Hamas Terror Attack
दिव्य कुमार सोती: हमास (Hamas) के आतंकियों (Terrorists) द्वारा इजरायल (Israel) घुसकर की गई बर्बरता ने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया है। इन आतंकियों ने महिलाओं और बच्चों को विशेष रूप से निशाना बनाया । आतंकियों की भेंट चढ़ने वालों में से अधिकांश इजरायल और गाजा पट्टी की सीमा पर हो रहे संगीत महोत्सव में जुटे थे । इसमें दुनिया भर से लोग आए थे। आतंकियों ने लोगों का न केवल बेरहमी से कत्ल किया, बल्कि मजहबी नारे लगाती उनकी भीड़ ने महिलाओं को नग्न कर सड़कों पर घुमाया। इस व्यापक आतंकी हमले के दौरान महिलाओं से दुष्कर्म की खबरें भी आई हैं। हमास आतंकियों ने 85 साल की वृद्ध महिलाओं से लेकर तीन वर्ष के बच्चों तक को बंधक बनाया। यह सब भारत पर पिछले हजार वर्षों में हुए इस्लामिक आक्रमणों और पाकिस्तान निर्माण के दौरान कट्टरपंथियों द्वारा की गई बर्बरता के इतिहास को आंखों के सामने जीवंत कर देने वाला है।
इजरायल में जो कुछ हुआ, उसके मानवीय पक्ष से अलग सामरिक और भू- राजनीतिक पहलू भी भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रश्न यह उठ रहा है कि आतंकी हमलों की तैयारी होती रही, लेकिन इजरायल की खुफिया एजेंसियों को उसकी भनक कैसे नहीं लगी? इससे पहले 1967 के युद्ध के समय भी ऐसा ही हुआ था, जब इजरायली एजेंसियों को अरब देशों के चौतरफा हमले की जानकारी नहीं मिल सकी थी। हालांकि इस संवेदनशील और अशांत क्षेत्र में इजरायल के मित्र देशों की खुफिया एजेंसियां भी सक्रिय रहती हैं । समझना कठिन है कि संभवतः लेबनान, सीरिया, फलस्तीन, कतर और ईरान में बनी इस हमले की योजना का अंदाजा किसी पश्चिमी देश की खुफिया एजेंसी को भी क्यों नहीं लगा ? ये वही खुफिया एजेंसियां हैं, जिनकी तथाकथित जानकारी के आधार पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत पर खालिस्तानी आतंकी की हत्या के मामले में अनर्गल आरोप लगा रहे थे। जिन देशों में ईरान से जुड़े दूसरे आतंकी नेटवर्क सक्रिय हैं, उनमें इजरायल का पड़ोसी सीरिया भी प्रमुख है। वहां रूसी फौज भी लंबे समय से सक्रिय है। ऐसे में क्या किसी भी सूत्र से इजरायल तक सही जानकारी नहीं पहुंच सकी या कुछ शक्तियों ने इजरायल को गुमराह किया ?
अमेरिका (America) में रिपब्लिकन पार्टी (Republican Party) के नेता आरोप लगा रहे हैं कि हमास ने इस हमले में 6 अरब डालर की उस धनराशि का उपयोग किया है, जो बाइडन प्रशासन द्वारा ईरान पर प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के चलते जारी हुई थी । यह आश्चर्यजनक है कि ईरान पर प्रतिबंधों में ढील उस समय दी गई, जब वह अमेरिका के शत्रु रूस को यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल के लिए बड़े पैमाने पर घातक ड्रोन मुहैया करा रहा था । कहीं ऐसा तो नहीं कि पश्चिम और रूस दोनों ही यूक्रेन युद्ध से थक गए हैं और उससे निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं तथा इस खेल में इजरायल को बलि का बकरा बना दिया गया ? सच जो भी हो, यह उल्लेखनीय है कि हमास के अधिकांश आतंकी नेता कतर में रह रहे हैं, जो पश्चिम एशिया में अमेरिका का एक प्रमुख साथी है । कतर में ही अमेरिका का सबसे बड़ा पश्चिम एशियाई सैन्य अड्डा भी है। यह आतंकवाद को लेकर अमेरिका के दोहरे रवैये का एक और उदाहरण है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पश्चिमी जगत के लिए इजरायल को बचाना यूक्रेन को बचाने से अधिक महत्वपूर्ण होगा, लेकिन भारत के दृष्टिकोण से देखें तो यूक्रेन में युद्ध का शांत हो जाना ही हमारे हित में है, क्योंकि एक तो यह संकट रूस एवं चीन को निकट लाता जा रहा है और दूसरे, वैश्विक महंगाई को बढ़ा रहा है। इसके साथ ही बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण के भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य को जटिल बना रहा है।
इजरायल पर भीषण आतंकी हमला भारत के समक्ष सुरक्षा चुनौतियों को भी रेखांकित करता है। सस्ते घातक ड्रोन, राकेट, ग्लाइडरों और सुरंगों से घुसपैठ करते आतंकी और उनके द्वारा किए गए वीभत्स हत्याकांड और दुष्कर्मों का समर्थन करती जुनूनी भीड़ भविष्य की चुनौतियां हैं। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान से अपनी सेनाएं वापस बुलाने के बाद एक तरह से 9/11 के बाद शुरू किए गए आतंकवाद के विरूद्ध वैश्विक युद्ध की इतिश्री कर दी और पुनः रूस से हिसाब चुकता करने में लग गए। इजरायल पर हमास के बर्बर हमले ने फिर से सिद्ध किया कि आतंकवाद और उसका समर्थन आज भी विश्व की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियों में से एक है। जो पश्चिमी देश खालिस्तान समर्थकों की आतंकी गतिविधियों पर आंखें मूंदे बैठे थे, वे अब इजरायल में हमास द्वारा महिलाओं और बच्चों के संहार पर मुस्लिम कट्टरपंथियों को अपने देशों में सार्वजनिक उत्सव मनाते देख हतप्रभ हैं।
हमास आतंकियों के खिलाफ इजरायल की जीत भी जरूरी है, क्योंकि इससे भारत (India) के हित जुड़े हैं। वृहत्तर पश्चिम एशिया (Asia) को इस्लामिक कट्टरपंथ का केंद्र माना जाता है और इजरायल उसके पश्चिमी (Western) तो भारत पूर्वी (India East) मुहाने पर है। इजरायल के कमजोर पड़ने से उन आतंकी शक्तियों का भी हौंसला बढ़ेगा, जो भारत को निशाना बनाती रही हैं। तब पाकिस्तान जैसे देशों का आतंकवाद में विश्वास और मजबूत होगा। ऐसी स्थिति में इस्लामिक कट्टरपंथी शक्तियां मिस्र और सऊदी अरब जैसे देशों की वर्तमान सरकारों के लिए भी बड़ा खतरा बन जाएंगी, जो मध्ययुगीन कट्टरपंथी विचारधारा से निकलकर आधुनिकता की ओर जाने का प्रयास कर रही हैं। इस घटनाक्रम ने भारत, सऊदी अरब और इजरायल को यूरोप से जोड़ने वाले प्रस्तावित आर्थिक गलियारे की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं। यहां यह भी समझना आवश्यक है कि ईरान के साथ भारत के संबंध भले ही अपेक्षाकृत ठीक हों, परंतु उसका परमाणु हथियार हासिल करना भारत और व्यापक मानवता के हित में नहीं होगा। ईरान के सर्वोच्च नेता वैसे भी कश्मीर पर भारत विरोधी बयान देते आए हैं। ईरान में कट्टरपंथ के उदय ने पिछले चार दशकों में इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंकवाद की समस्या को बढ़ाया ही है। ईरान सरकार ने अपने हित साधने के लिए पाकिस्तान की तरह ही व्यापक स्तर पर आतंकी संगठनों को खड़ा किया है।
Editorial

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