Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan

वेन्कूवर Vancouver : वेनकूवर की भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में भी उल्लेखनीय भूमिका है। 1914 में ब्रिटिश उत्पीड़न के विरूद्ध संघर्ष छेड़ने वाले 376 भारतीयों को लेकर होंगकोंग से चला एतिहासिक जहाज कामगाटा मारू वेनकूवर ही आया था। आज भी देनकूवर बन्दरगाह पर कामगाटा मारू की स्मारक पट्टिका इस घटना की याद दिलाती है।
कूवर अन्य बालों के अतिरिक्त अपने न्यूड बीचों के लिये भी प्रसिद्ध है। दुनिया भर के कई लोग इन बीचों पर अपनी जन्मावस्था में रह कर आनन्द की प्राप्ति करते हैं। कुलवन्त हमें पहले तो अपनी यूनिवर्सिटी ले गया। ब्रिटिश सोलम्बिया वि. वि. का दुनिया के शिक्षा जगत में अच्छा खासा नाम है। वि. वि. कई कि.मी. फैले विशाल परिसर में अवस्थित है। इस परिसर की अधिकांश भूमि एक उद्योगपति द्वारा वि.वि. को दान दी गई है। इस यात्रा में भूमि दान दिये जाने का यह किस्सा मैंने देखा। इसके पहले न्यूयार्क में जब एक स्पेनिश शादी में गया था इ भी ऐसे ही दान के बारे में पता चला था। तब वि.वि. से निकल कर हम समुद्र किनारे आ गये। लम्बी चौड़ी चौपाटी थी। इसी बीच के आगे नग्न बीच है जहां जाने के पहले चेतावनी के कई बोर्ड लगे हैं जिन लोगों को सावधान किया गया है कि आगे नग्न लोगों का सामना हो सकता है।
वेनकूवर में 3 न्यूड बीच हैं मगर यहां का रेक बीच इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध है। रेक बीच लगभग 8 कि.मी. लम्बा है। यह पूरे अमेरिका व कनाडा का सबसे लम्बा प्राकृतिक स्वरूप में रहने का बीच है। इस अकेले बीच के कारण वेनकूबर को प्रति वर्ष 60 मिलियन डालर का राजस्व पर्यटकों से प्राप्त होता है।
बीच यूनिवर्सिटी के एकदम पास है इसलिये छात्रों की भी भारी संख्या में यहां उपस्थिति रहती है। हालांकि बीच पर आने वालों के लिये अपने कपड़े उतारना जरूरी नहीं होता मगर यहां उपस्थित नग्न समुदाय कपड़े पहने लोगों को पसन्द नहीं करता और कई बार इसकी शिकायत भी अधिकारियों से होती है। कई लोग नग्न स्त्रियों को घूरने के लिये ही यहां मंडराते फिरते हैं, एसे लोगों की पहचान तुरन्त हो जाती है और इनकी शिकायत की जाती है। यही कारण है कि नग्न लोग वस्त्रधारियों को पसन्द नहीं करते। यदि सभी निर्वस्त्र होते हैं तो एक दूसरे को इस तरह घूरने के प्रसंग ही उपस्थित नहीं होते। ये बीच उन स्त्रियों के लिये वरदान है। जो सन टेन की शौकीन है मगर अन्य बीचों पर पूरे कपड़े उतार नहीं पाने के कारण उनके शरीर के दोनों हिस्से बदरंग रह जाते हैं। यहां इन दोनों हिस्सों को भी विटामिन डी की भरपूर खुराक मिल जाती है और इनका रंग भी शेष शरीर जैसा ही हो जाता है।
लोग अपने समूचे परिवार के साथ यहां समय व्यतीत करते हैं। स्त्री-पुरूष, , बच्चे सभी निर्वस्त्र हो एक साथ अपनी प्राकृतिक अवस्था में जीने का लेते हैं। यहां किसी भी तरह की फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है मगर मोबाइल के चलन के बाद शरारती लोग अपनी करतूतों से बाज नहीं आते। कई एक्टिविस्ट भी अपने आन्दोलन को गति देने के लिये यहां के वातावरण का लाभ उठाते हैं। एसा ही एक आन्दोलन है निप्पल मुक्ति आन्दोलन। कुछ स्त्रियां अपने वक्षाग्नों को कंचुकियों के बंधन से मुक्त करा पुरूषों की भांति ही खुली छाती रखने की पक्षधर हैं, ये अक्सर यहां प्रचार करती रहती हैं।
इन बीचों पर कई वस्त्रधारी पर्यटकों का कुछ सनकी निर्वस्त्र लोगों से भी सामना हो जाता है जो सबको वस्त्र उतारने के लिये कहते हैं और नहीं उतारने पर लड़ाई करने पर आमादा हो जाते हैं, इसीलिये पर्यटकों को सलाह दी जाती है कि वे बीच पर मौजूद लोगों से सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश नहीं करें।
यही बातें चल रही थी तभी राजा बोल पड़ा, चलो अपन भी इस न्यूड बीच का एक चक्कर लगा लेते हैं। यह कह कर वह मेरी तरफ देख हंसने लगा। मैं एकदम घबड़ा गया, कहीं वाकई यह उस बीच पर नहीं ले चला जाये। कुलवन्त ने मुझसे पूछा- चलना है तो मैंने झट मना कर दिया। मैं तो यह सोच सोच कर ही परेशान हो गया कि कहीं किसी ने जबरन कपड़े उतरवा दिये तो मैंने कहा यह बीच देख लिया इतना ही काफी है, चलो आगे चलते हैं। राजा मुझे चिढाने के लिये बार बार न्यूड बीच पर चलने को कहता रहा, कुलवन्त भी हंस रहा था। अन्ततः हम वापस अपनी कार में बैठे और यहां से निकले।
शीघ्र ही हम उस पहाड़ी बस्ती में पहुँच गये जिसका नजारा उस पार से एक दिन पूर्व देखा था। यहां एक से एक बढ़कर स्थापत्य कला के नमूने नजर आ रहे थे। अनुपम वास्तु से बने ये बंगले वेनकूवर के सबसे मंहगे रिहायशी इलाके के हिस्से थे। यहां की उतार-चढ़ाव भरी सड़कें, दूर दिखाई देता समुद्र का किनारा तथा बेनकूटर की नम रेखा सब मिलकर अत्यन्त उत्कृष्ट दृश्य का सृजन कर रहे थे। पहाड़ियों से उतर कर हम समुद्र तट पर पहुँच गये। यहां बीच न होकर उद्यान बना हुआ था। जगह जगह बेन्वें लगी हुई थी जिन पर बैठकर लोग समुद्र का आनन्द ले रहे थे। चूंकि यह प्रशान्त महासागर का मुख भी था इसलिये कई जहाज भी आते जाते नजर आ रहे थे।
शाम घिर आई थी, ठंड बहुत अधिक थी, ऐसे में ज्यादा देर खुले में रहना संभव नहीं हो पा रहा था। मैं तो गाड़ी में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद ये दोनों भी टहल कर गाड़ी में आ गये। अगले दिन जल्दी ही हमें विसलर के लिये निकलना था इसलिये जल्दी ही घर लौटने की सोची।
बेनकूवर स्वामी विवेकानन्द की विश्व प्रसिद्ध शिकागो स्पीच के सिलसिले में ना जाता है। स्वामी जी 1893 में भारत से चीन व जापान गये थे। वहां से वे राम काका कनाडा आये और बेनकूटर में उतरे । वेनकूवर से ही वे ट्रेन लेकर गये थे और वहां विश्व धर्म सम्मेलन में अपने भाषण से इतिहास रचा था।
घर पहुँचे पहुँचे जितने अंधेरा हो गया था। रास्ते में एक मिठाई की दुकान पर कर कुलवन्त न कुछ मिठाई बंधवा ली थी। मैं मना ही करता रहा मगर वो नहीं 1. उसने कहा गर्मा-गर्म इमरती है, घर चलते ही खा लेंगे तो इनका मजा उठा सकेंगे।
घर पर जितेंन्दर ने खाने की तैयारी पूरी कर रखी थी। कुलवन्त ने प्लेटों का श्री इन्तजार नहीं किया और एक गर्म इमरती मेरे हाथों में रखने लगा। मैंने मना किया मगर वो नहीं माना, बोला आधी तो ले लो तो मैंने आधी तोड़ कर ले ली। ज्यू ही इमरती मुँह में डाली बरसों पूर्व बचपन की कभी खाई इमरती का स्वाद याद आ गया, वैसी ही करारी और लजीज । जब भी मैं इमरती खाता सदैव एसे ही स्वाद की तलाश में रहता जो कभी नहीं मिला, आज कनाडा में वही स्वाद पाकर आनन्द आ गया। मैंने इमरती की प्रशंसा करते हुए बाकी की आधी इमरती भी खा ली। कुलवन्त इमरती के साथ कुछ लड्डू-पेड़े भी लाया था, उनको देख जी तो बहुत ललचा मगर मैंने स्वयं पर नियन्त्रण रखा।
मेरे लिये यह बहुत प्रसन्नता की बात थी कि भारत में लुप्त होता हमारा खान- पान, रहन-सहन, संस्कृति पर्व परम्पराएं सुंदर देशों में बसे भारतीय - आप्रवासियों ने संरक्षित कर रखी हैं। जितेन्दर ने राजमा, चावल, गोभी की सब्जी के साथ गर्म गर्म फूले-फूले फुलकों से हमें तृप्त कराया। एकदम एसा लग रहा था जैसे हम अपने ही घर में हों। दो दिन में ही दोनों पति-पत्नी ने एसा अपनापन दिया जिसे मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा।
Editorial

Editorial

Next Story