Indian Democracy
विभूति नारायण राय… चुनावों का मौसम आते ही छापों की सौ वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा था, पर यह बारिश होने लगती है। इस बार भी हो रही है और औपचारिक शोर-शराबे के अलावा कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है। कई बड़े राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं और राजनीतिक पर्यवेक्षक इन्हें अगले लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान रहे हैं। ऐसे में, स्वाभाविक ही है कि विरोधी दलों के नेताओं के घरों या दफ्तरों में पड़ने वाले छापों के निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है। पहले सीबीआई के लिए देश की सबसे ऊंची अदालत पालतू तोता शब्द का इस्तेमाल कर ही चुकी है, पर अब सीबीआई से ज्यादा नाम कमाने वाली कई संस्थाएं इस बदनाम सूची में जुड़ चुकी हैं। खास तौर से एनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट (ईडी) का नाम सुनाई देने लगा है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस प्रवृत्ति को जांचना दिलचस्प होगा। डॉक्टर आंबेडकर ने संविधान सभा में संविधान का अंतिम ड्राफ्ट पेश करते समय जब सामाजिक और राजनीतिक लोकतंत्र में फर्क को रेखांकित किया था, तब उनके मन में मुख्य रूप से भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव और तज्जनित अन्याय ही था, पर यह कथन कहीं न कहीं इस समाज की आंतरिक संरचना में लोकतंत्र के अभाव की ओर भी इशारा कर रहा था। साल 1952 में हुए पहले आम चुनाव ने पहली बार धर्म जाति, वर्ग, वंश या लिंग के भेद को नकारते हुए जन-सामान्य को अपना शासक चुनने का अधिकार सौंपा था। यह इसलिए भी असाधारण था कि आधुनिक लोकतंत्र की जननी इंग्लैंड और सबसे पुरानी संसद वाले अमेरिका में भी स्त्रियों या अश्वेतों जैसे हाशिये के वर्गों को मताधिकार के लिए कई परिवर्तन कॉस्मेटिक अधिक था । वर्चस्ववादी वर्ग कैसे भी हों, अपना प्रभुत्व छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। शुरू के कई आम चुनावों में तो यह दृश्य आम था, जब किसी क्षेत्र से कोई राजा, महाराजा या जमींदार अपने किसी हलवाहे या ड्राइवर को आशीर्वाद देकर चुनाव लड़ाते और जिताते दिखते थे ।
चुनाव जीतकर जो विधायक या सांसद बन रहे थे, उन्हें असीमित अधिकार मिले और लोकतांत्रिक परंपराओं से रहित समाज ने आसानी से इन अधिकारों को आनुवांशिक और कानून कायदों के नियंत्रणों से परे मान लिया। इस स्थिति में स्वाभाविक था कि अनियंत्रित अधिकारों ने संपदा अर्जन के अपार अवसर उत्पन्न कर दिए। ज्यादातर जन-प्रतिनिधि एक बार चुने जाने के बाद सत्ता से हटना नहीं चाहते और इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं । इस 'कुछ भी' में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग सबसे आसान था और आजादी के बाद से दुर्भाग्य से किसी भी राजनीतिक दल ने इससे कभी भी गुरेज नहीं किया । यह उससे भी बड़ा दुर्भाग्य था कि हमारी नौकरशाही का अधिकांश हिस्सा इस मामले में पूरी तरह से रीढ़-विहीन निकला। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो बहुत कम चमकते उदाहरण मिलेंगे, जिन्होंने गलत को न कहने का साहस किया हो । सत्ता लोलुपों के लिए पुलिस सबसे आसान निशाना थी और उसी का सबसे ज्यादा दुरूपयोग हुआ भी । याद कीजिए शेषन युग से पहले के आम चुनाव, जब बूथ लुटेरे घूम-घूमकर पोलिंग स्टेशन लूटते घूमते थे और उन दिनों पुलिस का काम ही होता था इन लुटेरों की रक्षा करना और विरोधी प्रतिरोध को बलपूर्वक कुचलना । पुलिस के दुरूपयोग की इसी आकांक्षा ने देश में उसमें कभी बुनियादी सुधार नहीं होने दिया। आज भी किसी मुख्यमंत्री का सबसे प्रिय दारोगा कौन हो सकता है? वही सबसे दुलारा होगा, जो उसके विपक्षियों के हाथ पैर तोड़े व उसके समर्थकों के बड़े-बड़े अपराध को नजरंदाज करता रहे। इस स्थिति में सुधार किसी मुख्यमंत्री की अंतिम चिंता होगी ।
अब जब ईवीएम मशीनों का प्रयोग हो रहा है और बूथ पर केंद्रीय बलों की तैनाती होने लगी है, तब बूथ कब्जाने के तौर-तरीके भी बदले हैं। आर्थिक अपराधों से जुड़ी एजेंसियों का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि अब राजनीति से जुड़कर बहुत सारा पैसा कमाया जा सकता है और इस पैसे को सुरक्षित रखने या इसके निवेश के लिए जो रास्ता अपनाया जाता है, उस पर इन एजेंसियों की निगाह रहती है। दिक्कत तब आती है, जब इनकी नजरें सिर्फ विरोधी दलों के नेताओं को देखकर वक्र होती हैं। इन संस्थाओं के छापों से यह पता चल जाता है, किस राजनेता की सत्ता के गलियारे में क्या हैसियत है? भाई लोग इन छापों से टिकटों के बंटवारे का अनुमान लगा लेते हैं। यह जगजाहिर है कि अल्पमत की सरकार के एक नेता पांच वर्षों तक ऐसी ही एक एजेंसी का डर दिखाकर एक बड़े प्रदेश के दो विरोधी नेताओं की पार्टियों का लोकसभा में समर्थन हासिल कर प्रधानमंत्री बने रहे। कई राज्यों में सत्ता पक्ष ने इन्हीं एजेंसियों का भय दिखाकर अपने अल्पमत को बहुमत में बदला है और वर्षों अपनी सरकारें चलाई हैं।
इस स्थिति का एक सकारात्मक पहलू भी है। तमाम तिकड़मों और जोड़-तोड़ वाले लोकतंत्र के बावजूद सरकारें तो बदलती ही रहती हैं और सत्ता में रहते हुए कुछ गलत करने वाले नेता का सुरक्षा कवच विपक्ष में जाते ही भेद्य हो जाता है। हालांकि, कुछ तो दलबदल का सहारा लेकर बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन बहुत सारे इसमें सफल नहीं हो पाते हैं। दिल को बहलाने के लिए यह ख्याल अच्छा हो सकता है, पर लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए तो बिल्कुल ही नहीं। इससे राजनीति में अवसरवाद और तिकड़म को ही प्रोत्साहन मिलेगा। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण हो और जनता को बिना किसी भय या प्रलोभन के अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अवसर मिले। यह सही है कि ऐसा, लोकतंत्र को अपने जीवन का अंग बनाने से ही संभव होगा, लेकिन यह भी सही है कि साफ-सुथरे चुनाव जीवन के लोकतंत्र को भी मजबूत करेंगे। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । संविधान सभा में डॉक्टर आंबेडकर की इस चिंता, कि राजनीतिक लोकतंत्र हासिल करने वाले भारत को सामाजिक लोकतंत्र हासिल करने में समय लगेगा, का हल भी इसी में है कि हम जीवन में लोकतंत्र लाएं। तभी सरकारों की संस्थाओं के दुरूपयोग की प्रवृत्ति पर रोक लग सकेगी और शायद तभी चुनावी मौसम में इतने छापों की खबरें भी पढ़ने को न मिलें ।
Editorial

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