Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
वेन्कूवर Vancouver : थोड़ी देर आगे चले तो बस्ती नजर आने लगी, छोटी सी ही थी मगर अत्याधुनिक थी। बढ़िया मकान, दुकानें, सड़कें। रेस्टोरेन्ट की तलाश में बोर्ड देखते आगे बढ़ने लगे मगर कहीं मेक्डोनल्डस या एसे अन्य किसी रेस्टोरेन्ट का नामों निशां नहीं था। दरअसल यह उपनगर हाईवे की दोनों तरफ बसा हुआ था। हम लोग दायीं तरफ थे। बायीं तरफ शायद शहर का ज्यादा विकसित हिस्सा हो। मैंने उधर ही चलने को कहा तो राजा ने साफ इन्कार कर दिया कि ज्यादा आगे गये तो जीपीएस गड़बड़ हो जायगा। मुझे भी ज्यादा पता नहीं था, एक बार पहले कनाडा में रास्ता भटक चुके थे, दूसरी बार यह जोखम लेने को तैयार नहीं थे।
हम इसी क्षेत्र में रहे, यहीं से थोड़ा आगे निकल कर एक्जिट निकलता था जिससे वापस हाईवे पकड़ सकते थे। यहां कहीं कोई भारतीय रेस्टोरेन्ट नजर नहीं आ रहा था, न ही कहीं पीजा फ्राईज जैसी चीजें ही नजर आ रही थी। गाड़ी को एक खुले से मैदान में खड़ा कर दिया और हम पैदल ही बाजार में वेज रेस्टोरेन्ट तलाशने लगे। एक जगह पीजा का बहुत बड़ा बोर्ड लगा देखा तो राहत मिली। लपक कर हम उधर गये, रेस्टोरेन्ट के बाहर कांच के दरवाजे लगे थे, खोलने लगे तो शायद अन्दर से बन्द थे। सोचा कोई खोलेगा, मगर काफी देर तक कोई नहीं आया तो निराश होकर हम आगे बढ़ गये।
ज्यू ज्यूं भूख बढ़ रही थी, प्रीति की याद आ रही थी। अभी वो होती तो झट से अपने बेग से कोई नमकीन या अन्य बीज निकाल कर आगे कर देती। इधर उधर घूमते एक और रेस्टोरेन्ट नजर आया यह भी कांच के दरवाजों से बन्द था, मगर दरवाजा खोलने की कोशिश की तो खुल गया। अन्दर कुर्सी टेबल लगे हुए थे, एक वेटर टेबल पर कपड़ा मार रहा था। उससे पूछा रेस्टोरेन्ट खुला है तो उसने हां कह दि हम अन्दर घुसे, एक तरफ काउन्टर बना हुआ था, इसके पीछे किचन था, टर पर कोई नहीं था मगर किचन में जरूर दो आदमी नजर आ रहे थे। पूरा स्टोरेन्ट खाली था।
काउन्टर के उपर यहां उपलब्ध व्यंजनों के चित्र सहित बोर्ड लगे हुए थे। इनमें वेज का विकल्प एक ही था। यह न तो पीजा था और न ही फ्राईज कोई अन्य ही चीज थी। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अमेरिका में फ्रेन्च फ्राईज इतनी अधिक लोकप्रिय हैं फिर भी साधारण रेस्टोरेन्टों में उपलब्ध नहीं। एक वक्त जरूर था जब फ्रेन्च फ्राईज को लेकर बवण्डर मच गया था। 2003 की बात है। अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया था तो फ्रान्स ने उसका विरोध कर डाला। यह बात अमेरिका की सत्ताधारी पार्टी के दो सीनेटरों को पसन्द नहीं आई। फ्रान्स के प्रति उनके मन और वितृष्णा उत्पन्न हो गई। उन्होंने संसद भवन में चलने वाले तीनों केन्टीनों के मेनू कार्ड से फ्रेन्च फ्राई नाम हटवा दिये और इनकी जगह फ्रीडम फ्राइज नाम लिखवा दिये।
देशवासियों से भी उन्होंने अपील की कि वे फ्रेन्च फ्राइज को अब फ्रीडम फ्राइज कहें। कुछ दिन तक यह अभियान जरूर चला मगर अन्ततः देश के लोगों को भी अमेरिका द्वारा इराक पर हमला करना नागवार गुजरा। धीरे धीरे फ्रीडम फ्राईज को लोगों ने वापस फ्रेन्च फ्राइज कहना शुरू कर दिया। वैसे इस दौरान इन्हें फिंगर चिप्स तथा फ्राईज नाम से भी पुकारा जाने लगा।
राजा काउन्टर से कुछ दूर खड़ा हो गया। शायद किचन के अन्दर से कोई आकर ओर्डर ले, मगर टेबल साफ कर रहे वेटर ने ही जोर से कह दिया कि वह एक मिनट में आता है। राजा ने मुझे एक टेबल पर बैठ जाने को कहा। थोड़ी ही देर में बेटर काउन्टर पर आ गया। राजा ने उसे आर्डर दे दिया। उसने कागज के दो बड़े बड़े गिलास राजा को दे दिये। एक तरफ सोड़ा का फाउन्टेन लगा था। यहां पेप्सी और मीरान्डा दोनों के फाउन्टेन थे। एक गिलास में पेप्सी तथा एक में मीराण्डा भर कर ले आया और मेरे आगे कर दिये। मैंने पेप्सी की गिलास उठा ली और पीने लगा, जल्दी जल्दी में गले में अलख गई तो खांसी आ गई। अब राजा मुझे डांटने लगा क्या बच्चों की तरह जल्दी मची है. धीरे धीरे पीयो। पेप्सी वैसे ही तेज होती - है, गले में उतरते ही महसूस होती है, पर मुझे तो भूख लग रही थी, क्या करता। मैं सहज होता जितने उसका लेक्चर जारी था। वो मेरे से 7-8 साल छोटा था मगर बर्ताव एसे करता जैसे मुझसे बड़ा हो। मैं भी मजे लेता रहता।
इस बीच रेस्टोरेन्ट में अन्य ग्राहक भी आ गये थे। हमारे पास बैठा एक व्यक्ति गिलास भर कर पेप्सी लाया था, गटागट पी, उठा और वापस पूरी गिलास भर कर ले आया। मैं हैरत से देखता रहा, पैसे भी नहीं दिये और गिलास वापस भर ली. किसी ने देखा भी नहीं। मैंने राजा को यह बात बताई तो उसने कहा कि अमेरिका में यही प्रणाली है, एक बार पैसे दो, आपको गिलास मिल जायगी, उसके बाद जितनी मर्जी चाहे पेप्सी पीयो कोई रोकने वाला नहीं। और तो और जाते वक्त वापस पूरा गिलास भर कर भी साथ ले जा सकते हो। मुझे यह प्रणाली पसन्द आई। हमारा आर्डर अभी तक तैयार नहीं हुआ था, मैं एक गिलास और भर कर ले आया, राजा हंस कर कहने लगा मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन। मैं सोचने लगा यह प्रणाली अगर भारत के किसी रेस्टोरेन्ट में लागू हो जाये तो बिचारे का दीवाला ही निवाल जाये।
शीघ्र ही हमारा आर्डर आ गया। किसी तरह की स्टिक्स थी, स्टीक मांस भी होता है तो मैंने पूछ लिया। राजा ने अपने लिये नोन वेज मंगाया था। यह स्टिक आलू तथा मैदे की बनी हुई कोई चीज थी, स्वाद इसका भा गया। थोड़ा थोड़ा समोसे और थोड़ा थोड़ा ब्रेड पकौड़े जैसा स्वाद आ रहा था, मेरा काम चल गया। चलते चलते वापस गिलास भरना नहीं भूले। राजा ने भी इस बार मीराण्डा की जगह पेप्सी ही भर ली।
पार्किंग में जाकर गाड़ी वापस चालू की और जीपीएस देखा तो वह निशान बता रहा था, राजा की जान में जान आई और हमने वापस हाईवे पकड़ ली। रविवार था इसलिये सड़क पर वाहन ज्यादा नहीं थे अन्यथा रोज बेनकूवर से अमेरिका आने वालों का ट्राफिक बहुत रहता है। अलग-अलग देश होने के बावजूद सरल औपचारिकताओं के कारण लोगों के इधर उधर जाने का क्रम बना रहता है।
शीघ्र ही हम अमेरिका की सीमा पर पहुँच गये। दूसरी तरफ कनाडा था। नियात्रा से जब कनाडा में प्रवेश किया था तब बीच में बहुत बड़ी नदी प्राकृतिक विभाजक बनी हुई थी, मगर यहां एसा कुछ नहीं था। एक तरफ उधर से आने वाले वाहनों हेतु चौड़ी चौड़ी सड़कें थी, एक तरफ जाने वालों की। इन सड़कों के बीच विशाल मैदान थे जिन्हें हरे हरे घास के मैदानों में परिवर्तित कर दिया गया था। एक लॉन के बीचों बीच बहुत बड़ा दरवाजा बना हुआ था, हमारे यहां के इण्डिया गेट या पेरिस के चेम्स एलीसीज जैसा। उतना बड़ा नहीं था। इसके चारों तरफ लॉन था इसलिये द्वार एक स्मारक मात्र था। इसका नाम पीस आर्क है। यह समूचा पार्क पार्क है। यहां दोनों देशों के लोग बिना किसी रोक टोक के समय व्यतीत है, इनसे अपेक्षा यही की जाती है कि वे पार्क की सीमा का उल्लंघन नहीं क्यू ही हम इस पार्क के नजदीक पहुंचे भारतीय गानों की स्वर लहरी कानों में उठी। पार्क में कई परिवार पिकनिक मनाते नजर आ रहे थे, इन्हीं में से किसी * मोबाइल में यह गीत बज रहा था। गौर से देखा तो ये लोग भारतीय नजर आये। सलवार-कुर्ता पहनी स्त्रियां बच्चों के साथ खेल रही थी। ज्यू ज्यू हम पार्क के पास आये तो कई अन्य परिवार नजर आये, सभी भारतीय तथा सभी का इसी तरह का पंजाबी परिधान। दरअसल सीमा पार करते ही कनाडा का घना बसा शहर सरी आ है।सरी इंगलेण्ड के सरी नाम पर ही है जिसे हमारे यहां सरे कहते हैं। समूचे कोलम्बिया प्रान्त में इंगलेण्ड के तमाम प्रसिद्ध नगरों स्थानों के नाम पर कस्बे उपनगर नजर आ जाते है। सरी सीमा से सटा होने के कारण रविवार को यहां के लोग पिकनिक मनाने आ जाते हैं।

Editorial

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