Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
वेन्कूवर Vancouver : वेनकूवर एक तरफ समुद्र किनारे तो एक तरफ झीलों से सटा, पहाड़ियों पर स्थित शहर है, इसके ऊंचे नीचे रास्तों पर चढ़ते उतरते सेन फ्रेन्सिस्को का स्मरण हो आता है। कुलवन्त हमें शहर के दर्शन कराते हुए अब उस हिस्से में ले आया जो बेनकूवर के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है। यह है शहर का डाउन टाउन ईस्ट साईड इसी इलाके की खातिर बेनकूवर समूचे नोर्थ अमेरिका का ड्रग सेन्ट्रल कहा जाता है। ज्यूं ही हम इस क्षेत्र में प्रविष्ठ हुए अचानक ही दृश्य बदल गया। साफ सुथरी फुटपाथों, चमकती दुकानों और नागरिकों की उल्लासपूर्ण चहल पहल की जगह गन्दे फुटपाथों, पुरानी झर्झर दुकानों और जगह जगह नशे में पड़े नागरिकों ने ले ली। इन्हें देखकर अचानक हमारे गरदुल्ले याद आ गये। वे भी जगह जगह इसी तरह पड़े रहते हैं। इतने नहीं इक्के दुक्के हम लोग ज्यू ज्यूं आगे बढते रहे, एसा लगने लगा जैसे शहर के हमें आ गए हो, सड़क की दोनों तरफ गरदुल्लों की संख्या बढती ही जा रही थी, बदहाल हालत में, सिएटल में जो लोग देखे थे वे तो बेघर थे, भूखे थे मगर ये (कदम भिन्न थे, हालांकि लग एकदम उनके जैसे ही रहे थे। आश्चर्य इस बात का कि इनमें युवतियों की संख्या भी कम नहीं थी। यहां ड्रग्स बेचने वाले, खरीदने वेश्याएं, देश्याओं के दलालों, सब का जमावड़ा था। मजे की बात यह है कि अपने समलैंगिक इलाके के साथ साथ इस ड्रग सेन्ट्रल इलाके के लिये वेनकूवर इतना मशहूर हो गया कि शहर की सुन्दरता की खातिर यहां आने वाला हर पर्यटक इलाकों के भी दर्शन करके ही जाता है। नकूर के ये अभिशाप ही इसके लिये वरदान बन गये। कुलवन्त भी हमें यहां लेकर आया हो।
बेनकूवर का यह इलाका क्रेक कोकीन जैसे अत्यन्त तेज नशीले द्रव्य के लिये मशहूर है। इसके अलावा हेरोईन के विभिन्न प्रकार यहां उपलब्ध हैं, अधिकांशतः ये इन्जेक्शन द्वारा शरीर में लिये जाते हैं जिसका प्रभाव तुरन्त होता है। मदिरा सेवन तो आम बात है ही। सजी धजी लड़कियां खुले आम अपने शरीर सौदा करती हुई दिख जाती है। शहर में हजार के करीब एसी यौनकर्मी हैं जो 5 से 20 डालर के बीच तैयार हो जाती हैं। इनमें आधी तो अपनी ड्रम्स की जरूरतें पूरी करने के लिये इस पेशे में उतरने को मजबूर हुई हैं। कईयों के साथ बचपन में तो कईयों के साथ काम के दौरान यौनाचार हुआ है। एक बार दाग लग जाने के बाद इन्हें कोई काम भी नहीं देता, कोई ठौर नहीं मिलता तब यही रास्ता बचता है।
ईस्ट साईड का इलाका काफी लम्बा था, इसे पार करते ही शहर की उचल तस्वीर सामने आ गई। तस्वीर के दूसरे पहलू का दर्शन करते हुए हम अत्यन्त आधुनिक और अति सुन्दर इलाके में आ गए। एक से आलीशान एक इमारतें, चमचमाते रेस्टोरेन्ट, समुद्र किनारा, समुद्र पर बना सेतु सब किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाले कुलवन्त ने एक जगह गाड़ी पार्क कर दी और हम पैदल ही इस इलाके में घूमने लगे। घूमते घूमते एक जगह आकर रूक गये। यहां से समुद्र पर बने सेतु का अनुपम दृश्य दिखाई दे रहा था। रेलींग के सहारे खड़े होकर काफी देर तक इसे निहारते रहे।
घर से निकले काफी देर हो चुकी थी। भूख भी लग आई थी, पास ही एक बहुत प्रसिद्ध रेस्टोरेन्ट था। हम हार्बर इलाके में थे। रेस्टोरेन्ट बहुत उपर था जहां से समुद्र का नजारा बहुत अच्छा दिखाई देता है। यही कारण है कि रेस्टोरेन्ट में जगह नहीं मिल पाती। अभी डिनर का वक्त नहीं हुआ था इस कारण जगह मिल जायगी यह सोचकर हम आगे बढे भवन बहुत बड़ा था, यहां एक होटल, कई ऑफिस, शो रूम तथा अन्य गतिविधियां भी थीं। हम लिफ्ट लेकर उपर पहुंचे। रेस्टोरेन्ट में जाने के लिये अलग से एस्केलेटर बने हुए थे, इन पर खड़े होकर हम उपर पहुंचे तो सामने जो दृश्य दिखाई दिया उसे देखते ही रह गये, एसे मंत्र मुग्ध हो गये कि आगे बढ़ना ही भूल गये।
मेट्रे डे ने हमें वहां एक तरफ लगे सोफों पर बिठा दिया। एक वेट्रेस आकर टेबल के बारे में पूछताछ करने लगीं। हमने समुद्र किनारे वाला टेबल चुना। हेप्पी आवर्स का समय था जिसका दोनों ने भरपूर लाभ उठाया, मेरे लिये सेण्डविच, बिस्किट वगैरा आ गये। सामने समुद्र था, बीच में कांच की खिड़की और इधर हम। यही लग रहा था जैसे अभी भी जहाज में बैठकर समुद्र का नजारा देख रहे हों। देखते ही देखते एसे लगने लगा जैसे हमारा जहाज चल रहा हो, मुझे यकीन नहीं हुआ तो यह बात राजा को बताई, उसने हंसते हुए मेरी मजाक उड़ाई और कहा- दादा ! हम नहीं चल रहे हैं, सामने वाला जहाज चल रहा है जिससे आपको एसा लग रहा है। वाकई समुद्र में एक जहाज चल रहा था, उसे देखते देखते ही मुझे एसा लगने लगा जैसे हम चल रहे हों।
हम प्रशान्त महासागर के छोर पर बैठे थे, एक तरफ झील थी, एक तरफ समुद्र, झील कब समुद्र में विलीन हो जाती थी पता ही नहीं चलता था, उस पार पहाड़ियां थी। किसी भी प्राकृतिक दृश्य की सुन्दरता में पहाड़ियां जिस तरह चार चांद लगा देती हैं, यहां ठीक इसके विपरीत हो रहा था। ये पहाड़ियां इतने सुन्दर दृश्य का मजा किरकिरा किये जा रही थी, एसा लग रहा था जैसे पहाड़ियों को माताजी निकल आई हैं। चेचक के दागनुमा ये पहाड़ियां समूचे प्राकृतिक दृश्य में पेबन्द की तरह नजर आ रही थी। कुलवन्त से इस बारे में मैंने पूछा तो उसने बताया कि पहाड़ियों पर लोगों के घर बने हुए हैं, यह शहर का सबसे मंहगा इलाका है। पहाड़ियों पर जितना ऊंचा जिसका घर है उतनी ही अधिक उसकी कीमत है, समुद्र का नजारा भी उस घर से सबसे अच्छा नजर आता है। यह सुनते ही अचानक एक सिहरन सी मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई, यकायक मेरे दृश्य पटल पर उदयपुर की झीलें और उसकी सुन्दर पहाड़ियों का दृश्य कौंध गया। मैं सोचने लगा 25-50 साल बाद कहीं हमारी झीलों की पहाड़ियां भी एसी चेचक से ग्रसित तो नहीं हो जायगी।
समुद्र के बीच में एक पेट्रोल पम्प देख कर हैरत में रह गया। छोटे छोटे जहाज, योट, स्टीमर यहां पेट्रोल भरा रहे थे। यह एक और अजूबा हो गया। आज एक पानी में पेट्रोल पम्प नहीं देखा था। थोड़ी ही देर में सांझ घिर आई सामने आने वाली पहाड़ियों पर दीप टिमटिमाने लगे। ज्यू ज्यू अंधेरा बढ़ता गया इन टिमाते दीपों ने जगमग रोशनी का रूप ले लिया। अभी थोड़ी ही देर पूर्व तक जो या पेबन्द बन कर प्राकृतिक दृश्य को नष्ट किये दे रही थी वे ही अब उस दृश्य सुन्दरता अभिवृद्धि करने लगी। पहाड़ियों पर स्थित मकानों की लाइटों से में पहाड़ी ऐसे नजर आने लगी जैसे तारों की बारात निकल पड़ी हो। एक छोटे से परस्परविरोधी एसी अनुभूति अभूतपूर्व थी।
रेस्टोरेन्ट में काफी समय व्यतीत हो गया फिर भी यहां से उठने का मन नहीं रहा था। कुलवन्त हमें समुद्र के उस पार ले जाना चाह रहा था जहा का दृश्य हम अभिभूत हो रहे थे। आज तो वक्त ज्यादा हो गया था, जितेन्दर हमारी प्रतीक्षा कर रही थी, बार बार उसके फोन आ रहे थे, वह कह रही थी कि मक्की की रोटी हमारे आने के बाद ही बनायेगी ताकि गर्म गर्म खा सके। अन्ततः हम यहां से वापसी में उसी रास्ते से लौटे। ईस्ट साईड में सड़क पर नशेड़ियों की संख्या और बढ़ गई एसा प्रतीत होता था। एक जगह काफी भीड़ जमा थी, कुलवन्त को डर था कि कहीं कोई झगड़ा न हो गया हो क्यूंकि यहां आये दिन लूट पाट, हत्या जैसी वारदातें होना आम बात थी। कुलवन्त अब जल्दी से इस इलाके से निकल जाना चाहता था, तभी भीड़ का एक हिस्सा सड़क पर भी आ गया जिससे रास्ता अवरुद्ध हो गया। सड़क की दूसरी तरफ एक युवती अपने बाजू में इंजेक्शन इंसती नजर आई। इन्सुलीन का तो होना संभव नहीं था जरूर किसी नशीले पदार्थ का ही होगा। जैसे तैसे यहां से निकल कर आगे बढ़े।
लौटते समय भारतीय बाजार और चायना टाउन के बाजार विद्युत रोशनी से नहा उठे थे। एक दिन पहले विक्टोरिया में भी हर जगह रोशनी नजर आई थी, यही बात यहां भी नजर आ रही थी। बिजली के अपव्यय नाम की कोई चीज यहां नहीं थी वरन बिजली का उपयोग हो रहा था और यह शहर की सुन्दरता में अभिवृद्धि कर रहा था जिससे अधिकाधिक पर्यटक आकर्षित हों और राजस्व जुटाएं।
Editorial

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