Geopolitical Tensions and Rising Oil Prices
धर्मकीर्ति जोशी: दुनिया अभी रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine war) से उपजी परिस्थितियों से उबर भी नहीं पाई थी कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के एक नए मोर्चे ने विश्व को एक नई अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है। रूस- यूक्रेन की लड़ाई के चलते जहां खाद्य पदार्थों से लेकर कई आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने से महंगाई बेलगाम हो गई तो इजरायल-हमास टकराव के चलते यही बात कच्चे तेल के बारे में कही जा सकती है। इतिहास साक्षी है कि पश्चिम एशिया में कोई भी टकराव कच्चे तेल की कीमतों में आग लगाने का ही काम करता आया है। इस बार की स्थिति और विकट है, क्योंकि रूस और सऊदी अरब जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने पहले ही अपना उत्पादन घटा दिया है। इसी कारण कच्चे तेल के दाम 95 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गए थे। वैश्विक अर्थव्यवस्था में कुछ सुस्ती के कारण तेल की कीमतें फिसलकर 85 डालर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचीं, लेकिन इजरायल हमास टकराव के बाद कीमतों ने फिर से करीब 93 डालर प्रति बैरल का रूख कर लिया है। यदि पश्चिम एशिया में यह लड़ाई लंबी खिंची तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
चूंकि भारत बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है तो स्वाभाविक है कि तेल के दाम बढ़ने से भारत का आर्थिक गणित गड़बड़ाएगा। इसके चलते मुद्रास्फीतिक दबाव महंगाई को नए सिरे से बढ़ा सकते हैं। आसन्न चुनावों को देखते हुए पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी के आसार तो नहीं लगते, लेकिन तेल की ऊंची कीमतें किसी न किसी रूप में असर तो दिखाएंगी ही । तेल की कीमतों का रूख इस दोहरे रूझान से तय होगा कि क्या पश्चिम एशिया का हिंसक टकराव और तेल उत्पादक देशों की कटौती का अधिक असर होगा या फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती के चलते मांग में कमी तेल की कीमतों को काबू में रखेगी।
रूस - यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पहले से ही दबाव में है, जिसे पश्चिम एशिया का ताजा घटनाक्रम और बढ़ाने का काम करेगा। ऐसे में महंगाई विश्व के लिए बड़ी चुनौती बनी रहेगी। कई देशों में यह अभी भी असहज स्थिति में बनी हुई है। यही कारण है कि पश्चिमी देशों के केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में वृद्धि के सिलसिले पर विराम नहीं लगाया है। इसके भरे-पूरे आसार हैं कि पश्चिम देशों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी का यह सिलसिला अभी कायम रहेगा भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर इसका स्वाभाविक असर होगा, क्योंकि विदेशी निवेशक अपनी पूंजी वित्तीय परिसंपत्तियों के लिहाज से अपेक्षाकृत सुरक्षित पश्चिमी देशों में लगाने को प्राथमिकता देंगे। इसके चलते भारत से होने वाले पूंजी पलायन का असर विदेशी मुद्रा भंडार से लेकर रूपये की सेहत पर भी दिख सकता है।
अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती भी एक बड़ी चिंता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से लेकर विश्व बैंक ने अपने अद्यतन अनुमानों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में कमी आने की आशंका जताई है। इस साल की पहली छमाही में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य अच्छी स्थिति में दिख रहा था, लेकिन दूसरी छमाही में संकेत उतने अच्छे नहीं दिख रहे इस विश्वव्यापी सुस्ती का असर भारत पर भी दिखने लगा क्योंकि देश से होने वाले निर्यात घट रहे हैं। निर्यात के मोर्चे पर भारत के लिए चिंता दोतरफा है। पहली यह कि अमेरिका और यूरोप को होने वाले निर्यात में उतनी ज्यादा कमी नहीं आई है, लेकिन खतरा यही है कि पश्चिम के बाजारों में आर्थिक सुस्ती का साया मंडरा रहा है। ऐसे में संभव है कि देर-सबेर मांग घटने से वहां भी निर्यात सिकुड़ने लगें। भारत के दृष्टिकोण से दूसरी चिंता यह है कि अपेक्षाकृत तेजी पर सवार एशियाई बाजार में उसके निर्यात काफी तेजी से घट रहे हैं। यानी जिस पश्चिमी बाजार में हमारे निर्यात ठीक-ठाक स्थिति में हैं, वहां मांग पर ग्रहण लग सकता है। जबकि एशियाई बाजार में संभावनाएं पहले से ही सीमित होती जा रही हैं। एशियाई बाजार में भारतीय निर्यात की ढीली होती पकड़ का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 2018-19 में देश से होने वाले निर्यात में एशिया-प्रशांत क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो अब घटकर 26 प्रतिशत रह गई है। हालांकि इसके पीछे यह वजह भी हो सकती है कि भारत आरसेप जैसे किसी व्यापक व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं है। उसके जवाब में भारत की रणनीति मुक्त व्यापार समझौते और अन्य उपायों की है, जिनके असर धीरे सामने आएंगे।
इन जटिल परिस्थितियों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है एक समय आसमान पर पहुंची टमाटर और अन्य सब्जियों की कीमतों ने महंगाई की आग में घी डालने का काम किया था, लेकिन सब्जियों की कीमतें अब नियंत्रण में आ गई हैं। गैस सिलेंडर के दाम भी घटे हैं तो ईंधन के मोर्चे पर भी राहत मिली है। हालांकि अनाज और दलहन जैसी वस्तुओं की कीमतें अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं। इन्हीं अंतर्निहित मुद्रास्फीतिक दबावों के चलते रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में फिलहाल कटौती के कोई संकेत नहीं दिए हैं। इसका अर्थ है कि मौद्रिक नीति अभी यथास्थिति बनी रहेगी। वहीं, कर संग्रह से लेकर औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े भी उत्साहित करने वाले हैं। घरेल मांग विशेषकर शहरी क्षेत्रों में मांग में का जबरदस्त रूझान देखने को मिल रहा है। सेवा क्षेत्र में विमानन से लेकर आतिथ्य सत्कार क्षेत्र को इसका बड़ा लाभ मिल रहा है तो वाहन और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्र भी इससे व्यापक स्तर पर लाभान्वित हो रहे हैं। सरकार भी बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रही है, जिससे स्टील और सीमेंट जैसे तमाम सेक्टर बहुत फायदे की स्थिति में हैं। इसके चलते निर्माण गतिविधियों में आई तेजी से कुशल - अकुशल कर्मियों को बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं। देश में स्वरोजगार विस्तार के रूझान भी आशाजनक हैं।
अपनी आधारभूत मजबूत स्थिति के कारण ही भारतीय अर्थव्यवस्था छह प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज करने की स्थिति में है और वर्तमान वैश्विक उथल- पुथल और अनिश्चितता में यह वृद्धि दर किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं। इसके बावजूद आने वाले दिनों में इस घरेलू मजबूती की वैश्विक उतार-चढ़ाव के समक्ष परीक्षा होना तय है।
Editorial

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