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जाति गणना के नतीजे क्या रंग लाएंगे
By EditorialPublished on
आजाद भारत (india ) के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी राज्य ने अपने यहां की जातिगत गणना के आंकड़े जारी किए हैं। इसके लिए उसे कानूनी जंग भी लड़नी पड़ी। बहरहाल, बिहार (bihar) के जातिगत सर्वे के मुताबिक, प्रदेश की आबादी लगभग 13 करोड़ है, जिनमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी अन्य पिछड़े वर्गों, यानी ओबीसी की है। यह तबका अति पिछड़ा वर्ग (27.12 प्रतिशत) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (36.01 फीसदी) में बंटा है और कुल आबादी में करीब 63 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। राज्य में अनुसूचित जाति की संख्या 19.65 प्रतिशत और अनु
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संजय कुमार... आजाद भारत (india ) के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी राज्य ने अपने यहां की जातिगत गणना के आंकड़े जारी किए हैं। इसके लिए उसे कानूनी जंग भी लड़नी पड़ी। बहरहाल, बिहार (bihar) के जातिगत सर्वे के मुताबिक, प्रदेश की आबादी लगभग 13 करोड़ है, जिनमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी अन्य पिछड़े वर्गों, यानी ओबीसी की है। यह तबका अति पिछड़ा वर्ग (27.12 प्रतिशत) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (36.01 फीसदी) में बंटा है और कुल आबादी में करीब 63 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। राज्य में अनुसूचित जाति की संख्या 19.65 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की 1.68 प्रतिशत है। सवर्णों का प्रतिशत 15.52 है।
इस जातिगण गणना (caste census) को लेकर अब तक कई तरह की राजनीति हुई है, जो आगे भी थमने वाली नहीं है। सबसे पहले तो यही सवाल उठता है कि आखिर बिहार सरकार ने ये आंकड़े क्यों जारी किए हैं? दरअसल, जब-जब विपक्षी पार्टियां (यानी गैर-भाजपा दल) इस बात की मांग उठाती थीं कि देश में जातिगण जनगणना होनी चाहिए, तब-तब भारतीय जनता पार्टी (bjp) के नेता और समर्थक यही तर्क देते थे कि जिन-जिन राज्यों में जातिगत सर्वे हो चुके हैं, पहले उनके आंकड़े तो जारी किए जाएं? बतौर उदाहरण वे कर्नाटक (यहां कांग्रेस की सरकार है), बिहार (राजद व जद (यू) गठबंधन की सरकार ) का नाम गिनाया करते थे। सच यही है कि राजद हो या जद (यू) या फिर कांग्रेस (Congress), उनके था। संभवत: इसी दबाव में बिहार सरकार ने इन आंकड़ों को जारी किया है, और भाजपा व एनडीए समर्थक दलों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि हमने तो अपना काम कर दिया, अब आपकी बारी है।
बहरहाल, जो आंकड़े सामने आए हैं, उसका कोई खास अर्थ नहीं निकल रहा। इससे ऐसा कोई अद्भुत सत्य जाहिर नहीं हो रहा, जिसका अनुमान पहले न रहा हो। अलग-अलग जातियों की हिस्सेदारी के आंकड़ेको ही देखें, तो ऐसा नहीं है कि उनके बारे में अनुमान कुछ था, और सच कुछ अलग बाहर निकलकर आया है। जातिगत सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में यादवों का प्रतिशत 14 है, तो ब्राह्मणों का 3.66 1 राजपूतों की हिस्सेदारी 3.45 प्रतिशत है, तो मुसहरों की तीन और भूमिहारों की 2.86 प्रतिशत कुर्मियों की संख्या 2.87 प्रतिशत है। इन समुदायों को लेकर अनुमान भी कमोबेश इसी के आस-पास लगाए जाते थे।
आंकड़े कितने प्रभावी होंगे
सवाल यह है कि आखिर ये आंकड़े कितने प्रभावी होंगे? तकनीकी तौर पर देखें, तो इन आंकड़ों का भारतीय राजनीति पर बहुत बड़ा असर पड़ता नहीं दिख रहा। जातियों की संख्या राजनीति को उतनी प्रभावित नहीं करती, जितनी उनकी आर्थिक हैसियत। लिहाजा, जातिगत गणना में सामाजिक हैसियत के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति का भी खाका पेश किया गया होता, तो देश समाज पर व्यापक असर पड़ता दिखता। हालांकि, दावा है कि आर्थिक स्थिति के आंकड़े भी जुटाए गए हैं, जिन्हें बाद में जारी किया जाएगा। अभी होगा यह कि इन आंकड़ों के बहाने तमाम दल अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास करेंगे। वास्तव में, ओबीसी (obc) के ईद-गिर्द ही राजनीति हो रही थी। कहा जा रहा था कि ओबीसी की संख्या ज्यादा है और उनको उस अनुपात में आरक्षण नहीं मिल रहा। अब इन वर्गों को आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की मांग की जाएगी।
मगर इसमें एक पेच है। यह बात सभी दल जानते हैं कि देश की शीर्ष अदालत ने आरक्षण की कुल सीमा 50 फीसदी तय कर रखी है, यानी सरकारी नौकरियों अथवा शिक्षण संस्थानों आदि में खुली प्रतियोगिता से अधिकतम 50 फीसदी सीटें ही आरक्षण से भरी जा सकती हैं। इसमें फिलहाल 27 फीसदी आरक्षण अन्य पिछड़े वर्गों को हासिल है, जबकि अनुसूचित जाति को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर तबके, यानी ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण मिलता है। अगर ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा, तो किसी न किसी वर्ग के आरक्षण में कटौती की जाएगी, जिसके अपने राजनीतिक निहितार्थ होंगे या फिर, संविधान संशोधन का दबाव बनाया जाएगा। यानी, यह बर्रे का एक ऐसा छत्ता है, जिसे शायद ही कोई हाथ लगाने की सोचेगा, मगर इसे लेकर सियासत होती रहेगी, ताकि मतदाताओं को अपने पक्ष में किया जा सके।
जाहिर है, यह मुद्दा महज चुनावी उपकरण के रूप में काम करेगा, जिसका असर 2024 के आम चुनाव पर पड़ सकता है। इसकी भूमिका बनाई भी जाने लगी है। जातिगत सर्वे के आंकड़े जारी करने के कुछ ही देर बाद बिहार के उप-मुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव ने यह कहकर गेंद केंद्र के पाले में डालने की कोशिश की कि अब 'जातिगत जनगणना' कराई जानी चाहिए। आबादी में जिस जाति की जितनी हिस्सेदारी, राजनीति में उनकी उतनी भागीदारी जैसे राग भी अलापे जाने लगे हैं। कहा जाने लगा है, जब करीब 15 प्रतिशत आबादी में सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ हासिल है, तो फिर 63 फीसदी हिस्सेदारी में ओबीसी को महज 27 फीसदी आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? इन सबसे यही लगता है कि विपक्षी पार्टियां अब इस मुद्दे को एक ऐसे हथियार के रूप में बदलने की कोशिश करेंगी, जिसके दम पर आम चुनाव के नतीजों में उलट-फेर किया जा सके।
महिला आरक्षण में पिछड़ों का कोटा
सवाल महिला आरक्षण से जुड़ेकानून और 'एक देश-एक चुनाव' (one country one election) की चल रही चर्चाओं पर भी अब उठेंगे। मतदाताओं तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की जाएगी कि ओबीसी समुदायों के साथ छल किया गया है। कहा जाएगा कि जब तक उन्हें आरक्षण का लाभ हासिल नहीं था, तब तक तो उनके साथ अन्याय होता रहा, लेकिन जब आरक्षण की सुविधा दी गई, तब भी आबादी के अनुपात में उनकी हिस्सेदारी तय न करके उनके साथ कपट किया गया है। मिसाल के तौर पर महिला आरक्षण से जुड़े बिल पर हुई बहस को याद किया जाएगा कि किस तरह से विपक्षी पार्टियां महिला आरक्षण में भी ओबीसी के लिए विशेष आरक्षण की मांग करती रहीं, लेकिन केंद्र सरकार ने 'टालमटोल' कर आनन-फानन में इसे पारित कराया ।
राष्ट्रीय राजनीति ही नहीं, राज्यों की राजनीति पर भी यह मुद्दा कुछ ही हद तक असरंदाज होता दिख रहा है। अच्छा होता कि इन ब्योरों के साथ जातियों की आर्थिक स्थिति का भी ब्योरा दिया जाता। इससे न सिर्फ उन जातियों की माली हैसियत पता चलती, बल्कि जन हितकारी योजनाओं का लाभ असल जरूरतमंदों तक पहुंचाने की कवायद तेज की जाती रही बात स्थानीय निकायों के चुनावों की, तो उसमें पहले से ही महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल रहा है, दलित और ओबीसी महिलाओं को भी।
आरक्षण फिर मुद्दा बनेगा
आरक्षण अपने देश में कितना बड़ा मसला है, यह कोई छिपा तथ्य नहीं है। महिला आरक्षण पर हो रही बहस में ही जब ओबीसी आरक्षण का मसला उठा, तो भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को बचाव में गिनाने पड़े थे कि उसके कितने सांसद और विधायक ओबीसी हैं। यह बताता है कि भाजपा को कहीं न कहीं डर जरूर है। उसे यह खौफ भी अब सता रहा होगा कि कहीं 2015 की पुनरावृत्ति न हो जाए, जब बिहार विधानसभा चुनावों (vidhansabha election) से ऐन पहले आरएसएस (RSS) प्रमुख मोहन भागवत (Mohan bhagvat) ने पिछड़े व दलितों को मिलने वाले आरक्षण पर पुनर्विचार की मांग कर दी थी, जिसने विपक्षी महागठबंधन को भाजपा के खिलाफ हमलावर होने का मौका दे दिया था। ऐसे में, यह कयास गलत नहीं जान पड़ता इस मुद्दे की धार कमजोर करने के लिए केंद्र सरकार आने वाले दिनों में कुछ विशेष कदम उठा सकती है।
क्रिकेट की भाषा में कहें, तो जातिगत सर्वे द्वारा जारी आंकड़ा एक ऐसी पिच है, जो फिलहाल विपक्षी दलों के हक में दिख रही है, मगर वे उस पर आगे कितनी सधी हुई होगी। निस्संदेह, अब अन्य राज्यों में भी ऐसी गेंदबाजी कर पाते हैं, यह देखने वाली बात गणना की मांग तेज होगी। एक तबका यह भी कह रहा है कि अब राजनीति में सवर्णों का वर्चस्व प्रभावित होगा। मगर यह तब होगा, जब ऐसे आंकड़े जमीन पर इस्तेमाल किए जाएंगे। और, जब यह पूरी कवायद ही चुनावी है, तो फिर यह तर्क गले नहीं उतरता कि इन आंकड़ों का इस्तेमाल सामाजिक विकास में किया जाएगा। साल 2024 के चुनावों में यह मुद्दा जरूर बनेगा, लेकिन जनता को यह कितना प्रभावित कर सकेगा, इस पर तमाम दलों की नजर बनी रहेगी।

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