✕
Home>
लॉस एंजलेस 13 : उच्च अक्षांशों के बर्फीले प्रदेश से गर्म प्रदेश में वापसी
By EditorialPublished on
लॉस एंजलेस की उड़ान हेतु निर्धारित द्वार पर यात्रियों की भारी भीड़ थी। रेल यात्रा के बाद पहली बार वापस अकेला ही यात्रा कर रहा था इसलिये थोड़ा डर एक बार विमान में बैठ गया तो उसके बाद तो ठिकाने पहुँचना ही है। एयरपोर्ट पर मुनीश लेने आने वाला था ही। प्रतीक्षारत यात्रियों से सभी सीटें भरी हुई थीं। कुछ सीटों पर लोगों ने अपना सामान भी रखा हुआ था। मेरे पास कोई चारा नहीं था, मैं क्षमा मांगते हुए एक सीट से सामान उठाने लगा तो वहां बैठी एक गोरी महिला अपना सामान उठा कर मुनमुनाती हुई चली गई।

x

Los Angeles : लॉस एंजलेस की उड़ान हेतु निर्धारित द्वार पर यात्रियों की भारी भीड़ थी। रेल यात्रा के बाद पहली बार वापस अकेला ही यात्रा कर रहा था इसलिये थोड़ा डर एक बार विमान में बैठ गया तो उसके बाद तो ठिकाने पहुँचना ही है। एयरपोर्ट पर मुनीश लेने आने वाला था ही। प्रतीक्षारत यात्रियों से सभी सीटें भरी हुई थीं। कुछ सीटों पर लोगों ने अपना सामान भी रखा हुआ था। मेरे पास कोई चारा नहीं था, मैं क्षमा मांगते हुए एक सीट से सामान उठाने लगा तो वहां बैठी एक गोरी महिला अपना सामान उठा कर मुनमुनाती हुई चली गई।
थोड़ी ही देर में कई अन्य लोग भी अपना सामान लेकर उठने लगे। मैं समझा उड़ान की घोषणा हो गई है, तभी माईक पर घोषणा सुनी जिससे पता चला कि इन लोगों की कोई अन्य उड़ान है तथा इनका द्वार बदल गया है, सभी उठ कर उसी द्वार की तरफ जा रहे थे। अब मुझे भी टेन्शन हो गया कि कहीं मेरी भी उड़ान का द्वार तो नहीं बदल गया, एसा अक्सर हो जाता है, द्वार बदल जाता है और यात्री पुराने द्वार पर ही बैठे रहते हैं। एक बार जर्मनी में हमारे साथ ऐसा ही हादसा पेश आया। मैं अपने भाई साहब, भाभी के साथ फ्रेन्कफर्ट हवाई अड्डे पर था। हम लोग अमेरिका जाने अपनी उड़ान की प्रतीक्षा में निर्धारित द्वार पर बैठे थे तभी हमारा द्वार बदल गया और हमें पता भी नहीं चला। यूरोप के देशों में यह सबसे बड़ी समस्या है। कि लोग अपनी भाषाओं में ही बोलते हैं, जर्मन-फ्रेन्च आदि। इन लोगों को अंग्रेजी आती है तो भी ये अंग्रेजी नहीं बोलते। एसे में पूछताछ करना, जानकारी लेना बहुत मुश्किल हो जाता है। अचानक हमने देखा कि हमारे साथ यात्रा करने वाले आसपास बैठे एक भी लोग नजर नहीं आ रहे हैं, हमारा माथा ठनका। मैं उठकर इधर उधर देखने लगा तो एक यात्री को सामान सहित भागते देखा। मैंने उशी टी.वी. स्क्रीन पर देखा तो पता चला कि बोस्टन जाने वाली उड़ान का द्वार बदल गया है, तब हम भी सामान उठा कर भागते भागते नये द्वार पर पहुँचे।
यहां भी टी.वी. स्क्रीन देखा तो हमारी उड़ान का द्वार वही था। अब तक काफी सीटें खाली हो गई थी, मैं अपनी जगह से उठ कर द्वार के पास वाली सीट पर जाकर बैठ गया। यहां भी दो द्वार एकदम पास पास थे, दोनों से अलग अलग उड़ानें जा रही थी। दोनों के यात्री बैठे थे। मैंने काउन्टर पर जाकर पुष्टि कर ली कि एल. ए. के लिये यहीं से उड़ान जायेगी तो वहां खड़ी महिला ने कहा कि आप जा सकते हैं। अब तक उड़ान की घोषणा नहीं हुई थी इसलिये मैं समझ नहीं पाया कि वो क्या कहना चाहती थी। जा सकते हैं का तात्पर्य काउन्टर से जाने का था या उड़ान के लिये बने एरोब्रिज के वेस्टीब्यूल में जाने का। मैंने सोचा चलकर देखते हैं, ज्यादा से ज्यादा रोक देगी और क्या। मैं सहमते सहमते आगे बढा तो वहां खड़ी युवती ने मुस्कराते हुए मेरा बोर्डिंग पास मांगा, उसने लौटाते हुए शुभकामनाएं दी तो मैं आगे बढ़ गया।
इस बीच मुनीश का फोन आ गया। उसने कहा कि उड़ान निर्धारित समय पर है, वो दोपहर 3 बजे मुझे लेने आ जायगा। विमान में प्रविष्ठ होते ही जिस तरह हमारे यहां खूबसूरत नव युवतियां प्लास्टिक मुस्कराहट के साथ अभिबादन करती है वैसा यहां कुछ नहीं था। पारिचारिकाएं भी प्रौढ, सामान्य एवं कामकाजी थी। उनका अभिवादन भी अत्यन्त सहज था। मैं अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। अब तो लॉस एन्जलेस जाकर उतरना ही था। आसपास कोई बात करने वाला भी नहीं था। मैं निश्चित होकर सो गया। सुबह वेनकूवर से निकलने के बाद अब तक गहमा गहमी ही रही थी, थकान भी हो गई थी, इसलिये नींद भी जल्दी ही आ गई।
कब मेरे पास आकर सहयात्री बैठे, कब विमान उड़ा मुझे कुछ पता नहीं चला नींद तब उड़ी जब मेरे पास बैठी एक महिला ने मुझे जगाया, पारिचारिका खाद्य सामग्री लेकर आई थी, तब मैंने देखा कि मेरे पास वाली सीट पर एक महिला व उसकी बगल में एक बच्ची बैठी है। मैंने उसे धन्यवाद दिया और पारिचारिका की ट्रे में से एक कोच का टिन व एक आलू चिप्स का पेकेट उठा लिया। ट्रे में और भी चीजें थी मगर मुझे ज्यादा भूख नहीं थी। एक चक्कर लगाने के बाद वह वापस खाली प्लास्टिक की थैली लेकर आ गई जिसमें कचरा एकत्र कर रही थी। इसके बाद वापस वही ट्रे लेकर आ गई, मैंने कोक का एक और टिन उठा लिया।
शीघ्र ही हमारा विमान लॉस एंजलेस के लॉग बीच हवाई अड्डे पर उतर गया। यह हवाई अड्डा छोटा ही है। यह पहले वायु सेना का हवाई अड्डा था। अब यहां अत्यन्त सीमित संख्या में व्यावसायिक उड़ानों की अनुमति दी गई है। लास एजलेस का प्रमुख हवाई अड्डा तो लेक्स है, वहां इतनी अधिक भीड़ रहती है कि सात टर्मिनलों के होते हुए भी उड़ानों को जगह नहीं मिलती। एल. ए. वैसे भी बहुत बड़ा और बहुत फैला हुआ शहर है, कई लोगों के लिये दूर भी पड़ जाता है इसलिये शहर के चारों और अतिरिक्त हवाई अड्डे विकसित कर दिये गये हैं। जाते वक्त हम जोन वेयन से गये ही थे। इनके अतिरिक्त अलग अलग दिशाओं में ओन्टेरियो तथा बरबैंक विमान तल और हैं।
हवाई अड्डा साधारण ही था, एरो ब्रिज की भी सुविधा नहीं थी। ज्यू ही विमान के बाहर निकला गर्म हवा के थपेड़ों ने मेरा स्वागत किया। यह चिर परिचित अनुभूति थी। अब तक उच्च अक्षांसों के बर्फीले प्रदेश में थे। यह गर्मी पुनः शुष्क प्रदेश में लौटने की द्योतक थी। विमान तल जेट ब्ल्यू की उड़ानों का प्रमुख स्थल था। पूरे तल पर इसी के विमान ज्यादा दिखाई दे रहे थे।
बिमान की सीढीयों से उतर कर टर्मिनल में प्रवेश किया उसी में तप गया। अब तक जो धूप सुहानी लगती थी वही अब चिलचिलाती महसूस हो रही थी। अन्दर प्रवेश करते ही मुनीश नजर आ गया। मुझे देखते ही प्रसन्न हो गले लग गया। ज्यादा लोग नहीं थे, हमारी उड़ान के कई लोग जिनके पास सामान नहीं था, वे सीधे ही निकल गये थे। हम कुछ लोग ही बचे थे जो अपने सामान का इन्तजार कर रहे थे। सामान आने में देर लग गई, बेल्ट का इलाका खुला ही था, ए.सी. भी नहीं थे इसलिये अच्छी खासी गर्मी का एहसास हो रहा था।
पार्किंग भी एकदम सामने ही थी, सामान उठाया और पास ही लगी गाड़ी में रख कर घर की तरफ बढ़ गये। हवाई अड्डा जोन वेयन के मुकाबले घर से कुछ दूर था। थोड़ी ही देर में हम घर पहुँच गये। मुनीश ने गाड़ी में बैठे बैठे ही रिमोट से गेरेज का दरवाजा खोला, गाड़ी अन्दर ली, वापस रिमोट से गेरेज का दरवाजा बन्द किया और सामान निकाल कर घर के अन्दर प्रविष्ठ हुए।
ज्यू ही घर में कदम रखा कि हेप्पी बर्थ डे टू यू की आवाजों और तालियों से मैं चौंक उठा। एक पल तो मैं समझा ही नहीं फिर ध्यान आया कि 24 अगस्त तो अभी तक चल रही है. प्रीति और उसकी बेटी सपना ने माला पहना कर मेरा स्वागत किया और गले मिलकर जन्म दिन की बधाई दी। मैं तो इसी गलतफहमी - में था कि इन्हें ध्यान नहीं होगा मगर वाट्स एप एसा एप बना है कि सबको क्षणों में सब पता चल जाता है।
मैं सुबह का निकला हुआ था। प्रीति ने कहा कि आप नहा धोकर तैयार हो जाईये फिर सब मिल कर केक काटेंगे। मैंने मना किया कि केक-वेक काटने का काम बच्चों का होता है, मुझ बूढे ठाड़े को कहां इसमें शामिल कर रही हो। उसने कहा कि आप तैयार तो होईये फिर देखेंगे।
कई दिनों बाद वापस ठंडे पानी से नहाने का मजा ही और था। कुर्ता पजामा - पहन बाहर आया तो प्रीति ने डाइनिंग टेबल पर केक सजा रखा था। ब्राउन रंग का शायद चाकलेट केक था, जिन्दगी में कभी मैंने केक नहीं काटा, आज यह दिन भी देखना पड़ रहा था। केक के उपर एक दिया रखा था, इसे देख मैं हतप्रभ रह गया। जन्म दिनों पर मोमबत्तियां बुझाने का मैं हमेशा विरोध करता हूं और अपने घर पर भी इसकी बजायें दिया जलाने पर ही जोर देता हूं। प्रीति शायद यह बात जानती थी। मैंने ज़्यू ही दीप प्रज्वलित किया सबने बधाईयां दी। अब प्रीति ने मेरे हाथ में एक चम्मच दिया, चाकू की बजाय चम्मच देख कर फिर अचरज में पड़ गया। चम्मच से केक का हिस्सा निकाल कर ज्यू ही मुँह में रखा एक और आश्चर्य हो गया। यह केक नहीं वरन हलवा था। गुड़ व आटे से बना अत्यन्त स्वादिष्ट हलवा जो मुझे बहुत पसन्द है। प्रीति की सूझ बूझ और प्रत्युत्पन्नमति का मैं कायल हो गया।

Editorial
Next Story
Related News
X
