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रेवड़ियों पर राजनीति का बढ़ता भरोसा
By EditorialPublished on
अगले महीने विधानसभा चुनाव (vidhansabha election) वाले राज्यों में राजनीतिक दलों में लोक-लुभावन घोषणाओं की होड़ बताती है कि इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग तक की नसीहतें बेअसर साबित हुई हैं। समाज कल्याण निस्संदेह सरकार की जिम्मेदारी है, मगर ऐन चुनाव से पहले जैसी योजनाएं घोषित की जा रही हैं या वादों की बारिश की जा रही है, वह दरअसल सत्ताधीशों को कठघरे में खड़ा करता है। कमोबेश सभी दल कभी न कभी राज्यों में तो सत्ता में रहे ही हैं। फिर भी आबादी का बड़ा हिस्सा जीवन-यापन के लिए मुफ्त की रेवड़ियों
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राज कुमार सिंह: अगले महीने विधानसभा चुनाव (vidhansabha election) वाले राज्यों में राजनीतिक दलों में लोक-लुभावन घोषणाओं की होड़ बताती है कि इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग तक की नसीहतें बेअसर साबित हुई हैं। समाज कल्याण निस्संदेह सरकार की जिम्मेदारी है, मगर ऐन चुनाव से पहले जैसी योजनाएं घोषित की जा रही हैं या वादों की बारिश की जा रही है, वह दरअसल सत्ताधीशों को कठघरे में खड़ा करता है। कमोबेश सभी दल कभी न कभी राज्यों में तो सत्ता में रहे ही हैं। फिर भी आबादी का बड़ा हिस्सा जीवन-यापन के लिए मुफ्त की रेवड़ियों का मोहताज है, तो आजादी के बाद साढ़े सात दशक तक सत्ताधीश क्या करते रहे? जो दल सत्ता में हैं, उन्हें भी जन- कल्याण की सुध ऐन चुनाव से पहले आती है! वे फिर सत्ता में आने पर भी बहुत सारी लोक-लुभावन योजनाएं लागू करने की घोषणा कर रहे हैं। आम आदमी का जीवन बेहतर बनाने के लिए यह सब कुछ जरूरी है, तो इसे अभी तक क्यों नहीं किया? सवाल यह भी है कि लोक-लुभावन योजनाओं का सूबे की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
कोई सत्ताधीश या उसका दल तो इन योजनाओं का आर्थिक बोझ नहीं उठाएगा। तब क्या उन करदाताओं से सहमति नहीं ली जानी चाहिए, जो देश के विकास के लिए तरह-तरह के कर देते हैं, न कि रेवड़ियों की राजनीति से सत्ता की गारंटी के लिए? जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें से राजस्थान (rajasthan) और छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में कांग्रेस (congress) सत्ता में है, जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा। तेलंगाना (telangana) और मिजोरम (Mizoram) में क्षेत्रीय दल क्रमशः बीआरएस और मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है। येन-केन- प्रकारेण सत्ता हासिल करने के इस दौर में भी रेवड़ियों की राजनीति से अछूता रहने के लिए मिजोरम की प्रशंसा की जानी चाहिए। वहां मिजो नेशनल फ्रंट के नेता जोरामथंगा चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए जनादेश मांग रहे हैं, जबकि जोराम पीपुल्स मूवमेंट उन्हें चुनौती दे रहा है। इन दोनों दलों की ओर से अभी तक कोई ऐसी घोषणा नहीं की गई है, जिसे मुफ्त की रेवड़ी करार दिया जा सके। हां, देश के सबसे पुराने दल कांग्रेस ने अवश्य कुछ वादे किए हैं। अरसे तक मिजोरम में सत्ता का दूसरा ध्रुव रही कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (rahul gandhi) वहां गए, तो उन्होंने वादा किया कि सत्ता में आने पर बुजुर्गों को 2,000 रूपये महीना पेंशन तथा सभी को 750 रूपये में गैस सिलेंडर दिया जाएगा।
मिजोरम से उलट शेष चारों चुनावी राज्यों में सत्ता के दावेदारों में लोक-लुभावन घोषणाओं और वादों की होड़ लगी हुई है। सत्तारूढ़ दलों को जन-कल्याण की इस चिंता ने चुनाव से चंद महीने पहले ही सताना शुरू किया, वरना तो उससे पहले भी इन तमाम वर्गों की दुश्वारियां ऐसी ही थीं। स्वतंत्रता दिवस हर साल आता है, पर राजस्थान, मध्य प्रदेश (madhya pradesh) और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने इस साल लोक-लुभावन घोषणाओं के जरिये उसे अपने चुनाव अभियान की शुरूआत के मौके के रूप में भी इस्तेमाल किया। अशोक गहलोत ने महिलाओं को मुफ्त स्मार्टफोन और 33 लाख लोगों को राशन किट समेत एक-दो नहीं, पूरी सात घोषणाएं कीं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के कमलनाथ से 15 महीने बाद ही सत्ता वापस छीन लेने वाले शिवराज सिंह चौहान ने भी 15 अगस्त को मुख्यमंत्री सीखो - कमाओ समेत चार घोषणाएं कर डालीं, जो अलग-अलग वर्गों के मतदाताओं को लुभाने वाली हैं। रक्षाबंधन (rakshabandhan) भी हर साल आता है, मगर शिवराज ने बहनों को सस्ते गैस सिलेंडर (gas cylinder) का 'राखी गिफ्ट' (rakhi gift) इसी साल दिया ।
पिछले चुनाव में भाजपा (bjp) से छत्तीसगढ़ की सत्ता छीन लेने वाले भूपेश बघेल ने भी हाईस्कूल / कॉलेज के विद्यार्थियों को मुफ्त बस सेवा से लेकर 60 साल पूरे कर चुके मजदूरों को 1,500 रूपये मासिक पेंशन की घोषणा के लिए यही अवसर चुना। अब कांग्रेस ने वचन पत्र के रूप में मध्य प्रदेश के लिए अपना जो चुनावी घोषणापत्र जारी किया है, उसमें जातिगत गणना, पुरानी पेंशन बहाली, किसानों के बकाया बिजली बिल माफी, स्नातक बेरोजगारों को 3,000 रुपये भत्ता, महिलाओं को 1,500 रूपये मासिक, और फिर 200 यूनिट तक आधे रेट पर 750 रूपये में गैस सिलेंडर, 100 यूनिट मुफ्त बिजली के अलावा पढ़ो - पढ़ाओ योजना के छात्रों को 500 से लेकर 1,500 रूपये तक तहत स्कूल जाने वाले विभिन्न कक्षाओं के देने तथा राज्य की अपनी आईपीएल टीम बनाने जैसे वादे शामिल हैं। गरीब छात्रों को मुफ्त शिक्षा, पुस्तकें, मिड डे मील जैसी सुविधाएं तो समझ में आती हैं, लेकिन स्कूल आने के लिए रूपये देकर कौन-सी संस्कृति विकसित करना चाहते हैं? आईपीएल टीम बनाना कब से प्रदेश सरकार का काम हो गया? इससे निवासियों का कौन-सा कल्याण होगा ?
लोक-लुभावन घोषणाओं के मामले में तेलंगाना इन तीनों राज्यों को भी पीछे छोड़ देता है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (chandrashekhar rao) अपनी चुनावी ताकत जन-कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों को ही बताते हैं। जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तेलंगाना में कांग्रेस ने विवाह के समय लड़कियों को एक लाख रुपये नकद ही नहीं, एक तोला सोना भी देने का वायदा किया है, क्योंकि वर्तमान सरकार फिलहाल इस मौके पर कुल मिलाकर 1,00, 116 रूपये दे रही है। यह भी कि विद्यार्थियों को मुफ्त इंटरनेट दिया जाएगा, महिलाओं को 2,500 रूपये महीना मिलेंगे और गैस सिलेंडर 500 रूपये में। जवाब में केसीआर ने ऐलान किया है कि फिर सत्ता में आने पर किसानों का कर्ज माफ होगा, मुफ्त बिजली मिलेगी, बेरोजगारों को एक लाख रूपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी, गृह लक्ष्मी आरोग्यश्री के तहत 15 लाख रूपये तक का योजना में तीन लाख मिलेंगे और इलाज मुफ्त होगा।
दरअसल, दल और नेता तो रेवड़ियों करते, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक, इन्हें लागू करने में लगभग 37 हजार करोड़ रूपये का खर्च आएगा । कभी तमिलनाडु से शुरू हुआ मुफ्त की रेवड़ियों का चुनावी खेल अब पूरे देश पर हावी है। दिल्ली (delhi)- पंजाब (panjab) जीतकर आप ने इसे चुनाव जिताऊ हथियार बना दिया है, जिसे अब हरेक दल आजमा रहा है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग भी नसीहत देने से आगे नहीं याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट बढ़ना चाहते। हालांकि, ऐसी ही एक ने 5 जुलाई, 2013 को टिप्पणी की थी इससे सभी लोग प्रभावित होते हैं और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की जड़ें काफी हद तक हिल जाती हैं।

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