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वेन्कूवर 04 : वेनकूवर की समलैंगिकों की बस्ती के दर्शन
By EditorialPublished on
वेन्कूवर Vancouver : हमारे आगे कई कारें खड़ी थीं। इमीग्रेशन अधिकारी फटाफट जाने दे रहे थे। मेरे बारे में जरूर कुछ पूछा, एक दिन पूर्व तो हम कनाडा में थे ही, राजा उससे हंसी मजाक करने लगा। ज्यूं ही कनाडा में प्रविष्ठ हुए बायीं तरफ एक बहुत बड़ा शामियाना लगा नजर आया, बाहर कपड़े के बेनर लगे हुए थे, भारत में जिस तरह धार्मिक या सामाजिक आयोजन होते हैं, वैसा ही कोई उत्सव था। यहां लाउड स्पीकर पर भारतीय भजन बज रहे थे जिससे लगा कि जरूर कोई धार्मिक आयोजन होगा, काफी संख्या में सिख परिवार दिखाई दे रहे थे।

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वेन्कूवर Vancouver : हमारे आगे कई कारें खड़ी थीं। इमीग्रेशन अधिकारी फटाफट जाने दे रहे थे। मेरे बारे में जरूर कुछ पूछा, एक दिन पूर्व तो हम कनाडा में थे ही, राजा उससे हंसी मजाक करने लगा। ज्यूं ही कनाडा में प्रविष्ठ हुए बायीं तरफ एक बहुत बड़ा शामियाना लगा नजर आया, बाहर कपड़े के बेनर लगे हुए थे, भारत में जिस तरह धार्मिक या सामाजिक आयोजन होते हैं, वैसा ही कोई उत्सव था। यहां लाउड स्पीकर पर भारतीय भजन बज रहे थे जिससे लगा कि जरूर कोई धार्मिक आयोजन होगा, काफी संख्या में सिख परिवार दिखाई दे रहे थे।
ब्रिटिश कोलम्बिया में सिखों की उपस्थिति प्रभावशाली है, इसकी जानकारी तो थी मगर यहां पांव धरते ही इसके एसे प्रचण्ड प्रमाण मिलेंगे यह सोचा नहीं था। मेरी खुशी का पारावार नहीं था, राजा भी सिख था, इससे यह अनुभूति और गहरी हो जाती थी। कनाडा की वर्तमान टूडो सरकार में आज तीन केबिनेट मंत्री सिख हैं, यह बहुत गर्व की बात है। उज्वल देवसिंह दोसांझ तो ब्रिटिश कोलम्बिया प्रान्त के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। आज भी प्रादेशिक संसद में भारतीयों की अच्छी उपस्थिति है।
शीघ्र ही हम बेनकूवर शहर के नजदीक पहुँच गये। वेनकूबर कनाडा का ऐसा शहर है जिसकी आधी से अधिक आबादी की प्रमुख भाषा अंग्रेजी नहीं है। इनमें पंजाबी भाषी भारतीयों की संख्या बहुत है। मुझे जब पता चला कि पंजाबी ब्रिटिश कोलम्बिया की दूसरी भाषा है तो मेरा सीना तन गया।
जी.पी.एस. के निशान के सहारे आगे बढ़ते रहे तो हम ठीक डा. कुलवन्त सिंह रियार के घर के बाहर पहुँच गये। कुलवन्त उदयपुर में ही पढ़ा हुआ है और राजा का अच्छा दोस्त है। यहां वह यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया में प्रोफेसर है, वह प्रदेश की राज्य स्तरीय यूथ सर्विसेज कमेटी का डायरेक्टर भी है। मकान बहुत बड़ा था, इसीसे इसकी सम्पन्नता का अहसास हो रहा था। राजा ने गाड़ी से निकल कर घंटी बजाई। कुछ ही पलों में एक लम्बे झम्बे सुदर्शन सिख युवक ने द्वार खोला। हमें देखते ही उसने हमारे चरण स्पर्श कर पैरीपन्ना की अपनी आध्यात्मिक जड़ों से इतनी दूर अत्याधुनिकता के परिवेश में पले बढे आज के नौजवान भी ऐसे संस्कारवान और पारम्परिक हो सकते हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने था।
युवक और कोई नहीं, कुलवन्त का पुत्र था जो अगले ही दिन होने वाली किसी परीक्षा की तैयारी कर रहा था, इसी कारण द्वार खोलने में उसे कुछ देर लगी। उसने हमें अन्दर चलने को कहा, हमने कहा कि सामान गाड़ी में है, पहले वह निकाल लेते हैं, वो नहीं माना। उसने कहा सामान आ जायेगा, पहले आप अन्दर चलें अन्दर एक शानदार ड्राईंग रूम में सोफे वगैरा लगे हुए थे, यहां हमें बिठाकर पानी वगैरा का पूछ कर वह अकेला ही एक एक करके हमारा सामान अन्दर ले आया। राजा उसे मना करता रहा, खुद साथ जाने लगा मगर वह नहीं माना।
फुलवन्त कहीं नजर नहीं आ रहा था। उसने बताया कि पापा-मम्मी दोनों विक्टोरिया गये हुए हैं, अभी बस लौटने ही वाले हैं। हमने पूछा- कब गये तो उसने बताया कि कल । हमें आश्चर्य हुआ क्यूंकि कल तो हम भी विक्टोरिया में ही थे, पता होता तो मिलने का कुछ प्रयत्न करते। हम उसकी पढाई, हाल चाल आदि की बात कर ही रहे थे कि कुलवन्त आ गया उसके साथ उसकी पत्नी जितेन्दर भी थी। कुलवन्त को मैं देखते ही पहचान गया, हालांकि 35-40 साल का वक्त हो गया होगा। राजा भी उससे इतने ही अन्तराल से मिल रहा था।
जितेन्दर ने खाने के लिये पूछा तो हमने मना कर दिया, बताया कि किस तरह भूख लग रही थी तो रास्ते में जो भी मिला उसे खा कर पेट भरा राजा व कुलवन्त अपने कालेज के जमाने की बातों में मशगूल हो गये और अपने समकालीन लोगों के बारे में पूछ पूछ कर भोगे हुए अतीत को दुबारा जीते रहे। इस जितेन्दर ने गरमा गरम आलू की टिकियां की प्लेट लाकर हमारे सामने रख हम मना करते रहे कि क्यूं उसने तकलीफ की मगर टिकिया की महक बरबस हमारे हाथ अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी।
टिकिया अत्यन्त स्वादिष्ट थी। इसके साथ इमली तथा धनिये की चटनी का सम्मिश्रण इसके स्वाद में और अभिवृद्धि कर रहा था। पिछले एक महीने से मैं अमेरिका में था, मगर पहली बार एसी वस्तु का रसास्वादन कर रहा था जो नितान्त भारतीय स्वाद से परिपूर्ण थी। प्रशंसा की बात यही थी कि एक कनाडा में ही जन्मी, पली-बढी महिला द्वारा हमारे सामने ही बनाई गई थी। जितेन्दर को बुलाकर यह बात उसे बताई तो उसका एक ही जवाब था, असली तारीफ तो तब मानूंगी जब सामने रखी यह प्लेट चट कर जाओगे, यह कहते ही उसने ताजा तली टिकियाओं की एक प्लेट और हमारे सामने रख दी।
कुलवन्त को साइकलिंग का बहुत शौक था। वह किसी साइकल रेस में भाग लेने ही विक्टोरिया गया था। कुलवन्त का मकान पहाड़ी पर स्थित है, पूरी कोलोनी पहाड़ी पर है, वेनकूयर समुद्र तट पर स्थित है इसलिये ऊंचाई पर स्थित मकानों से समुद्र आसानी से दिखाई दे जाता है। अमरीकी मकानों की तरह ही उसके मकान में भी प्रवेश गेरेज द्वारा ही होता है। हम सामने के द्वार से आये थे मगर उसका उपयोग नगण्य सा होता है।
पीछे की तरफ बेसमेन्ट में गेरज था, एक छोटा मोटा बगीचा था, एक कुत्ता भी पाल रखा था। यहां खड़े होकर आसपास की समूची बस्ती के दर्शन हो जाते थे। पड़ोस में एक चीनी परिवार रहता था। भारतीयों की तरह दीनीयों की भी कनाडा में अच्छी खासी उपस्थिति है। मौसम यहां सर्द ही रहता है। घरों में कहीं ए.सी. नहीं पाये जाते। जरूरत पड़े तो पंखें जरूर रखे जाते हैं। बातों ही बातों में वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा और तीन-चार घंटे कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। इस बीच जीतेन्दर ने शाम के खाने के बारे में पूछा तो मैंने कहा जो आप खिलायेंगी हम खा लेंगे। उसने डरते डरते पूछा कि मक्की की रोटी खाते हैं, मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कानों में मिश्री घोल दी हो, प्रसन्नता से मेरे मुँह से आवाज तक नहीं निकली तो बोल पड़ी - अच्छा आपको पसन्द नहीं तो मैं कुछ और बना लूंगी कह कर जाने लगी। मैंने उसे रोका, फिर बताया कि मक्की की रोटी तो हमारे घर का, वतन का खाना है, यह मिल जाये तो और क्या चाहिये।
कुलवन्त ने कहा कि चलो वेनकूवर की सैर करा लाता हूं। चार गाड़ियां थी, घर में तीन सदस्य थे, तीनों की एक एक गाड़ी तो थी ही, ए अतिरिक्त थी। एक बड़ी सी. एस.यू.वी. में हम सब निकल पड़े। कुलवन्त के घर दोनों तरफ सड़कें थी। बिजली के खंभे भी पीछे की सड़क पर ही लगे थे। यहां से निकले तो समीप ही एक झील स्थित थी, इसके किनारे किनारे होते हुए हम मुख्य बाजार में आ गये। बाजार में चीनी दुकानों, रेस्टोरेन्टों की भरमार थी। कुछ देर यह सिलसिला चला मगर शीघ्र ही इनका स्थान भारतीय नामों के साईन बोडों ने लेना शुरू कर दिया। यह पूरा बाजार भारतीय था। मिठाईयों की सजी धजी दुकानें एकदम किसी भारतीय शहर का आभास दिला रही थी।
आगे बढ़े तो कुलवन्त ने बताया कि यह समूचा इलाका गे लोगों का इलाका है। यहां के रेस्टोरेन्ट, क्लबों में एल. एस. बी. टी. से सम्बन्धित लोग भरे पड़े रहते हैं। इस इलाके को गे विलेज या गेबरहूड भी कहते हैं। वैसे इसका नाम डेवी विलेज है। यहां से समलैंगिकों का एक अखबार भी निकलता है क्यूमीनीटी। यहां की दुकानों पर भी इनसे सम्बन्धित वस्तुएं तथा पुस्तकें मिल जाती है। प्रतिवर्ष निकलने वाली समलैंगिकों की परेड भी इसी इलाके से निकाली जाती है। इस दौरान आसपास के इलाके का समूचा ट्राफिक रोक दिया जाता है जिससे इन लोगों के साथ किसी तरह का संघर्ष नहीं हो। इसी तरह हर साल इस बस्ती का एक डेवी डे भी मनाया जाता है। यहां के व्यवसायी व समलैंगिक समुदाय इस दिन लोगों को अपने बारे में अवगत कराने का प्रयास करते हैं।

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