Pratahkal:The need for Meditation to purify the soul:Acharya Mahashraman
मुंबई । शनिवार को आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सानिध्य में प्रेक्षाध्यान दिवस का आयोजन हुआ। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज प्रेक्षाध्यान दिवस है। इसका शुभारम्भ गुरुदेव तुलसी के समय में मुनि नथमलजी (टमकोर) जो आगे चलकर तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Dharm Sangh) के दसवें अनुशास्ता बने, के नेतृत्व में हुआ था। चेतना की विकृत अवस्था को प्रेक्षाध्यान के द्वारा संस्कृत अवस्था में प्रवृत्त किया जा सकता है। मोहनीय कर्मों के कारण आदमी की चेतना विकृत हो जाती है। प्रेक्षाध्यान के माध्यम से विकृत चेतना को निर्मल बनाया जा सकता है। आत्मा को निर्मल बनाने के लिए ध्यान (Meditation) की आवश्यकता होती है। शरीर, वाणी और मन से स्थिर हो जाना ध्यान है। तेरापंथ की ध्यान परंपरा को प्रेक्षाध्यान नाम की संज्ञा प्राप्त है और यह उसकी पहचान भी है। सन् 1975 में जयपुर
(Jaipur)
में इसका शुभारम्भ हुआ था। आचार्य महाप्रज्ञ जैन विश्व भारती में चतुर्मास प्रवास के दौरान तुलसी अध्यात्म निडम में स्वयं शिविरों में उपस्थित होकर कितना ध्यान का प्रयोग कराते थे। प्रेक्षाध्यान में भाग लेने के लिए कितने देशों के लोग आते थे। प्रेक्षा इण्टरनेशनल के द्वारा इसका प्रसार भी हो रहा है। प्रेक्षाध्यान के 50 वर्ष की निकटता के संदर्भ में आचार्यश्री ने प्रेक्षाध्यान वर्ष के समायोजन की भी प्रेरणा प्रदान की।
प्रेक्षाध्यान दिवस पर आचार्यश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को कुछ समय तक प्रेक्षाध्यान का प्रयोग भी कराया। प्रेक्षाध्यान टीम ने गीत का संगान किया। प्रेक्षाध्यान के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि कुमारश्रमण ने अपनी अभिव्यक्ति दी। समणी रोहिणीप्रज्ञा द्वारा लिखित पुस्तक नेशन ऑफ शोल इन जैनिज्म को लोकार्पित किया गया। समणी रोहिणीप्रज्ञा ने भावाभिव्यक्ति दी।

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