Negative Western Media Narrative
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो की ओर से खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में कथित भारतीय एजेंट का हाथ होने का सनसनीखेज आरोप लगाए जाने के साथ ही यह मामला दुनिया भर में एक बड़ा मुद्दा बन गया। इसलिए और भी अधिक, क्योंकि अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार ने यह कहा कि इस मामले में किसी को छूट नहीं दी जा सकती । इसी के साथ पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा भारत को दोषी बताने और पश्चिमी देशों को उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की सलाह देने में जुट गया। हालांकि निज्जर एक आतंकी था और एक समय वह कनाडा एवं अमेरिका की 'नो फ्लाई लिस्ट में भी शामिल था, फिर भी पश्चिमी मीडिया उसे पुजारी, प्लंबर और सिख नेता आदि बताता रहा। द इकोनमिस्ट ने अपनी इस आशय की खबर को पांच दिन में कम से कम छह बार एक्स पर पोस्ट किया कि यदि भारत निज्जर की हत्या में शामिल पाया जाता है तो पश्चिमी देशों को सीधे नरेन्द्र मोदी के प्रति सख्ती बरतनी चाहिए।
फाइनेंशियल टाइम्स तो जर को लेकर इतना दबित हुआ कि उसने लिखा कि वह अपने हाथों से किचन साफ करता था और छात्रों की मदद करता था। वह उनके लिए पितातुल्य था वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि निज्जर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से सिखों के लिए अलग होमलैंड की मांग कर रहा था। अमेरिकी न्यूज एजेंसी एपी ने उसे सिख एक्टिविस्ट बताया यह सब तब लिखा जा रहा था, जब एसाल्ट राइफल लिए हुए उसकी कई फोटो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हो रही थीं। बीबीसी यह बता रहा था कि पश्चिमी देशों को भारत को रूस, ईरान और सऊदी अरब जैसे काम करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। बीबीसी ने यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि इस तरह के काम अमेरिका और इजरायल को भी करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। न्यूयार्क टाइम्स ने निज्जर को सिख एक्टिविस्ट कहकर संबोधित किया। यह वहीं न्यूयार्क टाइम्स है, जिसने तालिबान के सबसे खूंखार आतंकी सरगना सिराजुद्दीन हक्कानी का एक लेख इसके बावजूद प्रकाशित किया था कि एफबीआई ने उस पर 50 लाख डालर का इनाम घोषित कर रखा था। उसने इस लेख में लिखा था कि तालिबान लड़कियों की पढ़ाई का पक्षधर है। अलकायदा का भोंपू कहे जाने और कतर सरकार के पैसे से चलने वाले अल जजीरा ने लिखा कि यदि भारत निज्जर की हत्या में शामिल पाया जाता है तो यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन होगा।
राजनयिकों को 'किलर' बताने वाले पोस्टर सार्वजनिक स्थलों पर लगाए गए । पश्चिम के किसी मीडिया संस्थान ने यह पूछने की भी जहमत नहीं उठाई कि जब निज्जर की हत्या की जांच जारी है और कनाडा पुलिस उसके हत्यारों के नाम तक नहीं जान सकी है, तब फिर जस्टिन टुडो इस नतीजे पर कैसे पहुंच गए कि उसको हत्या में भारत का हाथ है ? पश्चिमी भारत मीडिया का विरोधी और पक्षपातपूर्ण रवैया नया नहीं है। वह इस श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त है कि भारत समेत दुनिया को वही करना चाहिए, जैसा वह लिखता और बोलता है। यह श्रेष्ठताबोध इतना अधिक है कि प्रायः वह नस्ली दुर्भावना से भरा दिखने लगता है। पश्चिमी मीडिया ने अपने लिए अलग मानदंड बना रखे हैं और शेष दुनिया के लिए अलग इसी कारण पश्चिम में घटी किसी आतंकी या हिंसक घटना में मारे गए लोगों के शव या लहूलुहान व्यक्तियों के फोटो कभी देखने को नहीं मिलते, लेकिन शेष विश्व में इस तरह की घटनाओं में मारे गए लोगों के क्षत विक्षत शव दिखाने में उसे कोई आपत्ति नहीं होती। अपनी इसी मानसिकता के कारण कोविड काल में जहां भारत में जलती चिताओं के फोटो प्रमुखता से दिखाए गए, वहीं अमेरिका और यूरोप में कोविड से मरे लोगों को दफनाने में हो रही देरी और अन्य तरह की अव्यवस्था के फोटो मुश्किल से ही देखने को मिले युक्रेन युद्ध को लेकर भी पश्चिमी मीडिया को यह रास नहीं आया कि भारत तटस्थता का परिचय दे रहा है। उसे जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया जाना भी नहीं पता था। जबसे पश्चिमी मीडिया के दोहरेपन की उजागर करना शुरू किया गया है, तबसे वहां के मीडिया संस्थान यह कहने लगे हैं कि भारतीय मीडिया की विश्व के मामलों की सही समझ नहीं यह वही पश्चिमी मीडिया है, जिसने न केवल राक में जनसंहारक हथियार 'खोज' लिए थे, बल्कि उस पर हमले को आवश्यक भी बताया था। वास्तव में वह कभी-कभी चीनी सरकार के अखबार ग्लोबल टाइम्स को भी मात करता दिखता है।
पश्चिमी मीडिया ने यह बताने की कोई जरूरत नहीं समझो कि निज्जर अवैध दस्तावेजों के सहारे रवि शर्मा के नाम से कनाडा पहुंचा था और वह एक हिंदू पुजारी की हत्या के साथ एक सिनेमाघर में विस्फोट के लिए जिम्मेदार था। पश्चिमी मीडिया ने यह भी नहीं बताया कि भारत ने उस पर 10 लाख रूपये का इनाम घोषित कर रखा था। पश्चिमी मीडिया ने इस तथ्य की भी अनदेखी करना जरूरी समझा कि कनाडा ने प्रारंभ में निज्जर के नागरिकता आवेदन को ठुकरा दिया था जब उसने वहां की एक महिला से शादी कर ली, तब भी उसे नागरिकता का पात्र नहीं समझा गया कोई नहीं जानता कि बाद में कैसे वह वहां की नागरिकता पा गया। माना जाता है कि उसे नागरिकता दिलाने का काम टूडो की पार्टी के एक खालिस्तान समर्थक सिख सांसद ने किया। सच जो भी हो, कनाडा भारत से भागे खालिस्तानी आतंकियों, गैंगस्टरों और नशा तस्करों की सुरक्षित शरणस्थली है। पश्चिमी मीडिया एक ओर जहां जस्टिन ट्रूडो के अपुष्ट आरोपों को सही मानकर चल रहा है. वहीं यह बताने से गुरेज करता रहा कि कनाडा मैं किस तर ह भारतीय
Editorial

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