Indian Cultural Diversity
हाल इलाहाबाद (Hall Allahabad) उच्च न्यायालय ने सनातन विवाह संस्कार में 'सप्तपदी' को अनिवार्य बताया है। सप्तपदी में वस्तुतः वर और कन्या अग्नि के सात फेरे लेते हैं। दोनों साथ- साथ रहने, सुख- दुख में सहयोगी बने रहने और जीवन के सभी आयामों में साथ साथ ही कर्मतप करने का संकल्प लेते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम में भी प्रविधान है। हिंदू संस्कृति में विवाह दिव्य अनुष्ठान है। वैदिक काल के पहले से ही यहाँ विवाह आनंददायी सामाजिक संस्कार रहा है। अथर्ववेद के अनुसार वर कन्या से कहता है कि 'सौभाग्य वृद्धि के लिए मैं आपका हाथ ग्रहण करता हूं। हम आप आजीवन साथ- साथ रहें ।' विवाह की यही पद्धति पूरे राष्ट्र में चलती है। व्यापक स्तर पर क्षेत्रीय विविधता के बावजूद मूल परंपरा मुख्य रूप से एक ही रहती है।
भारतीय संस्कृति की अनेक परंपराएं राष्ट्रव्यापी हैं जैसे प्रकृति की शक्तियों की उपासना प्राचीनकाल से है ऋवेद में जल को माता कहा गया है। यूनानी दार्शनिक थेल्स से लेकर विज्ञानी चार्लस डार्विन जल को सृष्टि का आदि तत्व मानते थे। भारतीय चिंतन में जल श्रद्धेय है। नदियां पूरे देश में उपास्य हैं। भारतीय संस्कृति में सप्तसिंधु सात नदियों वाले विशाल क्षेत्र की प्रतिष्ठा है। मंदिर और मूर्ति उपासना भी पूरे देश में प्रचलित है। शवदाह की परंपरा संभवतः भारत से ही रोम पहुंची। ईसाइयों में शवदाह की परंपरा नहीं थी। इंग्लैंड में 1902 में क्रीमेशन ( अंत्येष्टि ) एक्ट चना इसी अधिनियम से शवदाह की वैधानिकता स्वीकार की गई। शवदाह वैज्ञानिक भी है और मूलतः हिंदू परंपरा है। वेद में शवदाह के समय के मंत्र हैं कि.. अब तुम्हारी आंखें सूर्य से मिलें और आत्मा विश्व की प्राण शक्ति से मिल जाए। इसी परंपरा में प्रकृति के पांच महाभूतों आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से शरीर के बनने और मृत्यु के बाद इन्हीं तत्वों में मिल जाने की मान्यता है। मृतक के स्वजन मृतक की अस्थियां पवित्र जलाशयों को सौंपते हैं। -डा. पीवी काणे ने धर्मशास्त्र का इतिहास' में लिखा है कि भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था । शिशु एवं संन्यासी अपवाद थे। आश्विन मास में कृष्णपक्ष को हिंदू पितृपक्ष कहते हैं। पितृपक्ष में पितरों के इस लोक में आने की मान्यता है। अपने मृत पूर्वजों पितरों के प्रति अगाध श्रद्धा की यह परंपरा भी पूरे देश में एक जैसी है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्योतिर्विज्ञान का महत्व है। ग्रह स्थिति जांचने के लिए पंचांग बनाए जाते हैं। तिथि चार (दिन), नक्षत्र, योग और करण पंचांग के पांच मुख्य तत्व हैं। ये भी पूरे देश में एक जैसे हैं। कथित लिबरल और सेक्युलर तत्व भारत की विविधता में एकता नहीं देखते। वे स्थानीय मान्यताओं के आधार पर छोटे-छोटे भूक्षेत्रों को अलग- अलग देश की तरह देखते हैं। हिंदू चिंतक प्रत्यक्ष जगत के साथ-साथ अप्रत्यक्ष जगत का भी अध्ययन करते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'डिस्कवरी आफ इंडिया' में गणितज्ञ डान जिंग की पुस्तक 'नंबर' का उद्धरण दिया है। जिंग ने लिखा था, अनजाने हिंदुओं की शून्य के स्थान मूल्य के सिद्धांत की खोज लोकव्यापी महत्व की है। आश्चर्य है कि यूनानी गणितज्ञों ने इसकी खोज क्यों नहीं की? आग बेन ने 'मैथमेटिक्स फार द मिलियंस' में इसका सही उत्तर दिया है, यह कठिनाई हम हल नहीं कर सकते, यदि हम बौद्धिक विकास को कुछ प्रतिभाशाली लोगों के प्रयास का ही परिणाम मानेंगे। हमें उसे पूरी सामाजिक परंपरा और विचार का परिणाम समझना चाहिए। बेशक पश्चिमी देशों के विद्वानों की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन भारत के सामान्य जनजीवन में भी प्रकृति के अध्ययन की सामूहिक परंपरा रही है। समूचा ब्रह्मांड एक इकाई है । यह मान्यता भारत की है। विराट ब्रह्मांड में करोड़ों रूप हैं। रूप अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं।
यह विविधता प्रत्यक्ष है, लेकिन भिन्न भिन्न रूपों वाली विविधता के पीछे एक ही तत्व की उपस्थिति भारतीय चिंतकों को बहुत सहज रूप से उपलब्ध थी। भारतीय संस्कृति एकात्मवादी हैं। एकता ही विविधता में प्रकट होती है। भारत में अनेक भाषाएं बोलियां और रीति-रिवाज हैं। प्रत्यक्ष रूप में सब अलग-अलग दिखाई पढ़ते हैं, लेकिन सबके भीतर राष्ट्र नाम का एक तत्व विद्यमान है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विश्व रूप दिखाया । इस विश्व-रूप में अनेक रूप हैं। विविधता आश्चर्यचकित करती है, लेकिन समूचा ब्रह्मांड एक है। ऋवेद में इंद्र बड़े देवता हैं। इंद्र के लिए कहते हैं कि यह एक इंद सभी रूपों में रूप-रूप प्रतिरूप हो रहा है। ' रूप विविधता के प्रतीक हैं और इंद्र प्रकृति की एकात्म शक्ति । भारत विशाल देश है । मनुष्यों के रूप-रंग एवं जलवायु विविधता है। मार्क्सवादी विचारक डीडी कोसंबी ने 'प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता' में लिखा है कि जलवायु सतरंगी है। तमाम विविधताएं हैं, लेकिन मिस्र की संस्कृति में वैसी निरंतरता नहीं मिलती, जैसी भारत में पिछले तीन हजार या इससे भी ज्यादा वर्षों से है । विविधता में एकता मूल शक्ति है। विविधता ऊपरी है और सर्वव्यापी है, लेकिन एक संस्कृति सबको जोड़कर एकात्म बनाए रखती है। विविधता की अपनी शक्ति है।
प्रकृति बहुरूपवती है और समाज भी, लेकिन सबके भीतर विद्यमान एकता का मूल्य बड़ा है। भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक साहित्य के अलावा कौटिल्य का लिखा 'अर्थशास्त्र' पतंजलि के 'योगसूत्र' पाणिनि की 'अष्टाध्यायी', भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' और आचार्य वात्स्यायन कृत 'कामसूत्र' लोकप्रिय कृतियां हैं। सभी ज्ञान अनुशासनों में अपने-अपने विषयों की प्रतिष्ठा है, लेकिन सबके मूल में एकात्म सत्य का विचार छाया हुआ है। विविधता स्वीकार योग्य है, लेकिन एकता की शक्ति बड़ी है। विचार भिन्नता और विविधता प्राचीन ज्ञान संस्कृति का गुण सूत्र हैं। मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदांत भिन्न- भिन्न दर्शन हैं। यहां दार्शनिक दृष्टिकोण की भी विविधता है, लेकिन सभी दर्शनों में एक सत्य की ही आधारभूत निष्ठा है। रूप विविध हैं, रूप के पीछे सांस्कृतिक एकात्मकता है। विविधता में एकता दार्शनिक के साथ वैज्ञानिक भी है। इसे ब्रह्म कहें, अस्तित्व कहें या कोई और नाम दें, वही एकात्म अनुभूति का प्रसाद है । (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)
Editorial

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