Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan

Los Angeles : सामान लेकर हम एयरपोर्ट के टर्मिनल में पहुंचे, न किसी ने टिकिट देखा न ही कहीं आई.डी. बतानी पड़ी। हमारे रेल्वे स्टेशनों में जाने के लिये तो फिर भी. प्लेटफार्म टिकिट की आवश्यकता होती है, यहां तो वो भी नहीं थी। हर कोई, कहीं भी आ जा सकता था।
अन्दर घुसते ही डेल्टा के काउन्टर एकदम सामने थे, राजा की उड़ान दोपहर डेढ़ बजे थी मगर मेरी उससे पहले साढ़े बारह बजे ही थी। अभी सुबह के सिर्फ दस-साढ़े दस बजे हुए थे। हमारे पास काफी समय था, मगर सामान भी साथ था। राजा ने सामान के साथ मुझे एक जगह बिठा दिया और मेरी जेट ब्ल्यू की उड़ान कहां से जाती है पता करने चला गया। मैं बैठे बैठे अपने सामान से जितेन्दर द्वारा बांधे गये आचार-पराठे निकाल कर खाने लगा।
थोड़ी ही देर में राजा लौटा, मुझे खाता देख नाराज हो गया और डांटने लगा कि थोड़ी भी सबर नहीं है, उसके आने तक तो रूकना था। मैंने कहा, बैठे बैठे क्या करता। उसने कहा- यह सब बन्द करो, अपन उपर चलते हैं, जेट काउन्टर उपर ही हैं। मैंने कहा सारा सामान उपर लेकर जायेंगे इससे अच्छा तो यह है कि तेरा सामान यहां चेक इन करा देते हैं। डेल्टा पर काफी लम्बी लाइनें लगी हुई थी, राजा ने कहा बहुत देर लगेगी। मैंने कहा अपने पास ढेर सारा समय है। ब्ल्यू के राजा ने अपना सामान लिया और लाईन में लग गया, वहीं पता चला कि न्यूयार्क की उड़ान 11 बजे जा रही है, राजा ने कोशिश की कि इस उड़ान में सीट मिल जाये तो ढाई घण्टे बच जायेंगे मगर उड़ान पूरी भरी हुई थी। राजा को काफी देर लग गई मगर वो मेरे सामने ही खड़ा था इसलिए मैं निश्चिन्त था, वैसे भी थोड़ी देर बाद तो उससे अलग होना ही था।
राजा अपना सामान चेक इन करवा कर बड़बड़ाते हुए आया कि अगर पहले ही 11 बजे की उड़ान ले लेता तो बहुत समय बच जाता। मैंने कहा कि 11 बजे की उड़ान बुक कराता और हमें वेनकूवर में लौटने में घन्टा भर भी देर हो जाती तो क्या करते? मुनीश ने सोच समझ कर ही टिकिट बुक कराये थे।
अब मेरा सामान लेकर हम एस्केलेटर से उपर आये। एयरपोर्ट बहुत बड़ा था, गजब की भीड़ थी, एसी गहमा गहमी जो हमारे रेल्वे प्लेटफार्मों पर भी नजर नहीं आये, इसके साथ ही दुकानों, रेस्टोरेन्टों की भरमार। तमाम रेस्टोरेन्ट लोगों से अटे पड़े थे। मैंने भी अपना सामान चेक इन करवा कर बोडिंग पास ले लिया। अभी भी मेरी उड़ान में डेढ़-दो घन्टे पड़े थे। अब हमारे पास करने को कुछ नहीं था, हम एक रेस्टोरेन्ट के बाहर लगे टेबल पर बैठ गये। राजा ने कहा- लाओ, अब निकालो अचार पराठे। मैंने कहा वो तो गये सामान के साथ चेक इन में।
राजा के सब्र का बांध टूट गया। वो यह मान रहा था कि सामान वगैरा चेक इन कराने के बाद एक जगह बैठ कर तसल्ली से खायेंगे। उसे आचार पराठे बहुत पसन्द थे, उसने जितेन्दर को खास कहकर बंधवाये थे, मेरी बात सुन कर उसकी ...यह मंशा धरी रही गई। गुस्सा तो उसे बहुत आया, मगर मुझ पर नहीं उतारा, बस मुझे सुनाते हुए बड़बड़ाता रहा- इतने बड़े पत्रकार बने फिरते हैं, इतनी भी समझ नहीं कि खाना तो बाहर निकाल लेते वगैरा वगैरा।
हम रेस्टोरेन्ट के बाहर ही थे, बड़बड़ाते हुए ही वह अन्दर गया और क्या क्या मिल रहा है देख कर बाहर आया। मुझसे पूछा कि क्या खाओगे, फ्राइज भी हैं पीजा भी है, इसके अलावा आपके खाने लायक कुछ भी नहीं है, इसके साथ ही फिर बड़बड़ाना शुरू कर दिया- इन्सान बाहर निकलता है तो सब खाना चाहिये, यह नहीं खाउंगा वो नहीं खाउंगा करने से काम थोड़े ही चलता है, हर जगह कचोरी- - समोसे थोड़े ही मिलते हैं। समोसे का नाम लेते लेते उसकी हंसी छूट गई। दरअसल उसे खुद को समोसे बहुत पसन्द हैं।
समोसों के साथ राजा की जिन्दगी की एक मजेदार घटना जुड़ी हुई है। बरसों पहले अमेरिका में बस जाने के बाद वह अपने छोटे भाई को भी यहां ले आया था, बड़ी मुश्किल से उसे सेट करना चाह रहा था मगर वह वापस भारत लौट गया, महन इसलिये कि यहां तो समोसे ही नहीं मिलते।
ढेर सारा खाने पीने का सामान ला कर, वह मेरे सामने आकर बैठ गया। हम दोनों खाने लगे। हमारी टेबल के पास ही एक नवयुवती बैठी थी, उसका मुँह राजा की तरफ था, मेरी बगल में थी इसलिये उसे देखने के लिये मुझे गर्दन मुडानी पड़ती थी। खाते खाते राजा ने अचानक उस लड़की से पूछा कि क्या कोई तकलीफ है, - मैं हैरत में पड़ गया कि अनजान युवती से राजा इस तरह का सवाल क्यूं कर रहा। मैंने गर्दन मुड़ाकर उस युवती की तरफ देखा, सोचा शायद रो रही होगी इसीलिये राजा ने इस तरह का सवाल किया, मगर उसके चेहरे पर एसे कोई चिन्ह नजर नहीं आये वरन वह तो राजा के सवाल से प्रसन्न ही नजर आ रही थीं।
मैं फिर खाने लगा तभी राजा ने उस युवती से कहा बेटा है तो उसने जवाब दिया हां, मैंने फिर उसकी तरफ देखा, आसपास उसका कोई बेटा नजर नहीं आ रहा था। मैं राजा से कुछ पूछू उसके पहले ही उसने एक और सवाल दाग दिया- कौन सा महीना चल रहा है। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, मैंने फिर उस युवती की तरफ देखा, उसने हंसते हुए जवाब दिया- सातवां ।
अब सारी बात मेरी समझ में आई, लड़की जरूर गर्भवती होगी, मैंने वापस उसकी तरफ देखा, टेबल उसके आड़े आ रहा था इसलिये पता नहीं चल रहा था. इसी बीच एक फौजी उसके टेबल के पास आया, उसे देखते ही वह उठ खड़ी हुई और उससे गले मिली। अब जरूर उसका बढ़ा हुआ पेट नजर आ रहा था। फौजी उसका पति था, लड़की ने राजा से उसका परिचय कराया। वह छुट्टियां लेकर आ रहा था, युवती उसी के इन्तजार में यहां बैठी थी। हमें अभिवादन कर दोनों चले गये तब मैंने राजा से पूछा कि तुझे कैसे पता चला कि वह गर्भवती है, और इतनी सहजता से इस बारे में बात करते जरा भी झिझक नहीं होती।
अपने यहां तो किसी अनजान स्त्री से एसी बात करना तो बहुत दूर परिचिताओं, यहां तक की निकटतम रिश्ते की स्त्रियों तक से इस तरह की बात करना ठीक नहीं समझा जाता। कोई करता भी नहीं। राजा ने कहा- दादा! आप क्या समझो इन बातों को, मैं डाक्टर है, उसे देखते ही पता चल गया था, फिर जब उसे क्रेम्प उठा तो उसके चेहरे पर पड़ी दर्द की लकीरें देख मैंने पूछा कि क्या कोई तकलीफ है। जहां तक झिझक का सवाल है, यहां तो स्त्रियां उनके होने वाले बच्चे के बारे में बात करके प्रसन्न ही होती हैं, देखा नहीं मैंने जब उससे पूछा कि बेटा है तो कितना खुश होकर उसने हामी भरी। अब मैंने पूछा कि तुझे कैसे पता चला कि - उसके बेटा होगा। राजा ने कहा यह मनोविज्ञान है, हर स्त्री मन ही मन बेटा ही चाहती है, इसलिये मैंने भी ठोक दिया कि बेटा है क्या ?
अब तक काफी वक्त गुजर गया था, मेरी उड़ान का समय पास आ रहा था, मेरी उड़ान का द्वार बहुत दूर था। राजा से विदा लेने का वक्त आ गया था। मुझे अमेरिका आये 32 दिन हो गये थे, इस दौरान 23 दिन मैं उसके साथ रहा। उसने हर तरह से मेरा खयाल रखा था, कभी मां बनकर तो कभी बड़ा भाई बन कर तो कभी बच्चा बन जाता था। उसका गुस्सा भी कृत्रिम होता था। वह बहुत उदारमना और यारों का यार था। उसका यह साथ अविस्मरणीय रहेगा। वह ठेठ तक मुझे छोड़ने अया, कहीं भी किसी तरह की रोक टोक नहीं थी। उसके पास तो वैसे भी वैध टिकिट था मगर यात्रियों को लेने आने वाले या छोड़ने वाले सामान्य लोग भी बिना रोक टोक के अन्त तक प्रवेश कर सकते थे। आतंकवाद की समस्या यहां भी कम नही है मगर इसे लेकर हमारे प्रशासनों का जो लकीर के फकीर जैसा रवैया उसकी बजाय यहा ज्यादा व्यावहारिक सोच है जिसमें नागरिकों की कठिनाईयों के पक्ष का भी ध्यान रखा जाता है। राजा से गले मिला तो दोनो भावुक हो उठे। मैं एकदम मुड़कर आगे बढ़ गया, वो हाथ हिलाता रहा।
Editorial

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