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सुरेंद्र कुमार: इस्राइल (Israel) और अरबों (arabs) के बीच संघर्ष (Conflict) के इसके जन्म के समय ही बो दिए गए थे। नवंबर, 1947 के संयुक्त राष्ट्र महासभा संकल्प 181 (United Nations General Assembly resolution 181) के अनुसार मई 1948 में इसके निर्माण के बाद विभाजन प्रस्ताव के मुताबिक इस्राइल को 54.5 प्रतिशत क्षेत्र और अरबों को 44 प्रतिशत क्षेत्र दिया गया। इस्राइल को एक राज्य रूप में मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दी गई, लेकिन फलस्तीनियों (Palestinians) के लिए कोई राज्य नहीं बनाया गया। इसके बजाय 7 लाख फलस्तीनी शरणार्थी बन गए। अरबों ने इस विभाजन को अस्वीकार कर दिया और इस्राइल को मिस्र, सीरिया
(Syria)
, इराक (Iraq) और लेबनान (Lebanon) की सेनाओं के संयुक्त हमले का सामना करना पड़ा। इसमें कुछ मदद सऊदी अरब ने भी की ।
हालांकि, संयुक्त अरब (United Arab) की सेनाएं इस्राइल को नहीं हरा सकीं। फरवरी, 1949 में संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद इस्राइल ने अपने पड़ोसियों- मिस्र, लेबनान, ट्रांसजॉर्डन और सीरिया के साथ अलग-अलग युद्धविराम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। मिस्र ने गाजा पट्टी (Gaza Strip) पर, तो जॉर्डन (Jordan) ने पश्चिमी तट पर अपना कब्जा बरकरार रखा, लेकिन नुकसान में केवल फलस्तीनी ही रहे । विभाजन प्रस्ताव के तहत उन्हें दिया गया क्षेत्र अब इस्राइल के पास चला गया। यह घाव पर नमक छिड़कने जैसा था। फलस्तीनी पश्चिमी तट और गाजा पट्टी के क्षेत्र में ज्यादातर संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी शिविरों में रहने के लिए मजबूर हो गए, जो उनके ऐतिहासिक क्षेत्र का बमुश्किल 22 फीसदी था, जिसके बारे में फलस्तीनियों का दावा है कि यह सैंकड़ों वर्षों से उनका है। इस एहसास से कि अरब सेनाएं उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं और अमेरिका व उसके सहयोगी उसके पक्ष में खड़े रहेंगे, इस्राइल अपने पड़ोस में और अधिक क्षेत्र हड़पने के लिए प्रोत्साहित हुआ । दुर्भाग्य फिर सर्वाधिक नुकसान फलस्तीनियों को हुआ। गाजा में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। 365 वर्ग किलोमीटर के इस क्षेत्र में 21.7 लाख लोग रहते हैं और 13.8 लाख लोग शरणार्थी के रूप में पंजीकृत हैं।
सामान्य दिनों में भी कोई बिना इस्राइली परमिट गाजा से पश्चिमी तट नहीं जा सकता और इस्राइली परमिट पाना बहुत मुश्किल है। हमास द्वारा मौजूदा हमले के बाद इस्राइल ने गाजा की पूरी तरह से नाकाबंदी करके बिजली, पानी, गैस और खाद्य आपूर्ति बंद कर दी है और लोगों से वहां से चले जाने के लिए कहा है। वे जाएं तो जाएं कहां और कैसे ? संयुक्त राष्ट्र महासभा के सचिव एंटोनियो गुटेरस ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताकर इसकी आलोचना की है। हमास के हिंसक हमलों की निंदा करने वाले यूरोपीय संघ को भी लगता है कि गाजा की पूर्ण नाकाबंदी मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकती है।
बेंजामिन नेतन्याहू (benjamin netanyahu) के प्रधानमंत्री बनने के बाद शांति प्रक्रिया और धीमी पड़ गई। वह अराफात से मिलने तक को राजी नहीं थे । ओस्लो समझौते के तहत जिस स्व- शासन का वादा किया गया था, उसके चिह्न पांच वर्षों में ही हवा हो गए। ओस्लो समझौते की विफलता ने हमास जैसे कट्टरपंथी फलस्तीनियों को मजबूत किया। जाहिर है, ओस्लो समझौते को लागू न करने, फलस्तीनी प्राधिकरण के अधिकार को कमजोर करने और दैनिक आधार पर आम फलस्तीनियों के साथ कठोर व्यवहार ने एक ऐसा माहौल तैयार किया, जिसने शांति के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। वर्ष 2007 के बाद जब से हमास ने गाजा पर शासन शुरू किया है, इस्राइल के साथ उसके कई टकराव हुए हैं।
इस बार हमास ने इस्राइल की प्रसिद्ध अजेय रक्षा प्रणाली को भेदते हुए समन्वित जमीनी, हवाई और समुद्री हमलों से इस्राइलियों को चकमा दे दिया; उनके रॉकेटों ने लगभग 1,500 इस्राइलियों को मार डाला; उन्होंने महिलाओं और बच्चों सहित लगभग 150 इस्राइलियों को बंधक बना लिया है। अपनी सैन्य श्रेष्ठता के कारण इस्राइल हमास पर हावी हो जाएगा, और कुछ समय के लिए हमास का सफाया कर देगा। लेकिन क्या 1948 के बाद से इस्राइल की लगातार सैन्य जीत से उसे शांति और सुरक्षा मिली है, जिसकी वह इतनी बेसब्री से तलाश कर रहा था? यदि नहीं, तो क्या यह समय नहीं है कि इस्राइल के सभी दलों के नेता आत्मनिरीक्षण करें, और फलस्तीनियों के प्रति अपने रवैये और नीतियों पर दोबारा गौर करें। उन्हें मानसिकता बदलने और हृदय परिवर्तन कर अपने पड़ोसियों से प्यार और सम्मान करना सीखने की जरूरत है। प्यार प्यार पैदा होता है और नफरत से नफरत!
अपराध, आतंक और बर्बरता की निंदा की ही जानी चाहिए और धर्म एवं राष्ट्रीयता की परवाह न करते हुए अपराधियों को खत्म करना चाहिए। हमास ने इस्राइल के खिलाफ जघन्य अपराध किया है, उसकी हिंसा एवं बर्बरता की कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए । इस्राइल को अपराधियों को दंडित करने का वैध अधिकार है। लेकिन अगर लोकतंत्र एवं मानवाधिकार का समर्थन करने वाला इस्राइल भी उसी तरह की हिंसा और बर्बरता का सहारा लेकर 20 लाख फलस्तीनियों को सामूहिक दंड देता है, तो उसमें और हमास में क्या अंतर है? महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने कहा था कि आंख के बदले आंख कोई समाधान नहीं है, इस नीति से तो पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी !
इस्राइल को सैन्य समाधानों की निरर्थकता का एहसास होना चाहिए। ओस्लो शांति समझौते पर फिर से विचार करना, उसके प्रावधानों को लागू करना, डेविड कैंप समझौते में निहित शांति के फॉर्मूले को अपनाना और संयुक्त राष्ट्र संकल्प 242 के दायित्वों को पूरा करना ही इस्राइल एवं फलस्तीन दोनों के लिए स्थायी शांति और सुरक्षा का एकमात्र विकल्प है। इस्राइल के साथ एक स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र के उदय के बिना शांति नहीं होगी। अमेरिका बहुत पहले ही इस्त्राइल को यह विकल्प चुनने के लिए प्रेरित कर सकता था, पर उसने नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस संघर्ष को समाप्त कराने की कोशिश करनी चाहिए। यूक्रेन में चल रहे युद्ध के बाद दुनिया एक और युद्ध को बर्दाश्त नहीं कर सकती ।
भारत ऑपरेशन अजय के तहत इस्राइल में फंसे लगभग 20 हजार भारतीयों को वापस अपने देश ला रहा है। भारत ने इस्राइल के साथ व्यापक रक्षा, कृषि एवं वैज्ञानिक सहयोग तथा अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते को देखते हुए सही कदम उठाया है और हमास के आतंक की निंदा करने के साथ स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र के लिए भारत के समर्थन को दोहराया है। इससे भारत के हित अच्छी तरह से पूरे होंगे ।
Editorial

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