुत अच्छा पिकनिक स्थल बना हुआ है जो ट्रेजर आईलेण्ड के नाम से मशहूर है। यह नाम सुनकर ही रोबर्ट लुई स्टीवेन्स के प्रसिद्ध उपन्यास की याद आ जाती है जो स्कूली जीवन में पाठ्यक्रम में था। इसके नायक लोग जोन सिल्वर का बखान हमारे एक अध्यापक जिस तरह करते थे, छात्रों ने उनका नाम ही लोंग जोन रख दिया था।
ट्रेजर आईलेण्ड, मोन्टाज होटल के एकदम पीछे और तट के किनारे है। होटल तथा यह स्थल समुद्र किनारे स्थित बहुत ऊंची चट्टान पर स्थित है, बीच इसके एकदम नीचे है। यहां बहुत सुन्दर उद्यान बना हुआ है, जगह जगह बेन्चें लगी हुई हैं। लॉस एंजलेस चूंकि पश्चिमी तट पर अवस्थित है इसलिये यहां से सूर्यास्त का दृश्य बहुत अच्छा दिखाई देता है। सप्ताहान्त में सूर्यास्त के समय लोगों की भारी भीड़ एकत्र हो जाती है।
केलिफोर्निया में यह नियम है कि समुद्री तट के किनारे अवस्थित होटलों के बीच पर खुलने वाले हिस्सों पर होटलों का आधिपत्य नहीं हो सकता। बीच सार्वजनिक स्थल हैं, चाहे वे किसी भी होटल के पास क्यूं न हों। अन्यत्र ऐसे नियम नहीं है। उदयपुर में तो झीलों के किनारे ढेर सारे होटल बने हुए हैं, झीलों और होटलों के बीच कोई सार्वजनिक स्थल नहीं है। इस तरह के नियम हो तो जन सामान्य को भी प्राकृतिक स्थलों का आनन्द लेने का अवसर मिलता है।
हम थोड़ी देर इस स्थल पर बैठकर आगे बढ़े। बीच बहुत नीचे था, उतरने के लिये रेम्प और सीढीयां बनी हुई थीं। मैं उत्तर तो जाता पर चढ़ना मुश्किल होता इसलिये कोई नीचे जाने की बात ही नहीं कर रहा था। गरिमा घूमने के लिये ही आई थी। मैंने कहा मैं यहां बेन्च पर बैठ जाता हूं, तुम लोग नीचे हो आओ, मगर कोई जाने को तैयार नहीं हुआ। अब में धीरे धीरे रेम्प उतरने लगा, तो प्रीति ने टोक दिया -मामा साहब, आप वापस चढ़ जायेंगे, मैंने कह दिया हां, कोई खास बात नहीं।
मेरे साथ सब नीचे उतर गये। धूप जबर्दस्त थीं, कहीं कोई छायादार स्थान भी नहीं था, बीच पर भारी भीड़ थी, सब आमोद प्रमोद में व्यस्त थे, मैं एक जगह बैठ गया, रेत गहन थी, पानी तक चलना बहुत मुश्किल था। ये सब लोग मेरे पास जूते उतार कर पानी में खड़े हो गये और बीच का आनन्द लेने लगे।
ये लोग तो मजा ले रहे थे मगर मेरे लिये धूप असह्य हो रही थी, मैंने इनसे कहा कि मैं धीरे धीरे उपर चढकर बैठ जाता हूं, तुम आरामी से आ जाना, यह कह कर मैं वापस रेम्प चढ़ने लगा, थोड़ा चढ़कर एक जगह रूक कर सांस लेने लगा, तो ये सब लोग भी मेरे पीछे पीछे आ गये।
अगले दिन गरिमा को वापस एयरपोर्ट छोड़ दिया, शाम को ही मेरी भी वापसी की उड़ान थी। एल. ए.एक्स हवाई अड्डा घर से बहुत दूर था, जाने में ही दो- तीन घन्टे लग जाते हैं, घने ट्राफिक के बीच से गुजरना पड़ता है इसलिये थोड़ा पहले ही निकलना पड़ता है। मेरी उड़ान रात की 9 बजे की थी, अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों में तो दो घन्टे पहले ही पहुँचना पड़ता है, इसलिये सावधानी बरतते हुए हम अपरान्ह चार बजे ही घर से निकल गये।
पूरे लॉस एंजलेस शहर को चीरते हुए लेक्स पहुँचे, तब तक शाम हो गई थी। लेक्स अब शहर के बीचों बीच हो गया इसलिये कई प्रमुख सड़कें भी इसके बीच से गुजरती, इससे ट्राफिक और घना हो जाता है। मुनीश यहां के मार्गों से अच्छी तरह परिचित था इसलिये उसे हवाई अड्डे का एक वैकल्पिक मार्ग भी पता था जहां ट्राफिक कम रहता है। वह हमें इसी मार्ग से ले गया। शीघ्र ही हम लेक्स के परिसर में प्रवेश कर गये सामान ज्यादा था, पार्किंग कहां मिलेगी दूर मिली तो सामान ढोना पड़ेगा, इसी उहापोह में मुनीश ने सोचा कि वह सामान सहित मुझे और प्रीति को टर्मिनल से बाहर उतार दे. फिर गाड़ी पार्क करके आ जाये।
टर्मिनल के बाहर जबर्दस्त भीड़ थी, मुनीश ने इरादा बदला और टर्मिनल पार करते हुए गाड़ी सीधी पार्किंग में चढ़ा दी। यह कई मंजिला भवन था। नीचे की मंजिलें तो भरी हुई थीं, मुनीश गाड़ी घुमाता ही रहा, ठेठ चौथी - पांचवी मंजिल पर जाकर जगह मिली। गाड़ी पार्क कर सामान ले, लिफ्ट से नीचे उतर गये। अटेचियां चार चार पहियों वाली थी इसलिये आरामी से ठेलते हुए आगे बढ़ते रहे। टर्मिनल दूर था, मगर यही विकल्प था, हमारे साथ कई अन्य यात्री भी थे। सबके साथ हम भी टर्मिनल में प्रविष्ठ कर गये। कोई चेकिंग रोक टोक नहीं। मेरी एमेरिट्स की उड़ान थी, उसी भाग में हम अन्दर बढे। अन्दर भारी भीड़ थी। मेरा टिकिट बिजनेस क्लास का था जिसकी लाइन अलग थी। इसमें भी भीड़ तो थी ही मैं और प्रीति एक तरफ बैठ गये, मुनीश ने सामान चेक इन करवा दिया, बोर्डिंग पास देने के पहले मुझे बुलाया और पासपोर्ट चेक करके बोर्डिंग पास दे दिया।
रात के आठ-साढ़े आठ बज गये थे, इन लोगों को भी वापस लौटने में समय T लगेगा, इसलिये अब रूकने में कोई फायदा नहीं था, अब तो विमान में ही बैठना था। दोनों पति-पत्नी से भाव भीनी विदाई ली। दोनों ने मेरा इतना खयाल रखा, मेरी खुशी और मनोरंजन के लिये हर प्रयास किया व जो प्यार दिया वह जीवन भर याद रहेगा। मेरी छोटी छोटी आवश्यकताओं, पसन्द जानने के लिये प्रीति बार बार भारत फोन करती और पता लगाती। ये बातें तो मुझे स्वदेश लौटने के बाद पता चली। दोनों गले मिले और चरण स्पर्श कर विदा ली।
मैं भी एस्केलेटर चढ सिक्यूरिटी की तरफ बढ गया। अमेरिका से बाहर जाने वाली अन्तर्राष्ट्रीय उड़ान थी इसलिये सिक्यूरिटी मुक्त पीएएल सुविधा उपलब्ध नहीं थी। मेरे हाथ के बेग, आई पेड के साथ साथ जूते, जेकेट, फोन वगैरा भी स्केनर में डालने पड़े। इसके बाद जिस द्वार में खड़ा किया गया उसमें पूरे शरीर का स्केन हो जाता है, एक बार इधर, एक बार उधर घूमना पड़ता है और उपर देखना पड़ता है।
बाहर निकल कर सामान ले में सीधा लाउन्ज में पहुँचा। यहां पुलाव, रोटी, आलू की सब्जी वगैरह उपलब्ध थी, भूख भी लग आई थी। मैंने छक कर भोजन किया और अपने उड़ान के द्वार पर जाकर बैठने की सोचने लगा, तभी फोन की घन्टी बजी। भारत से मेरे मित्र ओम बंसल का फोन था। उसे पता था कि मेरी आज रात को एल.ए.एक्स. से उड़ान है। उसने हाल चाल पूछे तो मैंने कहा सब ठीक है, तब उसने बताया कि यहां तो सभी न्यूज चैनलों में खबर आ रही है कि लास एंजलेस हवाई अड्डे पर आतंकवादी घटना हो गई है. मैं आश्चर्य चकित रह गया.
गर्दन घुमा कर इधर उधर देखा, सब कुछ सामान्य था। ओम ने फोन रखा तो मुम्बई से महीप का फोन आ गया, वह भी यही बता रहा था। मैंने अब मुनीश को फोन किया क्यूंकि वह तो बाहर ही था, उसे भी कुछ पता नहीं बड़े आश्चर्य की बात थी कि अमेरिका की घटना की भारत में खबर आ गई मगर अमेरिकियों को पता नहीं। मैंने भेट खंगाला तो बात सही थी।
मैं बेग लेकर अपने द्वार पर पहुँचा तो उड़ान विलम्बित कर दी गई थी। थोड़ी ही देर में माईक पर घोषणा हो गई कि समूचे एल.ए.एक्स. हवाई अड्डे को सील कर दिया गया है, न कोई बाहर जा सकता न अन्दर आ सकता। न कोई उड़ान उड़ सकती न उतर सकती। सभी यात्री स्तब्ध रह गये।
लगभग तीन घन्टे तक यह गहमा गहमी रही फिर घोषणा हुई कि सब कुछ ठीक हो गया है, आतंकवादी घटना की खबर गलत निकली। रात के साढ़े बारह बजे हमारे विमान ने उड़ान भरी और मैंने अपने घटना प्रधान अमेरिका प्रवास से विदा ली।
Editorial

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