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क्या युद्ध रोकने के गंभीर प्रयास होंगे
By EditorialPublished on
विवेक काटजू..... इजरायल - फलस्तीन युद्ध (Israel-Palestine War) में अब ऐसी घटनाएं भी होने लगी हैं, जिनसे पूरी दुनिया विचलित है। गाजा पट्टी के अल अहली अस्पताल (Ahli Hospital) पर हुआ हमला ऐसा ही एक वाकया है, जिसमें लगभग 500 लोगों की जान गई है। हमास ने इस हमले के लिए इजरायल (Israel) को जिम्मेदार माना है, जबकि इजरायल (Israel) ने इसका खंडन किया है और फलस्तीनी संगठन को ही इसके लिए कुसूरवार बताया है। मगर लगता यही है कि इजरायल के दावे को अमेरिकी राष्ट्रपति (US President) जो बाइडन ने तो मान लिया है, पर अरब दुनिया स्व

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विवेक काटजू..... इजरायल - फलस्तीन युद्ध (Israel-Palestine War) में अब ऐसी घटनाएं भी होने लगी हैं, जिनसे पूरी दुनिया विचलित है। गाजा पट्टी के अल अहली अस्पताल (Ahli Hospital) पर हुआ हमला ऐसा ही एक वाकया है, जिसमें लगभग 500 लोगों की जान गई है। हमास ने इस हमले के लिए इजरायल (Israel) को जिम्मेदार माना है, जबकि इजरायल (Israel) ने इसका खंडन किया है और फलस्तीनी संगठन को ही इसके लिए कुसूरवार बताया है। मगर लगता यही है कि इजरायल के दावे को अमेरिकी राष्ट्रपति (US President) जो बाइडन ने तो मान लिया है, पर अरब दुनिया स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
इस युद्ध की शुरूआत 7 अक्तूबर को हमास के एक अप्रत्याशित हमले से हुई जिसमें करीब 1,400 इजरायली बच्चे-बूढ़े- महिलाएं और सैनिक मार डाले गए थे। उस दिन हमास के आतंकी करीब 200 लोगों को, जिनमें औरतें भी शामिल थीं, बंधक बनाकर साथ ले गए। ऐसा मानव इतिहास में शायद ही कभी हुआ है। इस हमले के कारण इजरायल में स्वाभाविक आक्रोश की लहर फैल गई और इजरायली खुफिया एजेंसी व सरकार की नाकामयाबी का भूलकर वहां के लोग व राजनीतिक दल सरकार के साथ खड़े हो गए । इजरायली सरकार से जनता स्पष्ट मांग थी कि हमास का पूरी तरह सफाया हो, ताकि इजरायली जमीन पर ऐसा कोई आतंकी हमला फिर न हो सके।
इजरायल समर्थक देशों ने हमास के आतंकी हमले की न सिर्फ निंदा की, बल्कि तेल अवीव को अपना समर्थन भी दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 10 अक्तूबर को इजरायली समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात करने के बाद यह ट्वीट किया कि भारत के लोग इस कठिन घड़ी में इजरायल के साथ हैं। दुनिया भर की नजरें इजरायल पर थीं कि हमास के इस हमले के बाद उसका कदम क्या होगा? गुजरे 12 दिन बता रहे हैं कि उसकी मंशा स्पष्ट है। इजरायल ने अपनी वायु सेना और मिसाइलों से गाजा पट्टी में भयंकर बमबारी जारी रखी है, जिसके चलते हजारों लोगों की जान गई है। हालांकि, इजरायल का दावा है कि गाजा के आम नागरिकों को कोई क्षति न पहुंचे, इसकी वह कोशिश कर रहा है, मगर हमास उन्हें 'मानव कवच' के तौर इस्तेमाल कर रहा है। इजरायल ने गाजा क्षेत्र में बिजली, खाद्यान्न, ऊर्जा, ईंधन आदि की आपूर्ति रोक दी है। पहले तो पानी की आपूर्ति भी बंद कर दी गई थी, लेकिन अब इसे जारी कर दिया गया है। जिस तरह से उसने उत्तरी गाजा में रहने वाले करीब 11 लाख लोगों को दक्षिण की ओर जाने का फरमान सुनाया था और एक समय-सीमा तय कर दी थी, उससे यही लगता है कि हमास को मटियामेट करने के लिए वह हर तरह के कदम उठा सकता है।
उसे स्थल मार्ग से गाजा में घुसने से भी ऐतराज नहीं । इस बीच, भारत सहित तमाम देशों ने इजरायल से मांग की है कि वह युद्ध-कानूनों और मानवाधिकारों का पालन करे। अल अहली अस्पताल पर हुए हमले के बाद अरब और इस्लामी दुनिया में इजरायल के खिलाफ भावनाएं अधिक गहरी हो गई हैं। इस घटना के बाद जॉर्डन की राजधानी अम्मान में अरब नेताओं के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का होने वाला शिखर सम्मेलन रद्द कर दिया गया है, जिसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति सिर्फ इजरायल गए। यहीं से वह जॉर्डन जाने वाले थे । इसे इजरायल और हमास के बीच युद्ध रोकने के राजनीतिक प्रयासों के लिए एक झटका माना जा रहा है। असल में, अमेरिका की विदेश नीति में इजरायल का विशेष स्थान है, जिसके कई कारण है। अमेरिका में यहूदी लॉबी का स्थानीय राजनीति, मीडिया और वित्तीय क्षेत्र में खासा दबदबा है। यहूदियों की आबादी खासतौर से न्यूयॉर्क में 19वीं सदी से बढ़ने लगी थी । हिटलर के नरसंहार के कारण, जिसमें करीब 60 लाख यहूदियों को मार दिया गया था, अमेरिका में यहूदियों और इजरायलियों के लिए गहरी सहानुभूति बनी, जो बदस्तूर कायम है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि इजरायल पर यदि कोई संकट आता है, तो अमेरिका का राजनीतिक व सामरिक वर्ग उसे एक प्रकार से अपना संकट मानता है, और हर तरह से इजरायल का समर्थन करता है। आज भी यही देखा जा रहा है। बेशक, राष्ट्रपति बाइडन अपना समर्थन जताने इजरायल पहुंचे, लेकिन उनका यह भी मकसद था कि हमास को खत्म करने में तेल अवीव को इस तरह से मदद दी जाए कि अरब और इस्लामी दुनिया में वाशिंगटन के प्रति भावनाएं न उत्तेजित होने पाएं। यह बहुत कठिन प्रयास है, और हमें यह देखना होगा कि अमेरिका क्या इजरायल को गाजा जमीनी हमले करने से रोक सकेगा? बीते कुछ दशकों में अरब और इस्लामी दुनिया का फलस्तीन से ध्यान बंटने लगा था। इस कारण खासतौर से वेस्ट बैंक में इजरायल ने अपनी मनमानी शुरू कर दी थी। वहां उसने न सिर्फ बाड़ेबंदी की, बल्कि अपने लोगों को बसाना भी शुरू कर दिया था। यह सिलसिला 15 साल से ज्यादा समय से चल रहा है। फलस्तीनियों की नाराजगी यह भी है कि इजरायल इसी तरह धीरे-धीरे उनकी शेष भूमि भी हड़प रहा है। इससे उनका जीवन बहुत ही मुश्किल हो गया है, जिससे जाहिर तौर पर इजरायल - फलस्तीन मसले का हल भी बेहद कठिन प्रतीत हो रहा है। पहले फलस्तीनी संगठनों सहित देश इजरायल के अस्तित्व को ही नकारा करते थे। उनका यह मानना था कि संयुक्त राष्ट्र के जरिये सन् 1947 में किया गया इजरायल - फलस्तीन विभाजन मूलत: फलस्तीनियों के साथ नाइंसाफी है। मगर सन् 1977 के बाद धीरे-धीरे फलस्तीनियों के साथ कई अरब देश भी इसी नतीजे पर पहुंचे कि इजरायल के साथ-साथ एक स्वतंत्र फलस्तीन का कायम होना ही इस समस्या का समाधान है। मिस्र की भी यही राय बन गई थी। मगर लगता है कि इजरायल के नेतागण व सामरिक कूटनीतिज्ञ इससे इत्तफाक नहीं रखते थे। फिर, हाल- फिलहाल इजरायल के संबंध कुछ प्रमुख अरब देशों से भी बने, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल है। इससे इजरायली सरकार को लगने लगा कि वह फलस्तीन मसले को नजरंदाज कर सकती है। मगर हमास के ताजा आतंकी हमले के बाद एक बार फिर फलस्तीन का मसला वैश्विक मंचों पर बहस के केंद्र में आ गया है। महाशक्तियों को इसके ऊपर अपने हाथ सेंकने के बजाय शांति बहाली का मार्ग तलाशना चाहिए।

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