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वेन्कूवर 11 : गहरी खाई के उपर जोखिम भरा जिपलाईन एडवेन्चर
By EditorialPublished on
वेन्कूवर Vancouver : थोड़ा सा और ऊंचा उठे तो दोनों पहाड़ों की घाटी और इनके बीच अवस्थित विशाल झील का नयनाभिराम दृश्य हमारे सामने था। ज्यू ज्यू लिफ्ट उपर उठ रही थी त्यू त्यू ही यह दृश्य और भी सुन्दर होता जा रहा था। हम बहुत उपर आ गये थे, इतनी ऊंचाई पर भी साइकिल सवार नीचे उतरते नजर आ रहे थे। शीघ्र ही हम पहले स्टेशन पर पहुँच गये। यह चारों तरफ से बन्द था। यहां हमें केबल कर बदलनी थी। हमारे उतरते ही कार आगे बढ़ी और नीचे जाने के लिये तैयार सवारियों के सामने आकर रूक गई। वो बैठे और केबल कार नीचे की तरफ बढ़ गई। केबल कार

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वेन्कूवर Vancouver : थोड़ा सा और ऊंचा उठे तो दोनों पहाड़ों की घाटी और इनके बीच अवस्थित विशाल झील का नयनाभिराम दृश्य हमारे सामने था। ज्यू ज्यू लिफ्ट उपर उठ रही थी त्यू त्यू ही यह दृश्य और भी सुन्दर होता जा रहा था। हम बहुत उपर आ गये थे, इतनी ऊंचाई पर भी साइकिल सवार नीचे उतरते नजर आ रहे थे। शीघ्र ही हम पहले स्टेशन पर पहुँच गये। यह चारों तरफ से बन्द था। यहां हमें केबल कर बदलनी थी। हमारे उतरते ही कार आगे बढ़ी और नीचे जाने के लिये तैयार सवारियों के सामने आकर रूक गई। वो बैठे और केबल कार नीचे की तरफ बढ़ गई। केबल कार तो एक चक्रवत पथ पर चल रही थी, लोग ही उपर जा रहे थे तो नीचे उतर रहे थे।
हम लोगों को स्टेशन की दूसरी तरफ ले जाया गया। अब चूंकि एकदम खड़ी ऊंचाई थी इसलिये अधिक शक्तिशाली लिफ्टें उपयोग में ली जाती थीं। इनकी कारें भी चारों तरफ शीशों से बन्द थी। ज्यूं ही उपर उठे, अब हमें नीचे का दृश्य के साथ पहाड़ों की समानान्तर श्रृंखलाएं नजर आने लगीं जो सभी बर्फ से ढकी थी।
हम उपर चढ़ रहे थे, इसी बीच पहाड़ों के बीच तारों से लटकते लोगों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाते देख दंग रह गये। कोई हाथों के सहारे इन तारों से लटके हुए थे तो कोई इन तारों से लटकी रस्सी पर बनी सीट पर बैठे हुए खुली हवा में इस प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द ले रहे थे। रस्सी स्टील के तारों की अत्यन्त मजबूत थी जिन पर गिरारियों के सहारे लोग इधर से उधर जाते थे। एक बार तो इन्हें देख कर ईर्ष्या हो गई, हमें बन्द केबिन में भी इतना अच्छा लग रहा है तो इनके मजे की तो कोई सीमा ही नहीं होंगी, पर अगले ही क्षण जब चिलचिलाती सर्दी और तीखी हवाओं के थपेड़ों की याद आती तो संतोष हो जाता।
यह दरअसल जिपलाईन एडवेन्चर कहा जाता है। भारत में भी आजकल कई बड़ी बड़ी शादियों, डेस्टीनेशन वेडिंग्ज में इस तरह के इवेन्ट आयोजित किये जाते हैं जिनका अतिथि भरपूर मजा लेते हैं। यह कहीं भी हो सकता है, रस्सी को थोड़ा ढलाव में एक सिरे से दूसरे सिरे पर बांध दिया जाता है और लोग गिरारियों के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का मजा लेते हैं। ये तो किसी पार्क में बहुत नीचे आयोजित होता है मगर यहां बर्फ की वादियों में, नीचे गहरी खाई के उपर एसा जिपलाईन एडवेन्चर बहुत जोखिम भरा कार्य था ।
मनोरंजन के साथ साथ कई बार इस जिपलाईन, जिसे जिप वायर या एरियल रोप स्लाइड भी कहते है, आपदा प्रबन्धन में भी काम में आती है। बाढ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों के दौरान लोगों को बचाने में भी इनका भरपूर उपयोग होते देखा गया है। यह इतना आसान और सस्ता मनोरंजन का साधन है कि जिस किसी स्थान पर थोड़े से भी पर्यटक एकत्र होते हों वहां यह सुविधा प्रदान कर लोगों को मजा दिया जा सकता है।
जिप लाईन ट्रोलियां भी होती हैं। कई दुर्गम स्थानों पर तो ये आवागमन का साधन बनी हुई हैं। हाथों के सहारे लटकते या रस्सी पर बैठकर जाने की बजाय पर्यटन स्थलों पर एसी ट्रोलियां भी चलाई जा सकती है जिनमें लटकने की जोखिम भी नहीं होती और सब इसका आनन्द ले सकते हैं। इन्हीं खयालों में डूबता - उतराता रहा कि हमारा गंतव्य आ गया। केबल स्टेशन से ज्यूं ही बाहर निकले ठंडी हवाओं के झोंकों ने स्वागत किया। पूरे शरीर में एक झुरझुरी फैल गई। अब तक तो चारों तरफ से ढके हुए थे, स्टेशन पर भी शायद हीटर लगे थे, नीचे से उपर आने के बाद पहली बार हवा का सामना किया था तो तापमान के अन्तर का अहसास हो रहा था।
हम विसलर पहाड़ के शीर्ष पर थे, चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी, पहाड़ की चोटि एकदम हमारे सामने थी। इतनी ऊंचाई पर बर्फ के मध्य भारी चहल पहल श्वेत उज्जवल बर्फ के पार्श्व के समक्ष रंग बिरंगे परिधानों में पर्यटक एक रोचक कोलाज का सृजन कर रहे थे। लम्बा चौड़ा इलाका था, पहाड़ की चोटि के नीचे कई छोटी छोटी पहाड़ियां थी। इन तक जाने के रास्ते बने हुए थे। कई यात्री इन रास्तों पर चलते हुए अधिकाधिक ऊंचाई तय करने की कोशिश कर रहे थे। हमारे सामने भी बढ़ने का आनन्द लेने का विकल्प था। मैंने तो साफ इन्कार कर दिया, ये दोनों चाहते तो जा सकते थे, मैं तब तक इधर उधर घूम लूंगा। यहां व्यस्तता के ढेर सारे साधन थे। कई रेस्टोरेन्ट, आर्ट गेलेरियां, गिफ्ट शोप्स यहां तक की एक मॉल भी बनी थी। इन्हें देखकर विदेशियों के व्यापारिक दिमाग का कायल हुए जा रहा था। इतनी ऊंचाई पर भी पर्यटक जब सवाई डेढ़ी कीमतों में चीज खरीदता है तो अपने आपको लुटता महसूस नहीं करता वरन पर्यटन स्थल की प्रशंसा ही करता है। कि इतने दुर्गम स्थान पर भी शोपिंग का मनोरंजन उपलब्ध करा रखा है। इस तरह दिमाग हमारे यहा नजर नहीं आता।
थोड़ा आगे बढ़े तो एक तरफ ओलम्पिक खेलों के प्रतीक चिन्ह पांच बड़े बड़े नगर आये जो ओलम्पिक रिंग्ज के नाम से प्रसिद्ध है। 2010 के शीतकालीन ओलम्पिक तथा विकलांग ओलम्पिक विसलर में ही आयोजित हुए थे। विसलर में इन खेलों की याद में जगह जगह कई स्मारक बने हुए हैं। इसके तहत उस स्थान पर जहाँ 27 दिनों तक प्रतिदिन विजेताओं को मेडल प्रदान किये जाते थे उसे एक पार्क, स्वरूप देकर ओलम्पिक पार्क का नाम दे दिया गया है। इस पार्क में बड़ी बड़ी ओर के पीछे वह मूल देग भी लगी हुई है जिसमें ओलम्पिक मशाल प्रति की गई थी। इसी तरह बर्फ के उस मैदान को जहां विभिन्न प्रतिस्पर्धाएं हुई थी भी ओलम्पिक पार्क का नाम दे दिया गया है। विसलर में जगह जगह ओलम्पिक रिंग्ज बनी हुई हैं, इन्हें देख देख कर ऐसा लगने लगता है जैसे ये । पांच गोले ही विसलर की पहचान बन गये हों।
यहां इस पहाड़ पर भी बने हुए ये पांच बड़े बड़े गोले उसी अनुमति का परिचय दे रहे थे। गोलों के नीचे ही स्वर्ण, रजत व कांस्य पदक विजेताओं को पुरूस्कृत करने जैसी सीढ़ीयां बनी हुई थी। पर्यटक इन सीढीयों पर खड़े होकर अपने चित्र खिचाते और सेल्फीयां लेते। गोल्ड की सर्वोच्च सीढ़ी पर कौन खड़ा होगा इसकी भी झड़पें होती रहती जिसे देख देख सब मजा लेते और खुद खड़े होते तो ऐसे ही
हम तीनों ने भी इन ओलम्पिक रिंग्ज के सामने खड़े होकर फोटो लेने की सोची, मगर फोटो लेता कौन। राजा ने एक युवती से विनती की तो वह खुशी खुशी तैयार हो गई। गोल्ड की सीढ़ी पर कौन खड़ा होगा इसके झगड़े का सवाल ही नहीं था, वहां तो राजा को ही खड़ा होना था सो वो झट उस पर चढ़ गया। कुलवन्त सिल्वर पर और मैं ब्रोन्ज पर खड़ा हो गया। राजा ने युवती को धन्यवाद दिया और उससे थोड़ी चुहल की। इसके बाद हम आगे बढ़ गये।
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