Bihar CM Nitish Kumar
पटना (एजेंसी)। बिहार के सीएम नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के एक बयान ने बिहार की राजनीति में सनसनी फैला दी है। इससे पहले दीनदयाल उपाध्याय की जयंती मना कर भी नीतीश कुमार चर्चा का केंद्र बन गए थे। कई तरह के कयास लगने लगे थे। राजनीतिक विश्लेषक भी नीतीश के इस बदले अंदाज को ठीक से समझ नहीं पा रहे। कुछ इसे नीतीश कुमार की राजद पर प्रेशर बनाने की पॉलिटिक्स मान रहे तो अधिकतर इसे नीतीश के पिछले तरीके के रूप में देख रहे। हालांकि नीतीश के भाजपा प्रेम पर अब उनके सिपहसालार तर्क गढ़ने लगे हैं। केसी त्यागी कहते हैं कि नीतीश के संबंध हर दल के नेताओं से अच्छे हैं। अशोक चौधरी कह रहे कि संबंधों के निर्वाह के कारण ही नीतीश ने भाजपा के पांच नेताओं को अभी तक मंत्रियों को बंगले में रहने दिया है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह भी नीतीश में रिश्ते निभाने के इस अच्छे गुण के रूप में देखते हैं।
क्या है नीतीश कुमार की प्रेशर पॉलिटिक्स
नीतीश कुमार को महागठबंधन में कम से कम लोकसभा की 16 सीटें सीटें चाहिए। राजद उनसे एक कदम आगे बढ़ कर 20 सीटों की मांग कर रही है। दोनों की अपनी-अपनी दलीलें हैं। राजद का कहना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में 19 सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे। इसलिए बदले राजनीतिक हालात में वह उन सीटों पर अपना झंडा गाड़ सकता है। इसलिए राजद अपने लिए 20 सीटों की मांग कर रहा है। नीतीश कुमार को यह भय है कि राजद उन्हें 16 सीटें देने को तैयार नहीं होगा। उनका भय इसलिए भी है कि सीटों के बंटवारे में कांग्रेस और वाम दलों का क्या होगा, जब कांग्रेस को कम से कम 10 और वाम दलों में अकेले सीपीआई (एमएल) को 5 सीटें चाहिए। सीपीआई की भी बिहार में पुख्ता जमीन रही है। इसलिए उसे भी सीटें चाहिए होंगी। बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं। अगर सबकी डिमांड पूरी की जाए तो 50 सीटों की जरूरत पड़ेगी। यही वजह है कि नीतीश कुमार तरह-तरह के नखड़े कर रहे हैं।
प्रेशर पॉलिटिक्स के माहिर खिलाड़ी नीतीश
नीतीश कुमार पहली बार किसी गठबंधन में नहीं हैं, बल्कि आरंभ से अब तक उनकी राजनीति गठबंधन की ही रही है। भाजपा के साथ उन्होंने लंबी पारी खेली है तो महागठबंधन के साथ भी उनकी यह दूसरी पारी है। भाजपा के साथ रहते नीतीश ने पिछली बार उसके बराबर लोकसभा सीटें हथिया ली थीं। भाजपा को मजबूर होकर साल 2014 में जीतीं कुल 22 सीटों में 5 सिटिंग सांसदों को चलता करना पड़ा था। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को साल 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 2 सीटें मिली थीं, जबकि 2019 में भाजपा के बराबर 17 सीटें लेकर जदयू ने 16 पर जीत दर्ज कर ली थी।
2019 का फॉर्मूला अपनाना चाहती है राजद
राजद इस बार नीतीश का 2019 का ही फॉर्मूला अपनाना चाहती है। नीतीश ने तब भाजपा को साफ कह दिया था कि 2014 में भले ही उसके 2 सांसद ही जीते थे, लेकिन विधानसभा में उसके सदस्य भाजपा के मुकाबले तकरीबन दोगुना थे राजद का भी इस बार यही तर्क है। राजद का कहना है कि असेंबली में उसके विधायक जदयू से दोगुने हैं, इसलिए वह बराबर सीटों पर लड़ेगा। नीतीश भी इस बात को समझते हैं कि राजद के तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन बिखरते जा रहे अपने नेताओं की मंशा भी नीतीश बेहतर समझ रहे हैं। वे सिटिंग सांसदों का टिकट काट कर अब और खतरा मोल लेना नहीं चाहते।
नीतीश कुमार के सामने अब रास्ता क्या है ?
नीतीश के सामने महागठबंधन के अलावा दूसरा रास्ता भी है। वह है अपने पुराने पार्टनर भाजपा के साथ एनडीए का हिस्सा बन जाना। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल है कि नीतीश को क्या भाजपा पिछली बार जितनी तरजीह दे पाएगी ? अपने इसी दूसरे रास्ते के लिए नीतीश के बोल और अंदाज में बदलाव दिखता है। वे प्र.म. के साथ फोटो खिंचवाते हैं तो दीनदायल उपाध्याय की जयंती मनाते हैं। भाजपा नेताओं के साथ अपने संबंधों की दुहाई भी देते हैं। हालांकि नीतीश दूसरे रास्ते पर जाने के लिए पहले रास्ते की मंजिल का इंतजार करेंगे। वे देखना चाहेंगे कि राजद उनकी पार्टी को कितनी सीटें देता है। अग सिटिंग सांसदों में कटौती की स्थिति आई तो नीतीश झटके में अपनी राह बदल सकते हैं।
Editorial

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