Middle East conflict
विवेक देवराय, आदित्य सिन्हा: इजरायल (Israel) पर हमास (Hamas) के भयावह आतंकी हमले ने पश्चिम एशिया (West Asia) सहित पूरे विश्व को अशांति एवं अस्थिरता की ओर धकेलने का काम किया है। पिछले कुछ समय से इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने और स्थिति को सामान्य बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को इस हमले से भारी झटका लगा है। अब यहां नई चुनौतियां उत्पन्न हो गई हैं। इजरायल की कैबिनेट ने युद्ध की आधिकारिक घोषणा वाला अनुच्छेद- 40 लागू कर दिया है। उसके समक्ष 1973 के बाद यह स्थिति बनी है । इजरायल के रक्षा मंत्री ने गाजा पट्टी के पूर्ण सफाये का एलान किया है। साथ ही गाजा में बिजली, खान-पान और तमाम आवश्यक वस्तुओं से वंचित कर दिया गया है। इससे इस टकराव के और बढ़ने की ही आशंका है।
इस आतंकी हमले (Terrorist Attacks) की पृष्ठभूमि को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह हमला एक ऐसे समय में अंजाम दिया गया जब इजरायल एवं उसके अरब पड़ोसियों के बीच निरंतर मेल-मिलाप बढ़ रहा था और ऐतिहासिक समझौते हो रहे थे । वर्ष 2020 से अब्राहम समझौते के अंतर्गत इजरायल और तमाम अरब देशों के बीच संबंध सामान्य होने शुरू हो गए थे । अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान के बीच वार्ता ने यही संकेत दिए कि सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंध पूरी तरह सामान्य होने की ओर अग्रसर हैं। ऐसे गठजोड़ के आकार लेने से पश्चिम एशिया की भू- राजनीति में नाटकीय रूप से परिवर्तन आसन्न दिखने लगा। पुरानी दुश्मनी के बजाय सहयोग के नए सेतु बनने लगे। ऐसे सेतु की जड़ें क्षेत्रीय स्थायित्व एवं स्थिरता और साझा आर्थिक समृद्धि में निहित रहीं। हमास के हमले से यह प्रक्रिया कम से कम कुछ म के लिए तो पटरी से उतर जाएगी। इस हमले के बाद संवाद के मोर्चे पर ग्रहण लगने के साथ ही अविश्वास की खाई और बढ़ेगी। स्वाभाविक है कि अब सऊदी अरब और इजरायल के बीच किसी सहमति या समाधान की राह निकालने में विलंब होने के साथ ही यह पूरी कवायद खटाई में पड़ जाएगी। दोनों देश परस्पर लाभ की राह पर आगे बढ़ने से पहले क्षेत्रीय निहितार्थों और घरेलू भावनाओं का पूरी तरह ध्यान रखेंगे ।
एक अमेरिकी अखबार में हमास के हमले में ईरान की संलिप्तता की बात सामने आने से पश्चिम एशिया की पहले से ही जटिल स्थिति के और उलझने के आसार हैं। उक्त अखबार में प्रकाशित रपट के अनुसार हमले के लिए हमास को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्ल्स का सक्रिय सहयोग मिला और इस बारे में अंतिम निर्णय बेरूत में हमास और हिजबुल्ला के सदस्यों ने लिया । हिजबुल्ला भी ईरान पोषित आतंकी समूह है। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि हमले में ईरान की संलिप्तता के स्पष्ट साक्ष्य तो सामने नहीं आए हैं, लेकिन उन्होंने दोनों पक्षों के बीच संबंधों को लेकर जरूर टिप्पणी की । यदि ईरान की सक्रियता के आरोप जोर पकड़ते हैं तो इससे विभिन्न पक्षों को अपनी रणनीति बदलनी होगी और शांति वार्ता के प्रयास पटरी से उतरेंगे। ईरान की सक्रियता न केवल इजरायल की प्रतिक्रिया को और जटिल बनाएगी, बल्कि ईरान और उन अरब देशों के बीच संबंधों को भी तल्ख बनाएगी जो इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने में लगे हैं। इस सबके बीच अमेरिका ने कूटनीतिक से लेकर सैन्य स्तर पर इजरायल का हरसंभव तरीके से साथ देने का आश्वासन दिया है। इजरायल की सहायता के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्री लायड आस्टिन पहले ही फोर्ड करियर स्ट्राइक दस्ते को पूर्वी भूमध्य सागर की ओर कूच करने का निर्देश दे चुके हैं। इस दस्ते में अति उन्नत यूएसस गेराल्ड आर. फोर्ड विमानवाहक पौत भी शामिल है, जिस पर करीब 5,000 लोगों का दल तैनात है। इस पर तैनात क्रूजर और डेस्ट्रोयर हमास के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। साथ ही इस क्षेत्र में अमेरिकी वायु सेना के सक्षम लड़ाकू विमानों एफ-35, एफ-15, एफ-16 और ए-10 के बेड़े भी लगातार बढ़ने पर हैं । इजरायल पर हुए हमले को लेकर खुफिया एजेंसियों के स्तर पर भारी चूक के भी गहरे निहितार्थ हैं। असल में यह केवल इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ही नहीं, बल्कि अन्य सहयोगी देशों की भी साझा विफलता है । इसने पूरी दुनिया के समक्ष खतरे की घंटी बजाई है। हमास ने इस सुनियोजित हमले को जितने बड़े पैमाने पर सफलातपूर्वक अंजाम दिया, उससे दूसरे आतंकी संगठनों का हौंसला भी बढ़ेगा। यह औचक हमला इस तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है विभिन्न देशों को खुफिया जानकारी साझा करने से लेकर रक्षा साझेदारी को मजबूत करने और आतंक विरोधी एकीकृत रणनीति अपनानी होगी । अन्य अतिवादी संगठनों को ऐसे तौर-तरीके अपनाने से रोकने और उन पर अंकुश लगाने के लिए वैश्विक सहयोग सर्वोपरि है। आतंकी हमलों के लिहाज से नाजुक देशों की सुरक्षा एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया जाना बहुत आवश्यक है।
सबसे बदतर बात यही है कि इजरायल पर हमास का यह आतंकी हमला एक ऐसे समय पर हुआ है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध के झटकों से उबरने के लिए पहले से ही संघर्षरत है। जहां कुछ देशों का आर्थिक परिदृश्य सुधरता दिख रहा है तो तमाम क्षेत्रों में मंदी और अपस्फीति का खतरा मंडरा रहा है। उनकी आर्थिक वृद्धि दबाव में है। पश्चिम एशिया में टकराव से उत्पन्न आर्थिक एवं भू- राजनीतिक अनिश्चितता से ये मुश्किलें और बढ़ेंगी। कच्चे तेल की कीमतें पहले से ही तेजी की ओर हैं। अतीत के रूझान को देखें तो इस क्षेत्र में तनाव अक्सर वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को बढ़ा देता है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचा तो तेल बाजार बुरी तरह प्रभावित होगा । यानी हमास-इजरायल भिड़ंत का असर केवल पश्चिम एशिया तक ही नहीं सीमित रहने वाला । तेल आयात पर निर्भर देशों को भी इसकी भारी कीमत चुकानी होगी, जिससे उनकी आर्थिक दुश्वारियां बढ़ेंगी और समग्र वैश्विक आर्थिक रिकवरी सुस्त हो जाएगी। (देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख और सिन्हा परिषद में ओएसडी अनुसंधान हैं ।)
Editorial

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