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फिर संकट से घिरा पश्चिम एशिया
By EditorialPublished on
संजय गुप्त….. बीते सप्ताह जब इजरायल के यहूदी अपना त्याँहार सिमचत तोरा मना रहे थे, तब गाजा पट्टी से हमास आतंकियों ने जमीनी, समुद्री और पैराग्लाइडरों के सहारे हवाई मार्ग से घुसकर भीषण हमला किया। इस हमले के दौरान दक्षिणी इजरायल में पांच हजार राकेट भी दागे गए। यह हमला इतना भीषण था कि कुछ ही घंटों के अंदर सैकड़ों निहत्थे लोगों को मार डाला गया । इनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी थीं। हमास आतंकी कई बच्चों और महिलाओं को बंधक बनाकर गाजा ले गए। इस हमले के साथ ही पश्चिम एशिया की शांति फिर भंग हो गई। बड़ी संख्या में अपन

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संजय गुप्त….. बीते सप्ताह जब इजरायल के यहूदी अपना त्याँहार सिमचत तोरा मना रहे थे, तब गाजा पट्टी से हमास आतंकियों ने जमीनी, समुद्री और पैराग्लाइडरों के सहारे हवाई मार्ग से घुसकर भीषण हमला किया। इस हमले के दौरान दक्षिणी इजरायल में पांच हजार राकेट भी दागे गए। यह हमला इतना भीषण था कि कुछ ही घंटों के अंदर सैकड़ों निहत्थे लोगों को मार डाला गया । इनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी थीं। हमास आतंकी कई बच्चों और महिलाओं को बंधक बनाकर गाजा ले गए। इस हमले के साथ ही पश्चिम एशिया की शांति फिर भंग हो गई। बड़ी संख्या में अपने नागरिकों के मारे जाने से कुपित इजरायल ने गाजा पट्टी में हमास के ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए हैं।
यह अप्रत्याशित है कि इजरायली सुरक्षा बल हमास के हमले को रोकने में नाकाम रहे और उसकी खुफिया एजेंसियों को भी इस हमले की साजिश की भनक नहीं लग पाई । यह बड़ी विफलता है । इजरायल में हमास या फिर अन्य फलस्तीनी आतंकी संगठनों के हमलों में इतने लोग पहले कभी नहीं मारे गए । हमास के हमले से बौखलाए इजरायल ने गाजा पट्टी पर बमबारी करने के साथ वहां बिजली - आपूर्ति ठप कर दी है और रसद भेजना भी बंद कर दिया है। इससे गाजा पट्टी में रह रहे करीब 22 लाख फलस्तीनियों की मुसीबत बढ़ गई है। वहां एक मानवीय संकट पैदा हो गया है, लेकिन इससे हमास की सेहत पर असर नहीं, क्योंकि वह फलस्तीनियों की कोई परवाह नहीं करता। उलटे वह उन्हें ढाल बनाता है। गाजा के फलस्तीनियों के समक्ष जो संकट पैदा हुआ है, उसके लिए यदि सबसे अधिक कोई जिम्मेदार है तो वह हमास ही है, जिसके नेता कतर में ऐशो-आराम से रहते हैं। यह संभव नहीं कि हमास के सरगनाओं को यह आभास न रहा हो कि इजरायल पर उनके हमले के क्या दुष्परिणाम होंगे? एक तरह से उन्होंने जानबूझकर फलस्तीनियों को संकट में डाल दिया। फलस्तीनी और यहूदियों के बीच जंग नई बात नहीं । इजरायल की स्थापना के बाद से ही यह जंग जारी है। फलस्तीन के हितों की रक्षा के बहाने इजरायल के पड़ोसी अनेक अरब देश उस पर हमले करते रहे हैं। इनमें उन्हें हमेशा मुंह की खानी पड़ी। इसके बाद से ये देश उन आतंकी गुटों की मदद करने में जुट गए, जो इजरायल पर हमले करते हैं। ऐसे गुटों और विशेष रूप से गाजा में प्रभुत्व रखने वाले हमास और लेबनान में ठिकाना बनाए हिजबुल्ला को ईरान समर्थन देता है। यही काम कतर, सीरिया आदि भी करते हैं ।
1948 में अस्तित्व में आए इजरायल को न तो फलस्तीनियों ने स्वीकार किया और न ही अधिकांश अरब देशों ने। यही कारण है कि स्थापना के समय से ही इजरायल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जब पिछली सदी के छठे दशक में फलस्तीन में यासिर अराफात के नेतृत्व में फलस्तीन लिबरेशन आर्गेनाइजेशन (पीएलओ) बना तो वह लंबे समय तक हथियारों के बल पर इजरायल से लड़ता रहा। 1993 में उसने सशस्त्र संघर्ष की राह छोड़ी और इजरायल को मान्यता दी, लेकिन अन्य फलस्तीनी गुटों को यह रास नहीं आया । इनमें हमास भी था, जिसका प्रभाव गाजा में अधिक था। पीएलओ का असर वेस्ट बैंक इलाके में था। भारत समेत दुनिया के अनेक देश पीएलओ को ही फलस्तीन का प्रतिनिधि संगठन मानते हैं। अनेक देशों ने हमास को आतंकी संगठन घोषित कर रखा है, लेकिन ईरान, कतर जैसे देश उसे फलस्तीन के हक के लिए लड़ने वाला संगठन मानते हैं।
बीते सप्ताह इजरायल में भीषण हमला करके हमास ने यही साबित किया कि वह इस्लामिक स्टेट जैसा खूंखार आतंकी संगठन है। हमास ने यह हमला इसीलिए किया, क्योंकि अब्राहम समझौते के चलते कई अरब देश और इजरायल करीब आ रहे थे । यह समझौता पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कराया था । इसके तहत बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने इजरायल से राजनयिक संबंध स्थापित किए। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन सऊदी अरब और इजरायल को भी निकट लाने का काम कर रहे थे। इजरायल और सऊदी अरब में राजनयिक संबंध कायम होने से पहले फलस्तीन पर भी किसी समझौते की उम्मीद थी। इससे ईरान को झटका लगता और शायद इसी कारण उसने हमास को इजरायल पर हमले के लिए उकसाया। इस हमले के कारण स्थिरता की ओर बढ़ रहा पश्चिम एशिया नए सिरे से संकट से घिर गया है। पश्चिम एशिया लंबे समय से अशांति से घिरा रहा है। इसका एक कारण शिया और सुन्नी देशों में वर्चस्व की लड़ाई है और इस्लामी जगत का अगुआ की होड़ भी। इसके चलते इस क्षेत्र में अनेक आतंकी संगठन पनपते रहे हैं। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट का उदय पश्चिम एशियाई देशों की आपसी लड़ाई के कारण ही हुआ ये देश आतंकी संगठनों को विरोधी देशों के।
खिलाफ इस्तेमाल करते हैं। यह काम ईरान, सऊदी अरब, कतर, तुर्किये कुछ ज्यादा ही करते हैं, क्योंकि वे इस्लामी जगत का नेतृत्व अपने हाथ में लेना चाहते हैं । इधर सऊदी अरब ने सुधार और शांति की राह पकड़ी है, पर यह ईरान, कतर और तुर्किये को पसंद नहीं। हालांकि अमेरिका पश्चिम एशिया में शांति के लिए प्रयासरत है, पर जब तक ईरान, कतर, तुर्किये आदि हमास जैसे आतंकी संगठनों को समर्थन देते रहते हैं, तब तक इस क्षेत्र में शांति संभव नहीं। हमास, हिजबुलल आदि का समर्थन करने वाले इस्लामी देश फलस्तीनियों की मुश्किल बढ़ाने का काम कर रहे हैं । वे यह समझने से इन्कार कर रहे कि हमास ने अपनी हरकत से इजरायल को पलटवार करने के लिए मजबूर किया है।
चूंकि भारत के भी हित पश्चिम एशिया से जुड़े हैं, इसलिए उसे भी इस क्षेत्र में शांति स्थापना के लिए सक्रिय होना चाहिए । ऐसा करते हुए उसे यह स्पष्ट करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि वह हमास जैसे संगठनों को आतंकी संगठन ही मानेगा। यह अच्छा हुआ भारतीय प्रधानमंत्री ने हमास के हमले को आतंकी हमले की संज्ञा दी और कठिन वक्त में इजरायल के साथ खड़े होने का संदेश भी दिया । इस संदेश का यह अर्थ नहीं कि भारत फलस्तीनी जनता के साथ नहीं। भारत ने सदैव अलग फलस्तीन राष्ट्र की पैरवी की है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि वह हमास जैसे आतंकी संगठन की निंदा न करे।

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