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तप का एक अंग है स्वाध्याय : आचार्यश्री महाश्रमण
By EditorialPublished on
मंगलवार को आचार्य महाश्रमण (Acharyashri Mahashraman) ने अपने प्रवचन में कहा कि स्वाध्याय को एक प्रकार का तप ही बताया गया है। स्वाध्याय में रत रहने वाले की भी कर्म निर्जरा होती है। स्वयं अध्ययन करना और दूसरों को भी अध्ययन करवाना दोनों ही रूपों में स्वाध्याय हो सकता है। आदमी पहले स्वयं अध्ययन कर ज्ञान का अर्जन करता है, तभी तो वह दूसरों को भी ज्ञान प्रदान कर सकता है।

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मुंबई । मंगलवार को आचार्य महाश्रमण (Acharyashri Mahashraman) ने अपने प्रवचन में कहा कि स्वाध्याय को एक प्रकार का तप ही बताया गया है। स्वाध्याय में रत रहने वाले की भी कर्म निर्जरा होती है। स्वयं अध्ययन करना और दूसरों को भी अध्ययन करवाना दोनों ही रूपों में स्वाध्याय हो सकता है। आदमी पहले स्वयं अध्ययन कर ज्ञान का अर्जन करता है, तभी तो वह दूसरों को भी ज्ञान प्रदान कर सकता है। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने पहले कितना ज्ञान अर्जित किया। कितनी गाथाएं कंठस्थ कीं तो उन्होंने कितनों को शिक्षित भी किया। स्वाध्याय का पहला प्रकार वाचना है। ज्ञान के विकास के लिए जिज्ञासा, प्रतिप्रश्न भी करना चाहिए। जिज्ञासा होती है तो उस ज्ञान को अच्छे ढंग से समझा जा सकता है। श्रीमद्भगवद् गीता में भी बताया गया कि शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहले गुरु को प्रणाम करो, गुरु से ज्ञान प्राप्त करो और गुरु की अच्छी सेवा करो। ज्ञान के विकास के कंठस्थ किए हुए ज्ञान का पुनरावर्तन भी करते रहना चाहिए। ज्ञान के विशेष विकास के लिए ज्ञान की अनुप्रेक्षा भी करने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे ज्ञान का अर्जन करने के उपरान्त कथा भी करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री के सानिध्य में जैन विश्व भारती द्वारा प्रज्ञा पुरस्कार सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। संचालन मंत्री सलिल लोढ़ा ने किया।

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