Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan


20-8-16 को सुबह आरामी से उठे । जहाज की यात्रा का यह हमारा अन्तिम दिन था, अगले दिन वापस सियेटल पहुँचने वाले थे। सुबह ही रतनू कमरा खटखटा कर एक पैकेट दे गया। मैं समझा की जहाज वाले सभी यात्रियों को कोई गिफ्ट दे रहे हैं, मगर पेकेट तो एक ही था और यात्री हम दो थे। जरूर अन्दर कोई दो चीजें होंगी सोचते हुए बड़ी उत्सुकता से पेकेट खोला। अन्दर से शराब की बोतल निकली, यह वही बोतल थी जो जहाज पर चढ़ते समय जब्त कर ली गई थी। खोदा पहाड़ निकली चुहिया। मैंने बोतल राजा को थमा दी।
आज हम कनाडा के विक्टोरिया शहर में उतरने वाले थे। विक्टोरिया, कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रान्त की राजधानी है। इसी प्रान्त का प्रसिद्ध शहर है। वेनकूवर जहां हम जहाज यात्रा की समाप्ति के बाद वापस जाने वाले थे। वेनकूवर एक द्वीप है और विक्टोरिया इस द्वीप का दक्षिणी छोर है। विक्टोरिया भी बड़ा शहर है। द्वीप में स्थित होने के कारण विक्टोरिया आने जाने के लिये वायु व जल मार्ग ही विकल्प है। सीएटल से यहां के लिये फैरी चलती हैं जो आवागमन का प्रमुख साधन है।
इस समूचे क्षेत्र पर ब्रिटिश प्रभाव देखा जा सकता है। प्रदेश का नाम तो ब्रिटेन पर है ही, इस शहर का नाम भी ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया पर है। विक्टोरिया में आज हम बहुत बड़ा बाग देखने जाने वाले थे। बाग का नाम लेते ही उदयपुर के गुलाब बाग का बरबस स्मरण हो आता है। यह महज संयोग है या कुछ और गुलाब बाग में भी बीचो बीच, आज जहां महात्मा गांधी की मूर्ति लगी है, उसी स्थान पर महारानी विक्टोरिया की मूर्ति लगी हुई थी जो आजादी के बरसों बाद तक नहीं हटाई गई थी। यह मूर्ति बहुत विशाल थी और इसका शिल्प अदभुत था। महारानी की वेशभूषा की एक एक सिलवटें और बारीकियां इतनी उत्कृष्टता से गढ़ी गई थी कि देखते ही रह जाते थे। उनके कपड़ों की जाली और लेस का शिल्प आज भी याद आता है।
विक्टोरिया, अपने उद्यानों के कारण गार्डन सिटी के नाम से भी जाना जाता पर्यटकों के आकर्षण का तो प्रमुख केन्द्र है ही मगर दुनिया भर से छात्र यहां विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण करने भी आते हैं।
शीघ्र ही अलास्का पाछ छूट गया। अमरीकी जल से निकल कर एक बार फिर हम कनाडा के पानी में प्रवेश कर गये। अपरान्ह 6 बजे विक्टोरिया में उतरने वाले थे। उसके पहले आव्रजन अधिकारियों की पूछताछ थी। 4 बजे के पहले ही मैं प्रियंटर में पहुँच गया। मेरे से पहले कई लोग यहां बैठे थे, इनमें चार भारतीय भी थे, इन्हें देख कर थोड़ी राहत महसूस हुई कि मैं अकेला नहीं हूँ। इनके अलावा अन्य देशों के भी कई लोग थे।
जहाज से यात्री 6 बजे नीचे उतरने वाले थे। प्रीति ने 6.30 बजे की बस के टिकिट बुक करा रखे थे जो हमें बाग में ले जाने वाली थी। चिन्ता यही थी कि तब तक पूछताछ की प्रक्रिया समाप्त होगी कि नहीं। मैं थियेटर की पिछली सीटों पर बैठा था, कई लोग आगे की सीटों पर भी बैठे थे, सोच रहा था कि आगे चला जाऊं तो पहले निबट जाउंगा। तभी जहाज की एक महिला कर्मी आ गई, कुछ लोग उठ कर आगे जाने लगे तो उसने सबको अपने अपने स्थानों पर ही बैठे रहने को कहा। महिला के साथ ही एक अन्य महिला भी थी जिसके हाथ में कई पासपोर्ट थे। यह महिला पासपोर्ट देख कर नाम पुकार रही थी और जिसका था उसे देती जा रही थी, पहले वाली महिला के पास फार्म थे, वह सभी को एक एक फार्म दे रही थी।
सबको अपने अपने फार्म भरकर पासपोर्ट के साथ तैयार रखने थे। विदेश यात्राओं में बार बार पासपोर्ट में अंकित जानकारी समय समय पर भरनी जरूरी होती है। मैंने यह जानकारी पहले ही एक कागज पर लिख कर उसके प्रिन्ट आउट निकाल रखे थे। फार्म में वही जानकारी भरनी होती है जो पासपोर्ट में अंकित हो, इसलिये यात्रा में एसी जानकारी अपने पास रखना ठीक रहता है।
थियेटर की खिड़कियों से बाहर समुद्र का दृश्य दिखाई दे रहा था, जहाज की गति धीमी हो रही थी, जहाज के शहर के समीप पहुँचने का दृश्य दिखाई देने लगा। सभी लोग फार्म भरकर तैयार हो गये मगर आव्रजन अधिकारियों का कहीं नामों- निशां नहीं था। सब व्या हो रहे थे कि यह प्रक्रिया समाप्त हो तो अन्य यात्रियों के साथ ही जहाज से उतरने को मिल जाये।
मेरे पास ही एक युवा भारतीय दम्पत्ति बैठी थी, इनसे नहीं रहा गया तो महिला से पूछ ही लिया कि पूछताछ कब शुरू होगी। महिला ने बताया कि जहाज तट पर रूकेगा, उसके पश्चात ही तो कनाडा के अधिकारी पूछताछ कर पायेंगे, तब तक हमको रुकना पड़ेगा।
अन्ततः जहाज रूका, इस बीच जहाज के गलियारे उतरने वाले यात्रियों से पट गये। इन्हें देख व्यग्रता और बढ़ गई कि कहीं हमारी बस नहीं छूट जाये। महिलाकर्मी हमें आश्वस्त कर रही थी कि सबसे पहले हमें ही उतारा जायगा, हमारा इन्टरव्यू शुरू हो जायगा उसके बाद ही अन्य यात्रियों को बाहर जाने दिया जायगा।
थियेटर के प्रवेश द्वार के पास ही एक लिफ्ट थी। यह जहाज की नियमित लिफ्टों से अलग थी। महिला ने अब एक बड़े ग्रुप के यात्रियों को आगे आने को कहा, ये सब शकल से थाई या कोरियाई लग रहे थे। इन्हें लिफ्ट की तरफ ले जाया गया, यहां एक पुरूष कर्मी अपने साथ इन्हें नीचे ले गया। लिफ्ट छोटी थी इसलिये एक साथ पांच छः लोग ही जा सकते थे।
हमारे साथ एक वृद्ध भारतीय दम्पत्ति भी थी। ये लोग बेंगलोर से अपने बेटे के घर अमेरिका आये थे। यात्रा में उनके साथ बहु, बेटे, पोते-पोती सब साथ थे, मगर वे सब अमरीकी नागरिक थे, इनके पास भारतीय पासपोर्ट थे इसलिये इनसे पूछताछ हो रही थी। बेटे-बहू के बिना ये असहाय अनुभव कर रहे थे। बार बार महिला से अनुरोध कर रहे थे कि उन्हें पहले जाने दे। लगता था अलग अलग राष्ट्रों के आधार पर ही इन्टरव्यू हो रहे थे। एक देश के लोगों के एक साथ हम सब भारतीयों का भी एक ग्रुप बना दिया गया। वृद्ध के अनुरोध का असर यह हुआ कि अगले ग्रुप में हमें ले लिया गया।
लिफ्ट से नीचे उतर कर गेंग प्लेंक पर पहुँचे। यहां एक तरफ जहाज के अन्य यात्रियों को रोका हुआ था। एक पुरुष कर्मी हमारे साथ बना हुआ था। तट पर ही एक बड़े से गोदाम को आव्रजन अधिकारियों ने अपना कार्यालय बना दिया था। हम लोग कतार में खड़े हो गये। वो आव्रजन अधिकारी अलग अलग दो तरफ टेबलें लगा यात्रियों से पूछताछ कर रहे थे। हरेक को दो दो-तीन तीन मिनट लग रहे थे। तभी हमने देखा कि हमसे आगे गये सात आठ यात्री अपने अपने पासपोर्ट ले निराश हो वापस लौट रहे हैं। मैं भौंचक्का रह गया कि जरूरी नहीं कि सबको जाने ही दिया जाये, किसी को रोका भी जा सकता है। अचानक मेरी आंखों के सामने अमेरिका में प्रवेश करते ही आव्रजन अधिकारियों द्वारा की गई पूछताछ के दृश्य नाच गये। कहीं रोक दिया जाये में अब आव्रजन अधिकारियों को गौर से देखने लगा, मुखमुद्राएं भांपने की कोशिश करने लगा कि आखिर ये पूछताछ क्या कर है। जिन लोगों को जाने दे रहे थे उनके पासपोर्ट पर छाप लगा कर शुभकामनाएं। विदे रहे थे। इस बीच जहाज के यात्रियों का उतरना शुरू हो गया। इन्हें बिना किसी बाहर निकलने दिया जा रहा था। मुनीश-प्रीति व राजा भी इनमें थे, मेरे गुजरती इन्होंने मुझे कहा कि चिन्ता मत करो, अभी बस जाने में समय हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा।
Editorial

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