Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
वेन्कूवर Vancouver : घर पहुँचे तो जितेन्दर कब से इन्तजार कर रही थी। जल्द ही उसने मक्की की रोटियां सेक दीं। अपने परिवेश से इतनी दूर अपने घर जैसे खाने का स्वाद पा मैं गदगद हो गया। जीतेन्दर को लगा में औपचारिकतावश उसकी प्रशंसा कर रहा हूँ।) अगले दिन 22 ता. हो गई। सोमवार था मगर कुलवन्त ने हमारे लिये यूनिवर्सिटी से दो दिन की छुट्टी ले ली थी। भारत में ही कोई ऐसा नहीं करता तो कनाडा में एसा देख हम कुलवन्त के प्रति नतमस्तक थे। सुबह आरामी से उठे मगर कुलवन्त व जितेन्दर दोनों का कहीं पता नहीं था। कुलवन्त को साइकलिंग का शौक था, मैंने सोचा जरूर साइकलिंग करने गया होगा। हम यह सोच ही रहे थे कि दोनों पति-पत्नी हड़बड़ाते हुए आए। जितेन्दर हमें देखते ही बोली - आप लोग उठ गये क्या, मैं जल्दी से चाय नाश्ता बना देती हूं।
दरअसल दोनों अपने किसी रिश्तेदार के निधन पर आयोजित अरदास में गये थे। हमारे खातिर जल्दी वापस लौट आये वेनकूवर में सिख समुदाय भारी संख्या में बसा हुआ है। भारत के बाहर स्थित सिख समुदाय की दो सबसे बड़ी आबादीयों में बेनकूपर एक है। दूसरी टोरेन्टो है बेनकूटर में ईसाई धर्मावलम्बियों के बाद दूसरा बड़ा धार्मिक सम्प्रदाय सिखों का ही है। पूरे कनाडा में आज डेढ़ प्र.श. आबादी सिर्फ सिखों की है। कनाडा में भारतीय उपमहाद्वीप के प्रवासियों के आगमन का पथ सिख आप्रवासियों ने ही प्रशस्त किया था।
कनाडा में बसे भारतीय अप्रवासियों में भारी संख्या उन लोगों की भी है जो अफ्रीका के ग्रेट लेक्स देशों में फैली अशांति के कारण अपने बसे बसाए घर बार द जमे जमाए काम धन्धे छोड़ छोड़ कर युगाण्डा, केन्या, तंजानिया तथा द. अफ्रीकी देशों जाम्बीया, मलाबी व द. अफ्रीका से आकर यहां बसे।
नहा-धो कर तैयार हो गये तो कुलवन्त ने कहा कि आज वो हमें सरी ले जायगा जो एक तरह से मिनी पंजाब या लघु भारत है। अमेरिका से कनाडा में प्रवेश करते वक्त सरी की एक झलक तो देख ली थी, सरी में वह हमें दाल बाटी खिलाने वाला था।
सरी जिसे हम सरे भी कहते हैं एक तरह का तांगा या बच्ची होती है। इंगलेण्ड केसरी के नाम पर ही इस शहर का नाम रखा गया। क्रिकेट की दुनिया में तो सरी बहुत प्रसिद्ध है। ओवल का एतिहासिक मैदान सरी में ही है। कनाडा का सरी, वेनकूवर से सटा हुआ ही है, यह ग्रेटर वेनकूवर का एक भाग है। कुलवन्त हमें आसपास के इलाकों में घुमाता हुआ पहले तो सीमा तक ले गया, यहां किसी तरह की रोक टोक नहीं थी, इसके पश्चात ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित विशाल खेतों के दर्शन यहाँ खेती औद्योगिक स्तर पर की जा रही थी। खेतों से पैदावार निकलते ही, काटछाट सज संवार कर सीधे पेकिंग कर बाहर भेजी जा रही थी।
थोड़ी ही देर में हम सरी की सड़कों पर थे। जगह जगह बड़े साईन बोर्ड लगे थे। जिनमें दूर से ही किसी भारतीय का चेहरा आसानी से पहचाना जा सकता था। मैंने यही अन्दाजा लगाया कि जरूर किसी भारतीय समुदाय के चुनाव होने वाले है, जिसके प्रत्याशियों ने अपने बोर्ड लगा रखे है, मगर ये बोर्ड किसी चुनाव के नहीं थे न ये लोग जमीनों के धन्धे करने वाले रियल स्टेट एजेन्ट थे। इनके पास ढेर सारे प्लाट, फ्लेट वगैरह थे सरी में भारतीयों की प्रचुरता के साथ रियल स्टेट की कीमत भी बहुत बढ़ गई है। यहां यह आम धारणा बनती जा रही है कि जहां जहां भारतीय जाते हैं वहां की जमीनें महंगी हो जाती है। हर भारतीय थोड़े से संघर्ष के बाद कुछ कमा लेता है तो सबसे पहले अपनी जगह चाहता है जबकि अन्य राष्ट्रकों की एसी मनोवृति नहीं दिखाई देती।
सरी की सड़कों पर घूमते हुए एसा आभास हो रहा था जैसे पंजाब के किसी अत्याधुनिक शहर में हों। जगह जगह भारतीय दुकानें, शो रूम, रेस्टोरेन्ट अंग्रेजी के साथ साथ गुरूमुखी में लिखे साईन बोर्ड यही अनुभूति दे रहे थे। सड़कों पर वाहनों में भारतीय पहनावे में सजी धजी स्त्रियां देख मन प्रसन्न हो रहा था। यहां पानी पतासों, कचौरी समोसों से लेकर हर तरह के उत्तर भारतीय व्यंजन जगह जगह प्रचारित थे। दक्षिण भारतीय रेस्टोरेन्टों की भरमार तो हर जगह दिखाई देती ही है। मिठाई की दुकानों के शो केस, भारतीय मसालों, साड़ियों, आभूषणों, चूड़ियों, जूतियों, हेण्डीक्राफ्ट वगैरह की दुकानें हर जगह नजर आ रही थी।
हमारे लिये यह तय करना मुश्किल हो रहा था कि चाट खाएं या अन्य कुछ। यहीं एक जयपुर रेस्टोरेन्ट भी था जहां राजस्थानी भोजन मिलता था। कुलवन्त की इच्छा थी कि हम सब राजस्थान के ही हैं तो क्यूं नहीं यहीं चल कर दाल बाटी खाई जाये। रेस्टोरेन्ट के बाहर एकदम राजस्थान जैसा वातावरण बनाया गया था। विभिन्न चित्रों से राजस्थान की एतिहासिकता दर्शाई गई थी। रेस्टोरेन्ट एक सिख परिवार द्वारा चलाया जा रहा था। परिवार की ही युवतियां व युवक राजस्थानी वस्त्र पहन परोसकारी कर रहे थे। आपस में ये पंजाबी में बात कर रहे थे। अभी खाने का समय नहीं हुआ था, हम जल्दी पहुँच गये थे इसलिये दाल बाटी तो तैयार नहीं थी। जितेन्दर ने घर से पहले ही भारी नाश्ता करवा कर रवाना किया था इसलिये ज्यादा भूख भी नहीं थी मगर राजा ने अनाप शनाप आर्डर दे दिया। इतना कोई खा नहीं सका तो बचा हुआ खाद्य पैक करवा लिया। यहां भी पेक करने का चलन है यह जानकर अचरज हुआ।
सरी का पंजाबी मार्केट जिसे लिटिल इण्डिया भी कहते हैं, समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के आप्रवासियों के लिये खरीददारी का केन्द्र है। कनाडा में दूर दूर स्थित आप्रवासी यहां भारतीय उत्पादों की तलाश में आते हैं। बैसाखी पर यह विशाल परेड का आयोजन होता है। इस परेड को देखने और इसमें भाग लेने 3 लाख लोग एकत्रित होते हैं। परेड गुरूद्वारा धर्मेश दरबार से रवाना होकर शहर के प्रमुख बाजारों से गुजरती है। परेड में तरह तरह की झांकियां, कीर्तन, संगीत के अलावा लंगर का आयोजन होता है। स्थानीय नागरिक तथा व्यवसाई अत्यन्त श्रद्धाभाव से खुद के हाथों से लंगर का प्रसाद बनाते हैं।
कुलवन्त अत्यन्त मनोयोग से सरी की सड़कों पर घुमाता रहा और इसके बारे में बताता रहा। जब देख देख कर थक गये तो वापस घर लौटने की सोची। घर पहुँचे तो गरमा गरम समोसे हमारा इन्तजार कर रहे थे जितेन्द्र ने अपने साथ लाई बचे हुए खाने की थैली जितेन्दर को दी। राजा का पूरा नाम डा. जितेन्द्र सिंह सोढी ही है। समोसे अच्छे थे, जितेन्दर हमारे सामने ही तलते हुए पाया उतार रही थी इसलिये यह सोचने का सवाल ही नहीं था कि बाजार से मंगाए होंगे कुलवन्त ने रस्ते से ही फोन कर दिया था इसलिये उसने तैयारी कर ली थी। पेट भरा हुआ था मगर समोसे इतने लजीज थे कि एक के बाद एक खाते ही गये।
थोड़ी देर सुस्ता लिये, पुरानी बातें करते रहे। कुलवन्त खोद खोद कर उदयपुर और उस वक्त के लोगों के बारे में पूछता रहा, वो आजकल कहां है, यहां अब क्या है वगैरा वगैरा। एसे ही वक्त गुजर गया, शाम होने आई तो वापस कुलवन्त हमें लेकर निकल पड़ा। आज समुद्र के उस पार ले जाने वाला था जहां का नजारा एक दिन पूर्व इस पार से देखा था।
Editorial

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