war global economy impact
आलोक जोशी: इंदौरी का यह शेर आम तौर पर राहत दंगे-फसाद के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दो देशों के बीच की लड़ाई या उससे बड़े पैमाने पर फैलने वाले युद्ध के साथ भी यही किस्सा जुड़ा है। कोरोना के बाद रूस- यूक्रेन की लड़ाई और अब इजरायल-हमास युद्ध ने पूरी दुनिया के माथे पर चिंता की लकीरें शायद इसीलिए खींच दी हैं। एक तरफ तो यह आशंका लगातार बनी हुई है कि यह लड़ाई और भड़की तो कहां-कहां फैल सकती है, किस- किस देश पर और किस-किस कारोबार पर कितना असर डाल सकती है। और दूसरी तरफ यह भी कि अगर लड़ाई न फैली, तो यह आग कब बुझेगी और तब तक कितना नुकसान हो चुका होगा? इसी डर का साया पूरी दुनिया के शेयर बाजारों पर पूरे हफ्ते छाया रहा। भारत में ही शेयरों की कुल कीमत या मार्केट कैपिटलाइजेशन में करीब 18 लाख करोड़ रूपये की गिरावट आई। इसके पीछे सिर्फ इजरायल - हमास युद्ध नहीं, उसकी वजह से कच्चे तेल का बाजार बिगड़ने का डर और अमेरिका में ब्याज दरों के नई ऊंचाई पर पहुंचने से पैदा हुई चिंता भी शामिल है। यूरोप व अमेरिका में मंदी का डर बना हुआ है।
अमेरिका (America) में ब्याज दरें बढ़ने का असर यह हुआ है कि वहां इस वक्त सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाने पर सालाना पांच फीसदी ब्याज मिल सकता है। भारत में यह रकम हल्की लगेगी, लेकिन अमेरिका और यूरोप के पैमानों पर यह बहुत ऊंची ब्याज दर है। 2007 के बाद से पहली बार अमेरिका में ब्याज दर यहां पहुंची है। इसका असर यह होता है कि दुनिया भर में पैसा लगाने वाले बड़े निवेशक सोचते हैं कि यहां बिना किसी जोखिम के पांच फीसदी की कमाई हो रही है, ऊपर से यह कमाई भी डॉलर में ही होनी है। जबकि दूसरी तरफ, भारत, चीन या किसी दूसरे विकासशील देश के शेयर बाजार में जो पैसा लगाया जाएगा, वहां जितना मौका है उतना जोखिम भी है, साथ ही उन देशों की मुद्रा के उतार-चढ़ाव से नुकसान का खतरा भी बना रहता है। यही वजह है कि अगस्त और सितंबर में विदेशी निवेशक भारत से 20 से 25 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की रकम निकाल चुके थे। अक्तूबर में भी यह आंकड़ा 25 हजार करोड़ के ऊपर जा चुका है।
मगर इन सारी चिंताओं के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा, घरेलू निवेशकों की जेब से म्यूचुअल फंडों (Mutual Funds) और शेयर बाजार (Share Market) में लगातार आ रहा पैसा न सिर्फ शेयर बाजार, बल्कि उद्योग और व्यापार के लिए भी सहारा बना हुआ है। अगस्त के बाद से सिर्फ घरेलू संस्थागत निवेशकों, यानी एलआईसी और म्यूचुअल फंडों ने भारत के बाजार में 65 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की रकम लगाई है। मगर भारत जैसा हाल सबका नहीं है। अमेरिका और यूरोप के अनेक देश इस चुनौती से जूझ रहे हैं कि कैसे मंदी में जाने से बचें, साथ ही महंगाई भी काबू में रख सकें। बरसों से भारत और अन्य विकासशील देशों में महंगाई की दर पश्चिमी दुनिया से काफी ऊपर रही, क्योंकि जब अर्थव्यस्था बढ़ती है, तो महंगाई बढ़ना स्वाभाविक है। मगर यूरोप और अमेरिका में अर्थव्यवस्थाएं उस मुकाम पर हैं, जहां उनके लिए तेज रफ्तार से बढ़ना करीब-करीब नामुमकिन है। यही वजह है कि वहां महंगाई व ऊंची ब्याज दरें बहुत बड़ी मुसीबत बनकर उभरी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इसी साल जर्मनी, जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। दूसरी तरफ यह खबर आ रही है कि लगातार तीसरी तिमाही में जर्मनी की अर्थव्यवस्था में कोई बढ़त नहीं हुई है। अब जीरो ग्रोथ की समस्या से जूझता जर्मनी जापान को पीछे छोड़ने वाला है, यह अनहोनी कैसे? इसका जवाब मुद्रा बाजार में है। जापान की मुद्रा येन कमजोर हो रही है, जिसका असर है कि डॉलर में हिसाब जोड़ने पर जर्मनी की अर्थव्यवस्था अब जापान को पीछे छोड़ रही है। भारत अभी इन दोनों से पीछे है, लेकिन एसएंडपी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक भारत इन दोनों को पीछे छोड़कर चीन और अमेरिका के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि देशों की सूची में ऊपर जाने के बावजूद दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा अभी काफी कम है। अगस्त में आए आंकड़े बताते हैं कि इस साल की पहली छमाही में भारत से कुल निर्यात बढ़कर 800 अरब डॉलर के पार चला गया है, वहीं चीन से 3.60 लाख करोड़ डॉलर का निर्यात हुआ है और वह निर्यातकों की सूची में शीर्ष पर है। कोरोना के बावजूद भारत से निर्यात बढ़ना अच्छी खबर है, पर सर्विसेज के अलावा यहां से निर्यात होने वाली चीजों की लिस्ट में सबसे ऊपर रिफाइंड पेट्रोलियम, हीरे, दवाएं, ज्यूलरी व चावल शामिल हैं।
दुनिया में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले देश हथियारों और लड़ाई के साज-सामान बेचकर मोटी रकम कमाते हैं। इस सूची में भारत जगह बनाने की कोशिश तो कर रहा है, मगर अभी वह शीर्ष के 25 देशों में भी शामिल नहीं है। करीब 50 निजी कंपनियां हैं, जो रक्षा सामग्री निर्यात कर रही हैं। आकाश मिसाइल, ब्रह्मोस, पिनाका, डॉर्नियर और कई तरह के उपकरणों व वाहनों के लिए दुनिया में मांग है और पिछले सात-आठ साल में देश से रक्षा निर्यात करीब दस गुना बढ़कर 16 हजार करोड़ रूपये पर पहुंच चुका है, लेकिन अब भी भारत हथियारों के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल है और बेचने वालों की सूची में ऊपर हैं- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जर्मनी। जाहिर है, दुनिया के किसी कोने में भी लड़ाई होने की खबर इन देशों के लिए खुशखबरी की तरह नहीं, तो कम-से-कम अर्थव्यवस्था के लिए राहत की तरह जरूर आती है।
दुनिया भर में रक्षा पर खर्च 2,240 अरब डॉलर पर पहुंच चुका है। इसका बड़ा हिस्सा हथियारों के कारोबार में ही जाता है। मगर जहां कुछ समय पहले तक हथियार बेचने वाले देशों के लिए यह ऐसा कारोबार था, जहां वेश्च भुस में आग लगाकर दूर खड़ी जमालो की तरह मुनाफा गिनते रह सकते थे, अब यह काफी मुश्किल होता जा रहा है। खासकर मंदी से जूझती दुनिया के लिए किसी भी कोने में ऐसी लड़ाई महंगी पड़ रही है। शायद इसीलिए अब यह सवाल वापस उन देशों की सरकारों को घेर रहा है कि हथियारों की अंधी होड़ का उनकी अपनी जनता के लिए क्या हासिल रहा?
Editorial

Editorial

Next Story