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लोक-लुभावन घोषणाओं की होड़
By EditorialPublished on
संजय गुप्त… पांच राज्यों के चुनावों (Elections) की घोषणा होने के साथ ही लोक-लुभावन (Lok-Lubhaavan) घोषणाओं का सिलसिला कायम हो गया है। तेलंगाना में सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति की ओर से जारी घोषणा पत्र में गरीबों को दो कमरों का घर, चार सौ रूपये में रसोई गैस सिलेंडर देने और किसानों को दी जाने वाली सालाना दस हजार रूपये की राशि को 16 हजार करने का वादा किया गया है। इसी के साथ पुरानी पेंशन योजना पर विचार करने का आश्वासन दिया गया है। इसके जवाब में तेलंगाना कांग्रेस नेताओं ने भी ऐसे संकेत दिए हैं कि वे अपने घोषणा प

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संजय गुप्त… पांच राज्यों के चुनावों (Elections) की घोषणा होने के साथ ही लोक-लुभावन (Lok-Lubhaavan) घोषणाओं का सिलसिला कायम हो गया है। तेलंगाना में सत्तारूढ़ भारत (India) राष्ट्र समिति की ओर से जारी घोषणा पत्र में गरीबों को दो कमरों का घर, चार सौ रूपये में रसोई गैस सिलेंडर देने और किसानों को दी जाने वाली सालाना दस हजार रूपये की राशि को 16 हजार करने का वादा किया गया है। इसी के साथ पुरानी पेंशन योजना पर विचार करने का आश्वासन दिया गया है। इसके जवाब में तेलंगाना कांग्रेस नेताओं ने भी ऐसे संकेत दिए हैं कि वे अपने घोषणा पत्र में विवाह के समय लड़कियों को एक लाख रूपये के साथ दस ग्राम सोना और छात्रों को मुफ्त इंटरनेट दे सकते हैं।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की ओर से जो घोषणा पत्र जारी किया गया है, उसमें किसानों का कर्ज माफ करने के साथ सौ यूनिट तक मुफ्त एवं दो सौ यूनिट तक आधे मूल्य पर बिजली देने का वादा किया गया है। कांग्रेस ने यह आश्वासन भी दिया है कि वह किसानों का बकाया बिजली बिल माफ कर देगी। उसने पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा करने के साथ यह भी कहा है कि वह आईपीएल की टीम बनाने की कोशिश करेगी। साफ है राजनीतिक दल लोक लुभावन घोषणाओं के मामले में किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। जब कोई एक दल लोक-लुभावन घोषणाएं करता है तो दूसरा भी वैसा ही करने को विवश हो जाता है। इसी कारण ऐसी घोषणाएं करने की होड़ बढ़ती जा रही है।
चुनाव के पहले लोक-लुभावन घोषणाएं करना कोई नई बात नहीं, लेकिन अब ऐसी घोषणाएं कुछ ज्यादा ही होने लगी हैं। इसका कारण यह है कि कुछ दल ऐसी घोषणाएं करके सत्ता में आने में सफल रहे हैं। अब सभी दलों को यह लगने लगा है कि मुफ्त बिजली, पानी, मोबाइल, लैपटाप, साइकिल, स्कूटी आदि देने की घोषणाएं करके चुनाव जीते जा सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी लोक- लुभावन घोषणाओं को रेवड़ी संस्कृति बताते यह कह चुके हैं कि इस संस्कृति के चलते देश का आर्थिक ढांचा चरमरा सकता है, लेकिन कई दल इस संस्कृति का बचाव कर रहे हैं । वे यह भी कहते हैं कि खुद भाजपा भी तो लोक-लुभावन घोषणाएं करती है । रेवड़ी संस्कृति इसीलिए फल-फूल रही है, क्योंकि जो योजना किसी के लिए रेवड़ी है, वही किसी अन्य के लिए जनकल्याण राजनीतिक दल यह समझने को तैयार नहीं कि कौन सी योजना लोगों को आत्मनिर्भर बनाती है और कौन उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने से रोकती है ?
निःसंदेह कई योजनाएं ऐसी होती हैं, जो निर्धन तबके को आत्मनिर्भर बनाने के साथ उनके जीवन को सुगम बनाती हैं। ऐसी कई योजनाएं मोदी सरकार भी चला रही है। मोदी सरकार की रसोई गैस, बिजली, शौचालय, आवास प्रदान करने वाली सामाजिक विकास की अनेक योजनाओं की विशेषता यह है कि उनका क्रियान्वयन प्रभावी ढंग से किया गया है। कुछ राज्य सरकारों ने भी अपनी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कर लोगों का जीवन सुगम बनाया है सामाजिक उत्थान की योजनाएं न केवल ऐसी होनी चाहिए, जो लोगों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाएं, बल्कि वे आर्थिक नियमों के अनुकूल भी होनी चाहिए। जब आर्थिक नियमों की अनदेखी कर लोक- लुभावन घोषणाएं करने वाले दल सत्ता में आ जाते हैं तो वे उन्हें लागू कर पाने में सक्षम नहीं हो पाते। नतीजा यह होता है कि वे उन्हें आधे-अधूरे ढंग से लागू करते हैं। कोई भी सरकार अपनी लोक- लुभावन घोषणाएं तभी पूरी कर सकती है, जब वह आर्थिक रूप से सक्षम हो । मोदी सरकार कल्याण की अनेक योजनाएं संचालित कर पा रही है तो इसीलिए कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है ।
विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहां कमजोर तबके के उत्थान के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़ी सामाजिक योजनाएं न चलती हों, लेकिन जो देश आर्थिक नियमों की अनदेखी करके ऐसी योजनाएं चलाते हैं, वे आर्थिक संकट से घिर जाते हैं। ऐसे अनेक देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं। इनमें कई यूरोपीय देश भी हैं और पाकिस्तान सरीखे देश भी । अपने देश में आर्थिक नियमों की अनदेखी कर लोक-लुभावन घोषणाएं करने वाले दलों की संख्या बढ़ती जा रही है। इनमें उन राज्यों के भी दल हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। चुनाव वाले राज्यों और विशेष रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बारे में रिजर्व बैंक साफ तौर पर कह चुका है कि इन राज्यों पर बढ़ता कर्ज लंबे समय तक बरकरार नहीं रखा जा सकता। रिजर्व बैंक का यह भी कहना है कि कोरोना काल में लिए गए कर्ज के कारण इन राज्यों की भावी सरकारों को अगले पांच वर्षों के दौरान कर्ज के एक बड़े हिस्से की अदायगी करनी होगी । समस्या यह है कि राजनीतिक दल इस पर विचार करने को तैयार नहीं कि यदि राजस्व संग्रह का एक बड़ा हिस्सा लोक- लुभावन वादों को पूरा करने में खप जाता है तो फिर विकास के काम कैसे होंगे? इस प्रश्न की कांग्रेस कुछ ज्यादा ही अनदेखी कर रही है। इसका एक कारण उसका वामपंथी विचारधारा से ग्रस्त हो जाना है। वह किसानों की कर्ज माफी पर इसके बाद भी जोर दे रही कि ऐसी योजनाओं से किसानों का भला नहीं हुआ।
रेवड़ी संस्कृति को लेकर सुप्रीम कोर्ट से लेकर रिजर्व बैंक तक अपनी चिंता जता चुके हैं, लेकिन राजनीतिक दल बेपरवाह होकर लोक-लुभावन घोषणाएं करके एक तरह से वोट खरीदने का ही काम कर रहे हैं। इसको तभी रोका जा सकता है, जब सभी दलों में इसे लेकर कोई आम सहमति बने कि देश के किस हिस्से में सामाजिक उत्थान की कौन- सी योजनाएं संचालित करने की जरूरत है। इस सहमति को आचार संहिता का हिस्सा बनाने के साथ संसद से स्वीकृति भी ली जानी चाहिए। यह भी हो सकता है कि राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे अपने लोक-लुभावन घोषणा पत्र जारी करने के पहले रिजर्व बैंक और चुनाव आयोग की स्वीकृति हासिल करें, ताकि यह परखा जा सके कि संबंधित राज्य की आर्थिक स्थिति लोक-लुभावन चुनावी वादों को वहन करने की स्थिति में है या नहीं? समय आ गया है कि चुनाव आयोग या सीएजी जैसी किसी अन्य संस्था को ऐसे अधिकार मिलें कि वह राजनीतिक दलों को अनाप-शनाप लोक- लुभावन घोषणाएं करने से रोक सके।

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