Delay in Justice System
सीबीपी श्रीवास्तव.. यह एक स्थापित तथ्य है कि न्याय चाहे विधि द्वारा स्थापित व्यवस्था से दिया जाए या वह प्राकृतिक हो, उसका उद्देश्य हमेशा अर्थपूर्ण न्याय देना ही होता है। इसका तात्पर्य यह है कि जिस व्यक्ति या संस्था के साथ अन्याय हो रहा है, उसे दूर किया जाएगा। यही भारत के न्याय तंत्र का मूल तत्व है। ऐसे में अगर न्याय मिलने में विलंब हो रहा हो तो वह निश्चित रूप से अर्थपूर्ण नहीं होगा। हालांकि विलंबित न्याय के कई कारण हैं, लेकिन तारीख पर तारीख का एक अंतहीन सिलसिला यानी स्थगन की कुसंस्कृति एक ऐसा कारक साबित हो रही है, जिसने भारत के न्यायिक तंत्र में गहरी पैठ जमा ली है। इतनी अधिक कि मुख्य न्यायाधीश को भी बीते दिनों इसे रेखांकित करने पर विवश होना पड़ा। स्थगन की यह कुसंस्कृति वस्तुतः वादियों-प्रतिवादियों के साथ सीधे तौर पर अन्याय का कारण बन रही है । कोई भी वादी अपने मुकदमे की कानूनी बारीकियों से अनभिज्ञ होता है और उसके लिए वह अपने अधिवक्ता पर निर्भर होता है। वह अपनी क्षमता से कहीं अधिक समय और पैसा खर्च करता है। आम तौर पर मामलों के निपटारे में तीन साल और नौ महीने लग जाते हैं । स्थगन की कुसंस्कृति मामलों के लंबित रह जाने के पीछे एक बड़ी हद तक जिम्मेदार है।
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के अनुसार भारत के विभिन्न न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 4 करोड़ 42 लाख है। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) मामले में यह कहा था कि ' त्वरित सुनवाई का अधिकार' एक मूल अधिकार है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 द्वारा गारंटीकृत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अर्थ में शामिल है। ऐसी स्थिति में स्थगन की परंपरा त्वरित न्याय की उपलब्धता के मार्ग में बड़ा व्यवधान उत्पन्न करती है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी हाल में चिंता व्यक्त करते हुए यह कह कि पिछले दो-तीन महीनों में अधिवक्ताओं ने 3,688 मामलों में स्थगन की मांग की है। यानी स्थगन भारतीय न्याय तंत्र में विरोधाभास उत्पन्न करने वाला एक प्रमुख कारण बना हुआ है ।
स्थगन के विषय पर यदि कानूनों की बात करें तो इनमें कई सुरक्षा उपाय हैं। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश में प्रविधान है कि मुकदमे के दौरान एक पक्ष को केवल तीन स्थगन दिए जाएंगे। इसके अलावा, इसमें यह भी प्रविधान है कि स्थगन केवल पर्याप्त कारण के लिए ही दिया जाएगा या फिर तब जब परिस्थितियां किसी पक्ष के नियंत्रण से बाहर हों। यहां विचारणीय यह है कि कानून बनने के बाद भी कार्यान्वयन में कमी है। इसी प्रकार, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 309 में दांडिक मामलों में स्थगन से संबंधित प्रविधान है। इसके अनुसार, किसी भी जांच या मुकदमे कार्यवाही तब तक निरंतर चलती रहनी चाहिए, जब तक उपस्थित सभी गवाहों की जांच नहीं हो जाती । हालांकि, यदि अदालत यह निर्धारित करती है कि स्थगन आवश्यक है तो वैध कारण दर्ज किए जाने चाहिए। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 376ए, 376 एबी, 376बी, 376सी, 376डी, 376 डीए, या धारा 376 डीबी के अंतर्गत यौन अपराध जैसे कुछ अपराधों से संबंधित मामलों के लिए, जांच या मुकदमा आरोप पत्र दाखिल करने की तारीख से दो महीने के भीतर पूरा किया जाना चाहिए ।
यदि किसी मुकदमे के दौरान अदालत कार्यवाही को स्थगित करना आवश्यक या उचित समझती है, तो उसे ऐसा करने का अधिकार है। देरी की अवधि उचित होने के आधार पर और दर्ज किए गए विशिष्ट कारणों पर विचार करते हुए निर्धारित की जानी चाहिए। यदि स्थगन या स्थगन की इस अवधि के दौरान कोई आरोपित व्यक्ति हिरासत में है, तो उसे वारंट द्वारा रिमांड पर लिया जा सकता है। जैसा कि ऊपर उल्लेख है कि वादी या प्रतिवादी तब तक स्थगन का अनुरोध नहीं कर सकते जब तक कि परिस्थितियां उनके नियंत्रण से बाहर न हों। किसी पक्ष के अधिवक्ता का किसी अन्य न्यायालय में अनुपस्थित रहना स्थगन का कारण नहीं हो सकता । यदि कोई गवाह अदालत में मौजूद है, लेकिन कोई पक्ष या उसका अधिवक्ता उससे पूछताछ करने के लिए तैयार नहीं है, तो न्यायालय के पास गवाह का बयान दर्ज करने के संबंध में उचित निर्णय लेने का अधिकार है। ईश्वर लाल माली राठौड़ बनाम गोपाल (2021) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा था कि कानून और पेशेवर नैतिकता इस तरह के अभ्यास की अनुमति नहीं देती।
किसी न किसी बहाने बार- बार स्थगन और टालमटोल की रणनीति अपनाना न्याय और मामलों के शीघ्र निपटारे की अवधारणा का अपमान है। जमीनी स्तर पर यह भी देखने में आता है कि जब भी ट्रायल कोर्ट अनावश्यक स्थगन देने से इन्कार करते हैं तो कई बार उन पर सख्त होने का आरोप लगाया जाता है और उन्हें बार यानी वकीलों की नाराजगी का सामना करना पड़ता है । सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका में अधिकारियों, जिनसे सभी प्रकार के न्याय की अपेक्षा है, को इस बारे में अपने विवेक से कार्य नहीं करना चाहिए ताकि वादियों के प्रति वे अपने कर्तव्यों का सही अर्थ में पालन कर सकें। यह किसी से छिपा नहीं कि बार-बार तारीखों की मांग न केवल न्याय देने में विलंब करती है, बल्कि यह आम नागरिकों में गलत संदेश देती है और अंततः न्यायिक तंत्र पर उनका भरोसा भी घटाती है।
एक कुशल एवं प्रभावी न्याय वितरण प्रणाली सुनिश्चित करने एवं नागरिकों का विधि के शासन में विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायालयों को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। हीलाहवाली के रवैये का परित्याग करना होगा। समय पर कार्यवाही संपादित करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश ने तारीख पर तारीख का जिस प्रकार संज्ञान लिया है, उसे न्यायिक बिरादरी में एक चेतावनी और मिसाल के रूप में लिया जाना चाहिए। भारतीय संविधान उच्चतम न्यायालय को अंतिम रूप से अर्थपूर्ण न्याय देने के लिए उत्तरदायी भी बनाता है। ऐसी स्थिति में यदि आवश्यक हो तो शीर्ष न्यायालय को अपने स्तर से ही स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए, ताकि स्थगन की यह परिपाटी बेलगाम न हो ।
Editorial

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