Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
वेन्कूवर Vancouver : यह पहाड़ थोड़ा ऊंचा था। यहां ठंड भी ज्यादा थी। यह समूचे उत्तरी अमेरिका का विशालतम स्की रिसोर्ट है। यह इतना बड़ा है कि इसके बाद दूसरे नम्बर पर आने वाले रिसोर्ट का इलाका इसका आधा भी नहीं है। ब्लैक कोम्ब पहाड़ का विकास 1968 के शीतकालीन ओलम्पिक खेलों हेतु किया गया था मगर तब इसे आतिथ्य नहीं मिला। 1980 से 1990 तक इसके और विसलर पहाड़ के बीच जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वन्द्विता चलती रही जो कई सालों बाद एक ही कम्पनी द्वारा दोनों रिसोर्ट खरीद लिये जाने से खत्म हुई।
यहां गतिविधियां भी ज्यादा थी, कई रेस्टोरेन्ट जगह जगह खुले हुए थे। सभी की टेबल या खुले में लगी थी। लोग इन कुर्सियों पर बैठ चटक धूर का आनन्द लेते हुए खा-पी रहे थे। बच्चों के खेलने के लिये भी छोटे-मोटे झूले बने हुए थे।
यहाँ एक चौड़ा सा मैदान था जिस पर हेलीकोप्टर उतर रहे थे। हेलीकोप्टर की सवारियों को दोनों पहाड़ों व समूचे क्षेत्र के विहंगम दृश्य दिखाये जाते थे। यहां श्री पहाड़ की चोटियों पर चढ़ने के अलग अलग रास्ते बने हुए थे। मैं तो रेस्टोरेन्ट के लगी कुर्सी पर बैठ गया खाना-पीना तो कुछ था नहीं उठने को कहा तो उठ जाऊंगा मगर यहां कई अन्य लोग भी बैठे थे।
पर्यटकों का जमावड़ा भारी था। भारतीयों की संख्या भी अच्छी खासी थी। स्त्रियों-बच्चों के साथ पूरे परिवार द्वारा मौज-मस्ती कर रहे थे। एक परिवार के साथ नव वधू भी दिखाई दी, बार बार वह अपनी साड़ी का पल्लू उपर लेती, अपने परिजनों के समक्ष शरमाती भारत की याद दिला रही थी।
चारों तरफ बर्फ ही बर्फ था, और कुछ देखने को यहां था नहीं। राजा और कुलवन्त भी इधर-उधर चढ चढा कर लौट आये। यहां से नीचे का दृश्य बहुत सुन्दर दिखाई दे रहा था, थोड़ी देर खड़े होकर यही निहारते रहे। पास में ही एक जगह भारी भीड़ जमा हो रही थी, हम भी उधर पहुँचे तो देखा कि लोग एक जानवर का फोटो लिये जा रहे हैं। यह एक चूहा था मगर बड़े बिल्ले जितना इसका आकार था। सब इसे पहाड़ी चूहा बता रहे थे। चूहा भी भीड़ से डरे बिना वहां का वहां डटा हुआ था।
आये। थोड़ी देर और यहां गुजार कर हम जिन गण्डोलाओं, केबल कारों से उपर • उन्हीं से वापस लौट पड़े। जाते वक्त हमारी केबल कार में दो युवतियां भी चढ़ गई। इनका व्यवहार देख कर बहुत आश्चर्य हो रहा था, इनके वस्त्र भी थोड़े कम ही थे। ये जरूरत से ज्यादा ही बिन्दास हो रही थी और बात बात पर एक दूसरे से लिपटती तो एक दूसरे को चूमती जा रही थी। राजा इन्हें देख कर हंस रहा था। ये भी अपनी सेल्फीयां ले रही थीं तो राजा ने उनका मोबाईल ले उनका चित्र ले लिया। राजा द्वारा चित्र लिये जाने के बाद शायद उन्हें हमारी उपस्थिति का एहसास हुआ क्यूंकि इसके बाद वो एकदम शांत और गंभीर हो सामान्य व्यवहार करने लगी।
नीचे उतर कर पार्किंग में पहुँचे तो समय ज्यादा हो गया था। अतिरिक्त पैसे भर कर कार में बैठे और वापस वेनकूवर की तरफ प्रस्थान किया। घर पर पहुँचे जितने रात हो चुकी थी। जितेन्दर ने हमारे लिये खाना बना रखा था। हमें बिठा कर वह गर्म गर्म फुलके उतारने लगी। इसी बीच कुलवन्त सौ-सौ डालरों के कई नोट राजा को देने लगा और अफसोस करने लगा कि उसका पर्स यहीं रह गया था। राजा ने लेने से इन्कार कर दिया, कहा कि तेने हमारे लिये दो दिन की छुट्टी ली, घुमाया फिराया, जितेन्दर ने इतनी आवभगत की, यह क्या कम है। कुलवन्त जिद करता रहा कि आप मेरे घर आये हो, मेरा फर्ज है मगर राजा ने पैसे नहीं लिये।
खाना खा, पैकिंग वगैरा कर हम सो गये। सुबह वापस अमेरिका लौटने के लिये जल्दी तैयार होना था। राजा ने क्रूज के दौरान की गई ढेर सारी खरीददारी में से एक वस्तु जीतेन्दर को दे दी। मेरे पास तो कुछ था भी नहीं, मैंने शब्दों और अपनी भावनाओं के माध्यम से ही अपनी कृतज्ञता व्यक्त की और कहा कि आपका आतिथ्य जीवन भर याद रहेगा।
सुबह जल्दी उठे। 24 अगस्त हो गई थी, आज मेरा जन्म दिन था। गनीमत थी कि किसी को पता नहीं था, क्रूज के दौरान शायद कभी मुझसे जिक्र हो गया हो और राजा को याद हो तो पता नहीं। मैं यही खैर मना रहा था कि इसे याद नहीं हो। जितेन्दर ने जल्दी उठकर भारी नाश्ता बना लिया था। कुछ नाश्ता हमारे साथ भी बांध दिया। इस बार हमने मना नहीं किया।
हमारी किराये की कार उसी जगह खड़ी थी जहां हमने आते ही पार्क की थी। इसके बाद तो यह हिली भी नहीं थी कुलवन्त ने ही अपनी गाड़ी में हमें सर्वत्र घुमाया था। वापस गाड़ी का जी.पी.एस. सेट करना था। राजा ने कुलवन्त को कहा तो उससे भी नहीं हुआ। उसने अपने लड़के को बुलाया, उसे सियेटल के कार रेन्टल का पता बताया तो तुरन्त सेट कर दिया। एक बार फिर उसने चरण स्पर्श कर पैरी पन्ना की। कुलवन्त ने गले मिल कर हमें विदा दी, जितेन्दर घर के दरवाजे पर खड़ी काफी देर तक हाथ हिलाकर अभिवादन करती रही।
प्यार और अपनत्व से एसा लगने लगा था जैसे बरसों से इनके साथ हो। इन्हें छोड़ कर जाते हुए बार बार यही अनुभूति हो रही थी। इस बार सीमा पर हमें जरा भी वक्त नहीं लगा। पासपोर्ट बताया और 1. अमेरिका में प्रवेश कर गये। मेरी कनाडा की यात्रा सम्पन्न हो चुकी थी। अमेरिका अमेरिकी समाप्ति पर ही थी। सियेटल पहुँच कर राजा भी मुझसे जुदा होने वाला था। उसकी न्यूयार्क की उड़ान थी, मेरी लोस एंजलेस की।
हम कनाडा-अमरीका सीमा की तरफ अग्रसर हो गये। इस समूचे परिवार के कनाडा से जल्दी निकलने का उद्देश्य यही था कि हम समय रहते एयरपोर्ट क्यूंकि रिस्पेटल पहुँच कर कार भी जमा करानी थी, एयरपोर्ट भी जाना शीघ्र ही हम सियेटल शहर की सीमा में प्रविष्ठ हो गये। इसके साथ ही जबर्दस्त ट्राफिक का सामना करना पड़ गया। गाड़ी में हम दो थे इसलिये हम द्रूत गति का रास्ता पकड़ने के अधिकारी थे, बाकी के रास्ते में वाहनों का जमावड़ा इन्ची इन्दी आगे बढ रहा था।
हमारे पास काफी समय था इसलिये निश्चिन्तता थी। जी.पी.एस. के सहारे हम सीधे कार रेन्टल की बिल्डिंग में पहुँच गये। यहां एक महिलाकर्मी ने कार की चाबियां ली और आगे बढ गई। न कोई चेकिंग, न कोई औपचारिकता, मैं देख देख कर हैरान था। कार से हमने अपना सामान निकाला और एस्केलेटर चढकर उपर टर्मिनल में पहुँच गये। यहां एयरपोर्ट जाने के लिये निशुल्क शटल बसें उपलब्ध थीं। अलग अलग एयर लाइन्स के अलग अलग स्टोप बने हुए थे। राजा की डेल्टा थी और मेरी जेट ब्ल्यू दोनों के स्टोप अलग थे मगर हम डेल्टा के स्टोप पर ही खड़े हो गये। हमारी उड़ानों में अभी वक्त था इसलिये अभी से अलग होने में कोई सार नहीं था।
हमारे साथ कई अन्य यात्री भी थे, सबके पास अच्छा खासा सामान था जिनसे बस ठसाठस भर गई थी। तभी एक वृद्ध दम्पत्ति बस में चढी, उनका सामान वहां खड़े सहायक ने चढ़ा दिया। वे खड़े हो गये मगर तभी पहले से सीटों पर बैठे कई लोगों ने इन्हें अपनी सीटों पर बैठने के लिये कहा। सामान के बीच से जगह बनाते हुए किसी तरह ये लोग बैठे। बस चल चुकी थी, सामान हिल रहा था, इस कारण भी कठिनाई ज्यादा हुई। एयरपोर्ट पास ही था इसलिये जल्द ही हम डेल्टा के टर्मिनल पर पहुँच गये। जेट ब्ल्यू का भी पास ही था यह जानकर तसल्ली हुई।
Editorial

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