Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
वेन्कूवर Vancouver : तेज धूप खिली हुई थी फिर भी ठंड इतनी थी कि बदन ठिठुर रहा था। राजा और कुलवन्त ने आस पास के पहाड़ों पर चढ़ने की कोशिश की मगर वे ज्यादा उपर नहीं चढ़ पाये। मैं एक बेन्च पर बैठ कर उनका इन्तजार करने लगा, वे शीघ्र ही वापस लौट आये।
पहाड़ से समूचे विसलर का विहंगम दृश्य इस तरह दिखाई देता था जैसे किसी चित्रकार की तस्वीर हमारे सामने हो । उपर नीचे आती केबल कारों की गतिविधि से जरूर इसके साक्षात होने का अहसास होता था।
ब्लेक कोम्ब पहाड़ एकदम सामने था, वहां से आती-जाती गण्डोला एकदम जिपलाईन पर लटके लोगों की तरह ही दिखाई देती थी, ये भी तारों पर ही लटकी हुई थी। थोड़ी देर इधर उधर घूम कर मॉल में चढ गये। यह एक गोलाकार बिल्डिंग थी जिसका नाम राउण्ड हाउस लॉज था। यहां विभिन्न तरह की दुकानें, रेस्टोरेन्ट थे। यहीं से ब्लेक कोम्ब पहाड़ पर जाने की गण्डोला के स्टेशन का रास्ता था।
विदशों में चाहे वो होंगकोंग हो, सिंगापुर हों, यूरोप के देश या अमेरिका- कनाडा हों, एक बात हर पर्यटन स्थल पर देखी जाती है कि कहीं भी जाने का रास्ता किसी दूकान से ही होकर जायगा। इन दुकानों पर सामान इतने आकर्षक व लुभावने तरीके से सजाया गया होता है कि पर्यटक का खरीददारी करने को दिल मचल ही जाता है। राजा इसका आदर्श उदाहरण था। वह कुछ खरीदकर ही आगे बढा।
मॉल में तथा गण्डोला स्टेशन पर तापमान सामान्य था। जरूर हीटर लग रहे होंगे। गण्डोला में जाने वालों की कतार लम्बी थी। हमारे सामने गण्डोला आ रही श्री. यात्री उतर रहे थे और नये चह रहे थे। गण्डोला अत्याधुनिक व बहुत बड़ी थी। एक साथ कई यात्री इसमें बैठ सकते थे। इस गण्डोला का विश्व रिकार्ड है और गिनीज बुक में इसका नाम विश्व के बिना सहारे के सबसे लम्बे फैलाव वाली लिफ्ट हेतु अंकित है। यह स्थान 3 कि.मी. से कुछ अधिक है। यह अपने प्रकार की सर्वोच्च ऊंचाई पर चलने वाली लिफ्ट है जो 1427 फुट की ऊंचाई पर चलती है। स्पिट्जरलैण्ड के आल्प्स के पहाड़ों के बीच जरूर एक लिफ्ट चली थी जो इससे भी लम्बी थी, इसका नाम एरियल ट्रामवे था मगर यह 1986 में बन्द हो गई।
यह गण्डोला तीन तारों पर चलती है। यूरोप में इसी तरह की चार लिफ्टें हैं मगर वे इससे छोटी हैं, न इतनी दूरी पर, न इतनी ऊंचाई पर चलती हैं। विदेशों में जिस तरह अधिकांश पर्यटन स्थल निजि हाथों में होते हैं उसी तरह इन दोनों पहाड़ों की मालिक भी एक निजि कम्पनी ही है। सबसे पहले एक कम्पनी ने विसलर पहाड़ खरीद कर यहां गतिविधियां शुरू की। इसके बाद एक अन्य कम्पनी ने ब्लेक कोम्ब पहाड़ खरीद कर वहां गतिविधियां शुरू कर दी। 1997 में जाकर जब दोनों पहाड़ किसी एक ही कम्पनी ने खरीद लिये तब पर्यटकों को एक ही टिकिट पर दोनों पहाड़ों का आनन्द उठाने का अवसर मिला।
पहले कई स्किंग करने वाले एक पहाड़ पर स्किंग करके वापस नीचे उतरते और दूसरे पहाड़ पर चढ़ते और वहां स्किंग करते। अब उन्हें एसा करने की जरूरत नहीं। गण्डोला के जो स्टेशन है वे भी दुनिया के सबसे बड़े लिफ्ट टर्मिनल हैं। इतनी ऊंचाई पर निर्माण के लिये सीमेन्ट-कंक्रीट व अन्य सामग्री हेलीकोप्टरों में लाद लादकर पहुंचाई गई।
टर्मिनल के कर्मचारी प्रतीक्षारत यात्रियों को गण्डोला की मशीनों के बारे में अलग से जानकारी दे रहे थे। स्टेशन के नीचे भूमिगत हाल में बहुत बड़ी बड़ी मशीनें लगी हुई थी जिनसे गण्डोला संचालित होती थी।
गण्डोला में बैठने के लिये दो तरह की कतारें लगी हुई थी। एक कतार में बारी आने का समय 20 मिनट लिखा था जबकि दूसरी कतार में 5 मिनट में बारी आ जाती थी। पहली कतार वालों को ग्लास बोटम गण्डोला में बैठने का अवसर मिल जाता था जिससे गण्डोला के एक जगह से दूसरी जगह जाते हुए नीचे का दृश्य भी दिखाई देता था जबकि दूसरी कतार वालों को सामान्य फर्श की गण्डोला मिलती हम दूसरी वाली लाईन में ही खड़े हो गये क्यूंकि शीशे के फर्श वाली लिफ्टों में नीचे ढंग से कुछ देख नहीं पाते। लोग चारों तरफ का दृश्य देखने के लिये खड़े हो जाते हैं तो नीचे कुछ देख भी नहीं पाते। यह अनुभव हमने कनाडा के एक टावर की लिफ्ट में कर लिया था ।
शीशे के फर्श वाली गण्डोला सिल्वर रंग की थी जबकि शेष सभी लाल रंग की। • 28 केबिन थे जिनमें सिर्फ 2 ही सिल्वर थे, इसीलिये इनमें चढने हेतु कुल ज्यादा प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। लिफ्ट में चढ़ने से पहले सुरक्षा निर्देश दिये जा रहे थे। यदि कभी लिफ्ट रोप वे पर चलते हुए बीच में ही अटक जाए तो यात्रियों को रस्सी के सहारे नीचे उतारा जाता है। हालांकि आज दिन तक एसी घटना नहीं हुई थी फिर भी एक बार तो मेरा दिल बैठ गया। कुछ बोलता तो ये हंसी उड़ाते इसलिये चुप ही रहा।
2014 में जरूर इस गण्डोला के सर्वोच्च स्थल से गण्डोला के द्वार तोड़ एक व्यक्ति ने पेराशूट द्वारा नीचे खाई में छलांग लगा दी थी। इस व्यक्ति के साथ एक महिला थी, दोनों ने मिल कर दरवाजा खोला था। महिला ने इस छलांग का वीडियो बना कर यू ट्यूब पर डाल दिया। हफ्ते भर में इन्हें गिरफ्तार कर इन पर जुर्माना लगाया गया। इस कृत्य की बहुत आलोचना हुई मगर वह व्यक्ति प्रसिद्ध हो गया।
थोड़ी ही देर में हमारा क्रम भी आ गया। गण्डोला बड़ी थी, चारों तरफ बैठने की जगह थी, एक साथ 28 लोग इस लिफ्ट में आ सकते थे। हमारे बैठते ही द्वार बन्द हुए और लिफ्ट आगे बढ़ गई। ये लिफ्टें प्रति घन्टे चार हजार यात्रियों को ले जाती हैं। दो बिन्दुओं की दूरी 11 मिनट में तय की जाती है।
ज्यू ही गण्डोला आगे बढ़ी, चारों तरफ लगे बड़े बड़े शीशों से बाहर के हृदयस्पर्शी दृश्य दिखाई देने लगे। सभी खड़े हो गये और मोबाइलों से चित्र लेने लगे। किसी एक यात्री के पास भी केमरा नहीं था, सब मोबाइल से ही चित्र ले रहे थे। केमरा जैसी वस्तु कभी इतनी अप्रासंगिक हो जायगी इसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता था।
शीशे के बाहर हिमाच्छादित चोटियां नजर आ रही थी। हर कोई शीशों के सहारे खड़े होकर इन चोटियों के साथ अपने चित्र ले रहे थे। हमारे पास एक भारतीय दम्पत्ति बैठी थी, वे दोनों सेल्फी लेने की कोशिश कर रहे थे, राजा ने उनका मोबाइल लेकर उनके चित्र ले लिये।
नीचे का दृश्य देखने के लिये शीशे के फर्म की जरूरत ही नहीं पड़ी, खिड़कियों से ही समुची घाटी नजर आ रही थी। चारों तरफ पहाड़ों से घिरा विसलर गांव एक छोटे से कटोरे की भांति नजर आ रहा था। घाटियों के बीच बनी झीलें, घने जंगल, ग्लेशियर सब अनुपम दृश्य उपस्थित कर रहे थे।
गण्डोला आगे बढी तो अचानक बादलों ने इसे घेर लिया। कुछ पलों के लिये तो एसा लगा जैसे गहरी धुंध में फंस गये हों, मगर इस अनुभूति से कि हम बादलों के बीच हैं, रोमांच पैदा कर दिया। यह अनुभूति क्षणिक रही, गण्डोला अगले ही पल बादलों से बाहर निकल ब्लेक कोम्ब पहाड़ की तरफ अग्रसर हो गई। राह में क्रम से उधर से आती हुई गण्डोला नजर आ रही थी।
ब्लेक कोम्ब पहाड़ पर बना टर्मिनल भी एक रेस्टोरेन्ट के अन्दर था। ज्यूं ही हम बाहर निकले रेन्डीवू रेस्टोरेन्ट हमारे सामने था। रेस्टोरेन्ट से बाहर निकलते ही वापस तीक्ष्ण हवाओं का आक्रमण झेलना पड़ा।
Editorial

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