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अलास्का जहाज यात्रा 27 : आव्रजन अधिकारियों के समन से टेन्शन हो गया
By EditorialPublished on
जहाज के रवाना होते होते मानों ग्लेशियर ने सबको अलविदा कहा। यात्री उस हिस्से को देखते रहे जहां चट्टान गिरी थी। जहाज आगे बढ़ता रहा, लेशियर पीछे छूटता रहा, रह रह कर पार्श्व में आवाजें आती रही। सब लोग वापस अपने अपने स्थानों पर यूं लौटे जैसे कोई बहुत बढ़िया फिल्म देखकर सिनेमा हाल से बाहर निकलता है और फिल्म की तारीफ करते नहीं अघाता।

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जहाज के रवाना होते होते मानों ग्लेशियर ने सबको अलविदा कहा। यात्री उस हिस्से को देखते रहे जहां चट्टान गिरी थी। जहाज आगे बढ़ता रहा, लेशियर पीछे छूटता रहा, रह रह कर पार्श्व में आवाजें आती रही। सब लोग वापस अपने अपने स्थानों पर यूं लौटे जैसे कोई बहुत बढ़िया फिल्म देखकर सिनेमा हाल से बाहर निकलता है और फिल्म की तारीफ करते नहीं अघाता।
हम लोग थोड़ी देर के लिये अपने अपने कमरों में लौट गये। कमरा खोला तो सामने बिस्तर पर एक लिफाफा पड़ा था। यह मेरे लिये था, राजा के लिये एसा कोई लिफाफा नहीं देख आशंका हो गई। लिफाफा खोला तो पत्र वाकई सिर्फ मेरे लिये। ही था। अगले दिन शाम को 6 बजे हम लोग कनाडा उतरने वाले थे। पत्र में मुझे इसके दो घन्टे पूर्व जहाज के थियेटर में आने को कहा गया था जहां कनाडा के आव्रजन अधिकारी मुझ से पूछताछ करने वाले थे। मैं डर गया कि कौन सी पूछताछ 20 दिन पूर्व जरूर में कनाडा में था, वहां हमारी गाड़ी का चालान बना था, मगर वो तो राजा के नाम पर था। पूछताछ तो राजा से होनी चाहिये थी। मैंने राजा से पूछा कि चालान का जुर्माना भरा कि नहीं तो उसने कहा कि अभी समय है, तब तक वह भर देगा।
मैंने मुनीश को बुला कर पत्र दिखाया, उसने इसे सामान्य औपचारिकता बताई। मैंने कहा - आप लोगों को तो एसा पत्र नहीं दिया- मुझे ही क्यूं दिया। तब मुनीश ने मेरी आशंकाओं का समाधान करते हुए कहा कि वे सब अमरीकी नागरिक है जो कनाडा में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं जबकि में भारतीय नागरिक हूं, इसीलिये जहाज पर चढ़ते ही मेरा पासपोर्ट भी रख लिया गया था। मुनीश ने बताया कि पूछताछ के पहले मेरा पासपोर्ट भी वापस लौटा दिया जायगा। उसकी बातों से मेरा जी तो हल्का हो गया मगर एक नया टेन्शन घर कर गया जो इस पूछताछ तक जारी रहने वाला था। मन का क्या करें, कितना भी समझाओ मानता ही नहीं वाली हालत मेरी हो गई थी।
थोड़ी देर कमरे में रह कर वापस उपर पहुँच गये। कुछ वक्त डेक पर गुजारा, हवा अब भी तीखी थी, कई लोग कम्बलें ओढे बैठे थे। सभी ग्लेशियर की ही चर्चा कर रहे थे सब इस बात से प्रसन्न थे कि यात्रा के दूसरे दिन जरूर समुद्र ने रौद्र दिखाया था वरना अब तक की यात्रा बहुत अच्छी रही थी। कई क्रूज में तो पूरी यात्रा के दौरान मौसम एसा खराब रहता है कि यात्रियों को अधिकांशतः अपने कमरों में ही दुबक कर रह जाना पड़ता है।
डिनर का टाईम हो रहा था। हमने अपनी टेबल बुक तो नहीं कराई थी, मगर भीड़ भी नहीं थी इस कारण पानी के किनारे की टेबल पर ही हमें स्थान मिल गया। रोज की तरह इन्डोनेशियाई वेटरों का तालीयां बजाने का कार्यक्रम शुरू हो गया। हर दिन किसी न किसी की बर्थ डे होती ही है, जहाज प्रबन्धन द्वारा इन्हें उसकी सूचना मिल जाती है। यात्री जब डाइनिंग हाल में खाने को आते हैं तो मेट्रे डे उन्हें टेबल आवंटित करती है, तभी वह चिन्ह लगा देती है कि जिन जिन का बर्थ डे है वे किस किस टेबल पर बैठे हैं।
यह संयोग ही था कि उस दिन मेरा भी जन्मदिन था मगर किसी को पता नहीं था। तारीख के हिसाब से तो मेरी बर्थ डे 5 दिन बाद आने वाली थी, जहाज के रिकार्ड में वही होगा पर तिथि के अनुसार मेरा जन्म दिन ठंडी राखी को आता है। राखी का त्यौहार एक दिन पहले निकल गया था, व्हाट्स अप पर सबके चित्र आ गये थे। मैं प्रयत्नपूर्वक चुप रहा, वरना मेरे मुँह से निकल जाता तो राजा तो तैयार बैठा था ऐसा नाटक अपने टेबल पर करवाने को।
खाना खा कर वापस खुले डेक पर आ गये। प्रीति ने सबको कह दिया था कि यहां पड़ी एक एक कम्बल सबको उठा कर अपने कमरे में लानी है। राजा ने पूछा क्यूं तो उसने बताया कि अगले दिन कनाडा के विक्टोरिया शहर के एक गार्डन में आतिशबाजी का शो है, वहां हर यात्री को बैठने के लिये अपनी अपनी कम्बल या दरी लेकर आना जरूरी था वरना गीली ठंडी घास पर तीन चार घंटे बैठना पड़ेगा।
डेक की अलमारियों में सदैव प्रचुरता से उपलब्ध रहने वाली कम्बलें आज गायब थी। यात्री लोग पहले ही कब्जा कर अपने अपने कमरों में ले जा चुके थे। हमारे हाथ में सिर्फ दो कम्बलें ही आई। दो और कम्बलों का कैसे भी इन्तजाम करना था। डेक पर बैठे कई लोग कम्बल ओढे थे, अब इन्हीं पर निगाहें टिक गई कि जाते वक्त अगर ये कम्बल छोड़ कर जाते हैं तो उनकी कम्बल उठा लेंगे। ओढनी तो थी नहीं बिछानी ही तो थी।
अन्दर कैफेटेरिया में सपर शुरू हो गया था। वेटर अन्दर से भी सामान र परोस रहे थे, हमने चाय, कॉफी, बिस्कुट वगैरा मंगा लिये। राजा सूट्टा लगाने हो गया। ठंड बहुत थी, में दो कम्बलों में से एक ओढ कर बैठ गया। अचानक बचपन की यादें ताजा हो गई, सर्दी के दिनों में रोज रात को इसी तरह व्यस्त हॉस्क ओढ कर पूरा परिवार सिगड़ी को घेर कर बैठ जाता था। कच्चा मकान था, रे का आंगन और उपर केल्हू की छत। इनसे ठंड का अहसास और बढ जाता था। महिने लीलये छोलती रहती और बातें-किस्से चलते रहते। इतने सीमित साधनों में रहकर भी सब खुश थे। न कोई आकांक्षा न किसी से होड़।
कुछ देर बाद एक साथ तीन चार यात्री अपनी अपनी कम्बलें वापस अलमारियों के पास पटक निकल गये। मुनीश ने फुर्ती से इनमें से दो उठाई और समेट कर अपने पास रख ली। हमारा मिशन पूरा हो गया। सुबह जल्दी उठने की आवश्यकता नहीं थी इसलिये जल्दी सोने का भी तनाव नहीं था। प्रीति वैसे भी किसी शो में भाग ले रही थी. इसलिये हम डेक पर ही बैठे रहे।
हमारे टेबल की बगल में लगे टेबल पर एक महिला सिगरेटें फूंके जा रही थी। हम जब जब भी रात को डेक पर आये यह महिला इसी टेबल पर सिगरेट पीती नजर आई। यह चेन स्मोकर थी। दो सिगरेट पीने वालों का अनजाने में ही एक रिश्ता बन जाता है, वही इसके और राजा के साथ हुआ था। एक दिन उसने राजा से लाइटर मांगा था तबसे ही दोनों आपस में बात करने लगे थे। अभी भी राजा उसी के टेबल पर बैठा था। थोड़ी देर बाद वह हमारी टेबल पर लौटा तो मुझे कहा- दादा, आप भी क्यूं नहीं इस यात्रा पर कोई एस्से यानि निबन्ध लिखते। मैंने कहा कि मैं तो रोज लिख रहा हूं और रोज भारत में अखबार में छप रहा है, सोशल मीडिया पर भी आ रहा हैं। रोज आधी रात के बाद जब तू खर्राटे भर रहा होता है तो मैं उठ कर यही काम तो करता हूं।
वो बोला यह तो मुझे पता है, मैं चाहता हूं आप अंग्रेजी में लिखो और - प्रतियोगिता में भाग लो। उसने बताया कि जहाज वाले यात्रियों से अपने अनुभवों पर निबन्ध आमंत्रित करते हैं तथा विजयी प्रविष्ठियों को निशुल्क क्रूज की यात्रा कराते हैं। पास के टेबल पर बैठी महिला ने उसे इसकी जानकारी दी थी। वह एक महिला को जानती थी जिसने इसी कम्पनी के क्रूज के संस्मरण लिख निशुल्क यात्रा का ईनाम जीता था।
मैंने उससे कहा कि मैं तो जहां कहीं जाता हूँ, वहां के संस्मरण लिखता ही हूँ, इस यात्रा का भी जितना विषद विवरण मैंने लिखा है शायद ही किसी ने लिखा हो मगर मेरी पुरस्कार की कोई अभिलाषा नहीं। हो भी तो अंग्रेजी में लिखने का झंझट कौन मोल ले। अभी भी रोज का लेख लिख कर जब तक मेल नहीं कर देता तब तक टेन्शन रहता है। एक नया टेन्शन और क्यूं मोल लूं।

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