Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
Los Angeles : हलदे के साथ ही आश्चर्य खत्म नहीं होने वाला था। एक और आश्चर्य मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। अब मुझे प्रीति उस छोटे से गोल टेबल पर ले गई जहां मैं रोज ट्विटर और यह लेख लिखने का काम करता था। यहां एक बड़े से प्याले में पानी पताशे रखे हुए थे। मैं चकित होकर प्रीति से पूछ बैठा कि ये कहां से लेकर आई तो उसने हंसते हुए बताया कि उसने आज सुबह ही घर पर तले हैं, खास कर मेरे लिये मुझे वाकई पताशे बहुत पसन्द थे। अमेरिका में पताशे मिलना कोई खास बात नहीं मगर घर पर बनाना तो निश्चित रूप से बड़ा काम था। प्रीति ने कहा कि आजकल बहुत आसान है, भारत से बने बनाये पताशे आ जाते हैं, इन्हें तल लो तो फूल जाते हैं। पताशों का पानी और घटनी भी उसने बनाई थी। जन्म दिन का इससे बढिया तोहफा और क्या हो सकता था।
मेरी वापसी का टिकट 28 अग. का था। अब कहीं नहीं जाना था। दो चार दिन यहीं घर पर गुजार कर वापस लौटना था। प्रीति मेरे मैले कपड़े धोने में लग गई। मैंने बहुत मना किया, वैसे भी भारत लौट ही रहा था, मगर नहीं मानी। पेकिंग की भी तैयारियां शुरू कर दी। इस बार वजन का टेन्शन नहीं था क्यूंकि आते वक्त जो खाने पीने का सामान साथ लाया था, उसका वजन कम हो गया था।
भारत में सबसे फोन करके पूछ लिया कि किसी के लिये कुछ लाना है क्या। आजकल तो वैसे भी भारत में हर चीज मिलती है। 90 के पहले का वो दौर नहीं रहा जब हर छोटी बड़ी चीज विदेश से स्मगल होती थी। कोई विदेश गया नहीं फरमाईशों की झड़ी लग जाती थी। नरसिंह राव ने देश की काया कल्प कर दी, वो नहीं होते तो शायद आज भी स्कूटर की बुकिंग के लिये भी लम्बी लम्बी लाइनें लगतीं।
मेरी बड़ी बहिन की एक दोहिती गरिमा गुप्ता, पास ही सेन्टा क्लारा में रहती है, वह मुझसे मिलने आ गई। अगले दो तीन दिन उसी को साथ लेकर प्रीति अग अलग मालों में ले जाती और घर के उपयोग की छोटी मोटी वस्तुओं की खरीदारी करवाती। गरिमा की डिजनीलेण्ड देखने की बड़ी इच्छा थी, मेरी तनिक भी रूचि नहीं थी, मैं पहले ही चार बार देख चुका हूं, दो बार तो एल.ए. में ही, एक बार होंगकोंग में और एक बार फ्लोरिडा में किसी तरह सपना को तैयार किया, वह उसके साथ जाने को तैयार हो गई।
डिजनीलेण्ड हमारे घर के पास ही था। रोज रात को कहीं से आते थे तो वहां होने वाली आतिशबाजी आकाश में नजर आ जाती थी। सपना ने मुझसे भी चलने को कहा, मैंने कहा कि मैं कई बार जा चुका हूं तो यह बोली कि दो तो दर्जनों बार जा चुकी है, कोई भी बाहर से आता है तो डिजनीलेण्ड जाना ही चाहता है, हर बार उसे ही उनको लेकर जाना पड़ता है।
सपना ने कहा कि आप चलोगे तो सिनीयर सिटिजन होने के कारण हम अलग लाईन में खड़े हो सकेंगे जिससे जल्दी नम्बर आ जायगा। डिजनीलेण्ड में भीड़ इतनी पड़ती है कि आधा समय तो लाइनों में खड़े होने में ही बरबाद हो जाता है। मैंने कहा कि मैं तो चल चल कर थक जाऊंगा तो उसने कहा कि यह तो और भी अच्छा है, आपको व्हील चेयर में बिठा देंगे तो अलग लाईन में भी हम सबसे आगे खड़े हो सकेंगे। उसकी बात पर मुझे हंसी आ गई, मानों मुझे अपना भविष्य दिखाई दे गया, मगर मैंने मना कर दिया।
अगले दिन मैं और मुनीश, सपना व गरिमा को डिजनीलेण्ड छोड़ने गये। बहुत साल पहले जब मैं यहां आया था तो यह शहर से दर एकदम निर्जन स्थान था। आसपास न कोई बस्ती न ही कोई जन जीवन था आज वहीं समुचा क्षेत्र घना बस गया है, चारों तरफ होटलें, दुकाने, मकान, कोलोनियों की भरमार हो गई। दोनों को डिजनीलेण्ड के पार्किंग क्षेत्र में उतार हम वापस लौट चले। मैं दुनिया के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के इतने समीप था फिर भी इसे देखने की कोई लालसा नहीं हो रही थी। एसी ही अनुभूति उदयपुर में होती थी, वहां की विश्व प्रसिद्ध झीलों को देखने की लालसा में जो लोग आते थे, उन्हें ये दिखाते हुए इसी तरह की उदासीनता महसूस होती थी। शाम को वापस जाकर उन्हें ले आये इस बार भीड़ बहुत थी, आतिशबाजी दूर से ही नजर आने लगी थी, लोग इससे पहले ही निकलने लगे थे जिससे भीड़ में नहीं फंसे।
लोस एंजलेस के पास ही एक छोटा सा गांव है- सेन हुआन केपीस्ट्रोनो। यह वो इलाका है जिसे अपने प्राचीन स्वरूप में संरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। यहां आज भी 400 साल पुराने घर, दुकानें, गिरजाघर देखने को मिल जाते हैं। कभी केलिफोर्निया मेक्सिको का हिस्सा हुआ करता था, तब ईसाई मिशनरियों ने स्पेन से आकर यहां चर्च की स्थापना की और अपनी धार्मिक गतिविधियों से लोगों को लुभाना शुरू कर दिया। धीरे धीरे इन गतिविधियों ने राजनैतिक स्वरूप ग्रहण कर लिया और एक दिन समूचे मेक्सिको पर स्पेन का कब्जा हो गया। बाद में केलिफोर्निया अलग होकर अमेरिका में मिल गया मगर उस पर तथा मेक्सिको पर स्पेनिश प्रभाव आज भी है। स्पेनिश यहां की दूसरी भाषा है।
इस गांव के कुछ क्षेत्र को संरक्षित रख कर या प्राचीन स्वरूप दे कर पर्यटन आकर्षण का केन्द्र बना दिया है। प्राचीन घरों-दुकानों के बाहर जगह जगह विस्तार पूर्वक उस जमाने के रहन-सहन वगैरा की जानकारी दी गई है।
उदयपुर में भी शिल्पग्राम में कुछ इसी तरह का संरक्षण है मगर वह राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक का है तथा बाद में बनाया गया है जबकि विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे कई स्थान हैं जो प्राचीन स्वरूप में है, उन्हें संरक्षित कर पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनाया जा सकता है। यहां एक रेल्वे प्लेटफार्म भी था जो उस जमाने को प्रतिबिम्बित करता था जब रेल लाईन शुरू ही हुई थी। यहां से एक रेल लाईन भी गुजरती है जो आज भी कार्यरत है, यह सेन डियेगों से सिमेंटल तक प्रशान्त महासागर के किनारे किनारे चलती है। इस रेल लाइन हेतु बने हुए रेल्वे क्रोसिंग तथा उसके बोर्ड प्राचीन स्वरूप लिये हुए ही हैं।
कई प्राचीन भवनों में आधुनिक व्यवसाय खुल गये हैं, इनमें रेस्टोरेन्ट शो रूम वगैरा हैं। एसे ही एक रेस्टोरेन्ट में बैठकर हमने आईसक्रीम खाई। यह गांव समुद्र तट के समीप है इसलिये तट पर भी एक गांव विकसित हो गया है, हालांकि उसे प्राचीन स्वरूप नहीं दिया गया है।
Editorial

Editorial

Next Story